मानवता के खून-आलूदा इतिहास का बड़ा हिस्सा धर्मों से ही जुड़ा है

धर्म बना दिया गया फलसफा या फलसफे का वह पक्ष जिसको उसके अनुयायी धर्म का रूप दे देते हैं, यहीं पर अपने वैज्ञानिक स्वरूप से टूट जाता है। इसका एक ही कारण है कि धर्म में 'सुधार' की गुंजायश नहीं है...

अतिथि लेखक
मानवता के खून-आलूदा इतिहास का बड़ा हिस्सा धर्मों से ही जुड़ा है

तर्क बनाम आस्था

कंवल धालीवाल

जिन्होंने पोखरे में खड़ा पानी और गांव के पास बहती नदी, दोनों ही मन की सचेत अवस्था में देखे हैं, एक दार्शनिक के अनुसार उनको धर्म और विज्ञान के बीच का फर्क समझने में बहुत आसानी हो सकती है।

अपनी बात आगे बढ़ाने से पहले कहना चाहूंगा कि सच की तलाश करना और किसी धारणा में विश्वास करके उसे सच साबित करना दो विभिन्न बातें हैं। किसी खोज के परिणाम खोजी की धारणा के अनुकूल भी निकल सकते हैं और प्रतिकूल भी। खोजी अगर शुद्ध जिज्ञासावश परिणाम की तलाश में है तो इस बात की परवाह नहीं करेगा कि परिणाम उसकी सोच मुताबक निकला है या उसके उलट। वह ईमानदारी से परिणाम स्वीकार करेगा, लेकिन अगर वह ऐसी मानसिकता वाला है जो सच्चाई खोजने की आड़ में अपनी किसी विचारधारा को सच सिद्ध करना चाहता है तो उसकी इच्छानुसार न निकले परिणाम के बारे में वह झूठ बोलेगा या कतरा जाएगा।

कभी भी किसी को विश्वास करने को नहीं कहता विज्ञान

विज्ञान की विशेषता है कि यह कभी भी किसी को विश्वास करने के लिए नहीं कहता अपितु 'हाथ कंगन को आरसी क्या' वाली कहावत अनुसार प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाता है। और अगर कोई बात साबित ना कर सके तो अपने ही बनाए हुए सिद्धांत को ख़ारिज करके नए सिद्धांत बनाते हुए अपनी खोज जारी रखता है।

वैज्ञानिक उन्नति के पड़ावों की इस कहानी के साथ ही मनुष्यता की उन्नति की दास्तान भी जुडी हुई है।

विज्ञान कभी अपनी किसी खोज को 'आखिरी' नहीं मानता और नई राहें खुलने की संभावना का हमेंशा स्वागत करता है। ये केवल वैज्ञानिक ही नहीं कुदरती व्यवहार भी है जिस का सीधा सम्बन्ध आदम नस्ल के दो पैरों पर खड़े हो सकने की क्षमता और आस-पास के वातावरण के बारे में जिज्ञासु हो सकने के सामर्थ्य के साथ जुड़ा हुआ है। यह प्रक्रिया आज से लगभग 60 लाख वर्ष पहले के वनमानुश से मनुष्य में तब्दील हो रहे प्राणी से शुरू हुई, जिस का एक अलग इतिहास है।

पृथ्वी पर मनुष्य ही ऐसा जानवर है जिस ने अपने साथ-साथ पूरे ब्रह्माण्ड के अस्तित्व पर प्रश्न-उत्तर शुरू किए, जिसके परिणामस्वरूप हम मनुष्यता के इतिहास की प्राचीन और वभिन्न पड़ावों पर पनपीं कल्पना पर आधारित मान्यताओं / मिथ्याओं से ले कर स्थापित धर्मों का अस्तित्व में आना, वैदिक और यूनानी फलसफे का जन्म होता देखते हैं।

यूनान में एथेन्स गणराज्य मनुष्यता के इतिहास में अद्वितीय स्थान रखता है, जिसे सामाजिक मूल्यों के मापदंड निर्धारित करने में अग्रिम समझा गया है। ये लगभग वही समय था जब भारतीय उपमहाद्वीप में गौतम बुद्ध अपनी अद्वितीय शैली में दुःख की परिभाषा बताते हुए ब्राह्मणवाद की कुरीतियों के विरुद्ध लोगों को जागृत करने और सुखी रहने के नए ढंगों का सन्देश दे रहे थे और ऐथेंस में यूनानी दर्शन का उदय हो रहा था। उस समय के विषय, जैसे - गणित, ज्यामिति, भूविज्ञान, तारा विज्ञान, जीव विज्ञान, राजनीति, धर्म, आदि सभी तरह का अध्ययन दर्शन के अंतर्गत ही होता देखा गया है। इसी लिए इस समय के महान वैज्ञानकों को भी दार्शनिक कहा जाता था।

ज़िंदगी का मकसद क्या है?

What is the purpose of life?

'हम कहाँ से आए हैं, और मर कर कहाँ जाते हैं ? संसार में दुःख कियों है ? सूरज-चाँद-तारे ये सब क्या है ? धरती का शोर कहाँ है ? सृष्टि का सृजनहार कौन है ? (Who is the Creator of creation?)' जैसे प्रश्नों से यूनानी दार्शनिक सम्बोधित हुए। और उन्होंने अपनी अपनी क्षमता के अनुसार उत्तर खोजने की चेष्टा की। आज ये सारे प्रश्न विज्ञान के घेरे में आ गए हैं। उनके जवाब सही थे या गलत परन्तु आज वे सारे दार्शनिक संसार भर में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। लगभग इन्हीं प्रश्नों के जवाब संसार के धर्म गुरुओं ने भी देने की चेष्टा की, वो चाहे पांच हज़ार साल पहले का कोई वैदिक ऋषि हो या ढाई हज़ार साल पहले का बुद्ध, दो हज़ार साल पहले का ईसा, डेढ़ हज़ार साल पूर्व का मुहम्मद या फिर पांच सौ वर्ष पहले का नानक। उन्होंने भी अपने अपने काल व स्थान के अनुसार पहले से अर्जित हो चुके ज्ञान के आधार पर निष्कर्ष निकाले जो दार्शनिक/ वैज्ञानिक परिणामों की तरह आखरी सत्य नहीं थे। परन्तु धर्म बना दिया गया फलसफा या फलसफे का वह पक्ष जिसको उसके अनुयायी धर्म का रूप दे देते हैं, यहीं पर अपने वैज्ञानिक स्वरूप से टूट जाता है। इसका एक ही कारण है कि धर्म में 'सुधार' की गुंजायश नहीं है जब कि वैज्ञानिक खोजों के परिणाम का विश्वसनीय होना, केवल और केवल सबूत पर निर्भर करता है। जब भी किसी खोजी के किसी नतीजे के विपरीत कोई सबूत पेश कर दिया जाए, उसी दिन उस शोध के निष्कर्ष को अस्वीकार कर के नए परिणामों की तलाश आरंभ हो जाती है।

दुनिया के महान भौतिक वैज्ञानिक आइनस्टाइन के कई सिद्धांतों पर अत्याधुनिक विज्ञान किन्तु करने योग्य हो गया है, उसी तरह जैसे स्वयं आइनस्टाइन ने न्यूटन के सिद्धांतों को सुधारा था। इस तरह उन्नति की यह निरंतर प्रक्रिया है जिस के अनुसार 'पुराना' अस्वीकार कर के ही आगे बढ़ा जा सकता है लेकिन आगे बढ़ने के लिए पिछले का होना भी लाज़मी है।

कोपरनिकस के बिना गैलेलिओ संभव नहीं था, गैलेलिओ के बिना आइनस्टाइन और आइनस्टाइन के बिना स्टीफन हाकिंस का अस्तित्व वजूद में नहीं आ सकता था। क्रमश: हो रही इस उन्नति को ही मैंने दरिया में बहते पानी की तरह माना है और गड्ढों-पोखरों मे खड़ा पानी किसी स्थापित धर्म की तरह। गड्ढे का पानी भी गड्ढे के जन्म के समय सरोवर के जल की भांति स्वच्छ था, परन्तु समय बदलने के बावजूद इस में कोई अंतर नहीं आया, किसी सुधार की संभावना न बनी। इस में नया पानी मिश्रित होने की अनुमति नहीं दी गई ना ही मैला जल निष्कासित किया गया। वहीं स्वच्छ सरोवर जिस में प्राण बचाने की क्षमता थी, विषैला हो गया, पीने योग्य ना रहा ! धर्मों की ऐसी स्थिति के ज़िम्मेवार हैं इन के अनुयाई, जिन्होंने अपने जिज्ञासु पुरुषों- गुरुओं को 'ईश्वर के दूत', व उनकी और से प्रकट किए गए विचारों को 'ईश्वरीय वाणी' जैसी व्यर्थ उपाधियों में जकड़ दिया। उनकी ओर से सुझाए गए उपायों को 'चमत्कार' घोषित कर के उलझे हुए सवालों के हल निकलने के उनके प्रयासों को सदा के लिए अन्धविश्वास की कब्र में दफन कर दिया।

अब कल्पना कीजिये यदि यूनान के वो दार्शनिक, जिन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करते हुए नैतिकता, राजनीति, ब्रह्माण्ड, गणित आदि विषयों पर अपने विचार दिए, को भी उनके अनुयाइयों की तरफ से उन्हें 'ईश्वर के दूत' होने का बिगुल बजा दिया होता और उनके नाम से भी विभिन्न 'धर्म' ईजाद कर दिए होते ! आज वहीं दार्शनिक जो समस्त दुनिया में एक ही नज़र से देखे जाते हैं, किसी ना किसी समुदाय के 'गुरु' होते तो अन्य समुदायों के लिए घृणा के पात्र, पाखंडी ! इस के विपरीत भी कल्पना की जा सकती है - बुद्ध , ईसा, मुहम्मद, नानक, को आकाश से उतरे अवतार मानने की बजाए केवल समाज सुधारक ही स्वीकार किया गया होता, जिन्होंने अपने - अपने काल के समाज में फैली कुरीतियों का हल ढूंढ़ने, और मनुष्य के मन में बुझारतों की तरह घर किए हो, प्रश्नों को समयानुसार उपलब्ध ज्ञान के आधार पर सुलझाने का प्रयत्न किया। यदि उन तथाकथित अवतारों के दावों को तर्क की कसौटी पर परखा गया होता और उनको केवल ‘अपने समय के समाज-सुधारक’ भर ही समझा गया होता तो वे आज समस्त संसार के लिए एक समान आदर पाने वाले ऐतिहासिक व्यक्तित्व होते, ना कि दुनिया के एक भाग में पूजे जाने वाले और दूसरे भाग में रक्तपात की प्रेरणा बनने वाले। ना यूरोप में यहूदियों के लहू की नदियां बहतीं, ना फलिस्तीन में यहूदियों के हाथों अरबी मुसलमानों को नारकीय जीवन नसीब होता, ना तुर्क साम्राज्य में ईसाईयों की दुर्गति होती, ना मध्य-एशिया में फिरंगी खून की होली खेलते, ना ही लातीनी अमरीका में ईसाईयों के हाथों मूल निवासियों का नरसंहार होता, ना अफ्रीका के निवासी 'निर्यात' किए गए धर्मों के अनुयायी बन कर एक दूसरे का विनाश करने पर आतुर रहते।

इतनी दूर ना भी जाएं। पंजाब के बंटवारे के विनाशकाल को कौन भूल सकता है, जहां मनुष्य ने पांच हज़ार वर्ष से अर्जित सभ्यता के मापदंडों को एक झटके में कूड़ा दान में फेंक दिया था।

ये सब कुछ तो इतिहास बन गया, लेकिन क्या धर्म के नाम पर रक्तपात बंद हो गया ?

भारतीय पंजाब में 80 के दशक में आंधी की तरह चली आतंकवाद की तानाशाही, 1984ई. में हज़ारों निर्दोष सिक्खों का ज़िंदा फूंके जाना, 2002ई. में गुजरात के मुसलमानों के सर्वनाश की मानवता को शर्मसार करती तस्वीर अभी कल ही की बात है।

पाकिस्तान और इस्लाम धर्म की शिक्षाएं

आज भी धर्म और ईश्वर के नाम पर जो हो रहा है किसी से छिपा नहीं है। पड़ोस में ही एक मज़हब विशेष के लिए बनाए गए देश में भी धर्म ने मानवता का अपहरण कर रखा है, जहाँ हर वह व्यक्ति जो इस्लाम की एक खास शाखा को नहीं मानता, हलाल होने के लिए तैयार बैठा है।

नाईजीरिया में इस्लामी कातिलों के हाथों निर्दोष ईसाईयों का लहू बहाया जाने की खबरें आम हैं।

इराक़, सीरिया, बैहरीन, लेबनान में एक ही मज़हब के अनुयाइयों के बीच हो रहे घमासान में फंसी हुयी इंसानियत, श्री लंका और बर्मा (म्यांमार) में बहुसंख्यक समुदायों की ओर से अल्पसंख्यक समुदायों पर हो रहे अत्याचार, और अब इक्कीसवीं सदी में भी अफगानी बुर्कों में गर्क होती ज़िंदगी, इराक-सीरिया के एक हिस्से पर कब्ज़ हुए घोर आतंकवादी इस्लामी संगठन द्वारा गैर-मुस्लिम मर्दों की उतरती गर्दनें और बिकती हुई बच्चियों-औरतों की मण्डियां...!

क्या कुछ गिनाया जाए ? मानवता के खून-आलूदा इतिहास का बड़ा हिस्सा धर्मों से ही जुड़ा है।

आश्चर्य की बात तो ये है कि ये ज़ुल्मो-सितम उन्हीं विचारधाराओं के नाम पर हो रहा है, जिन को मानने वाले उन्हें 'मनुष्यता के लिए शांति, प्रेम और भाईचारा' जैसे स्वपनमयी अलंकारों से सुशोभित करते हैं।

प्रश्न उठता है कि ऐसी मानसिकता कब तक सहन की जाती रहेगी। दुनिया के कारावासों में बंद हर मुजरिम किसी न किसी धर्म को मानने वाला होता/होती है।

क्या धर्म सचमुच प्रेम-भाईचारा का पाठ पढ़ाने की क्षमता रखता है

Does religion really have the ability to teach love and brotherhood?

धर्म यदि सचमुच में प्रेम-भाईचारा का पाठ पढ़ाने की क्षमता रखता तो केवल धर्मों को न मानने वाले ही मुजरिम होते। परन्तु हकीकत इसके विपरीत देखी जाती है। क्यों ?

यदि धर्म किसी को अपराध करने से नहीं रोक सकता तो ऐसे पाखंड का भेड़-बकरियों की भांति, आँखें मूंदे अनुसरण करना कहाँ की बुद्धिमत्ता है ?

कोई आध्यात्मिक विचारधारा स्वयं के वैज्ञानिक होने का प्रमाण पत्र क्यों लेना चाहती है

सभी स्थापित धर्मों को मानने वालों की ओर से उनके धर्म 'वैज्ञानिक' होने के दावे किए जाते हैं। ये दावे झूठे हैं या सच्चे, ये विचारने से पहले इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कोई आध्यात्मिक विचारधारा अपने आप का वैज्ञानिक होने का प्रमाण पत्र क्यों लेना चाहती है। यदि विज्ञान इतना ही बुरा है जो धर्मों की नाक के नीचे नहीं आता तो फिर उसी विज्ञान की शरण में जाने वाली मानसिकता को क्या नाम दिया जाए ?

रूढ़िवादी हिन्दुओं का दावा "पश्चिम की साइंस तो उनके वेदों में पहले ही मौजूद है" कोरी बकवास तो है ही, परन्तु इसके साथ साथ उन्होंने पूरे भारत देश को सारी दुनिया में भद्दे मज़ाक का विषय बनने के लिए मजबूर कर दिया है।

इसी तरह बौद्ध, ईसाई, मुसलमान, पारसी, यहूदी, सिख - सभी किसी न किसी बहाने अपनी "वाणियों" के तर्कशील होने का दम भरते रहते हैं और अपनी किताबों में ब्रह्माण्ड, सूरज, तारों का ज़िक्र होने के उद्धरण देते हैं।

जिस तरह मैं पहले भी कह चुका हूँ, मनुष्य की जिज्ञासु आँख शुरू से ही अपने चौगिरदे (आस-पास) को प्रश्नात्मक नज़र से देखती रही है, इस लिए ये कोई बड़ी बात नहीं कि इन किताबों के रचयिताओं को अपने समय में जितनी भी समझ आई, उसे प्रकट किया।

ऋग्वेद में रचित "सृष्टि उसतत" इस की सब से बढ़िया उद्धरण है। ये अपने आप में अद्वितीय फलसफा तो है ही और काव्य का अद्भुत रूप भी जिस में उत्तरों से प्रश्न अधिक हैं - कमाल के प्रश्न जो 'भगवान' जैसी शक्ति के अस्तित्व पर भी किन्तु करते हैं।

पुरातन भारतीय गणित ने भी आधुनिक विज्ञान को संख्यांक और शून्य जैसे अंक का अदभुत उपहार दिया है।

इसी तरह विज्ञान को दूसरी पुरातन सभ्यताओं का भी योगदान रहा जिस में यूनानी, मिस्री, चीनी, अरबी, फ़ारसी प्रमुख हैं। परन्तु इसका ये अर्थ नहीं कि किसी हिन्दू ऋषि ने, ईसा, मुहम्मद या नानक ने हबल दूरबीन में से देख कर हमें सृष्टि की रचना के बारे में ज्ञानवान किया। हाँ अतीत के जिज्ञासु पुरुषों की सृष्टि के बारे में की गई कल्पनाओं ने हम को इतना समर्थ ज़रूर किया कि हम हबल दूरबीन जैसी अत्युत्तम चीज़ बना सकें। यह क्रमशः उन्नति है जो सदियों से चल रही है। इस यात्रा में कुछ भी 'आखरी' नहीं परन्तु जिनको "आखिरी" घोषित कर दिया गया है वो विज्ञान के घेरे से बाहर हो गए हैं, जब कि विज्ञान की धारा लगातार आगे बढ़ती जा रही है। चाहे यूनान के तारा-वैज्ञानिक अरिस्तरखोस को 3 सदी ई.पू. में अनुमान हो गया था कि हमारी धरती सारे ब्रह्माण्ड की धुरी नहीं है और उसने सब से पहले हमारे सूर्य मंडल के सूर्य केंद्रित होने का सिद्धांत पेश किया था, जो इतिहास के अँधेरे में बहुत देर तक छुपा रहा।

यही तथ्य साबित करने के लिए पन्द्रहवीं सदी में पोलैंड का वैज्ञानिक निकोलाई कोपरनिकस Nikolai Copernicus (नानक का समकालीन) पहल करता है। उसने बाकायदा एक मॉडल बना कर सिद्ध करने की कोशिश की थी कि धरती सूर्य के गिर्द घूमती है न कि सूर्य धरती के गिर्द।

कोपरनिकस का दुर्भागय था कि उस वक्त तक इस विषय पर की गई कल्पनाओं -'सूरज, चाँद, तारे सब धरती के गिर्द घूमते हैं' को ईसाइयत के माध्यम से ईश्वरीय वाणी करार दिया जा चुका था। परिणाम स्वरूप कोपरनिकस ही नहीं, बल्कि उस के बाद भी बहुत सारे वैज्ञानिकों और सत्य के खोजियों को कई सदियों तक धर्म के प्रतिशोध का सामना करना पड़ता रहा।

धार्मिक मानसिकता की ख़ास पहचान है दोगलापन

Hypocrisy is a sign of religious mindset

बीसवीं सदी के महान जीव वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के लिए भी धर्म-ग्रस्त समाज में मनुष्य के विकास की अपनी खोज को प्रकट करना आसान न था। अगर यह बर्ताव इतिहास में पीछे छूट गया होता तो भी सब्र कर लेते परन्तु समकालीन समय में जीते हुए, अत्याधुनिक जानकारी उपलब्ध होते हुए भी धर्मों के अनुयायी उसी पुरानी बकवास को अपने सिरों पर लादे रखने में कोई लज्जा महसूस नहीं करते। कैसा ढीठपना है ! ऊपर से 'चोरी और सीनाज़ोरी' देखो कि यही लोग फेसबुक, ट्वीटर, यूट्यूब, मोबाइल फोन जैसे आधुनिक संचार माध्यम जो विज्ञान की अद्भुत देन है, को विज्ञान के खिलाफ विष उगलने और अपनी धार्मिक आस्थाओं के प्रचार के लिए प्रयोग करते हैं।

अरे भाई विज्ञान यदि तुम्हारे धर्मों के सामने इतना ही तुच्छ है तो फिर जाओ ताड़ के पत्ते इकट्ठा करो, उन पर कालिख से स्याही और डंठल से कलम बना कर अपनी बात लिखो और घोड़ों पर चढ़ कर या पैदल प्यादे भेज कर अपना संदेश घर घर पहुंचाओ! विज्ञान की दी हुयी सुविधाओं का लाभ उठाने का आप को क्या अधिकार है ? परन्तु दोगलापन धार्मिक मानसिकता की ख़ास पहचान है। कथनी और करनी में कोसों का फासला रखना 'श्रद्धालुओं' के लिए गर्व की बात है। मानवीय चरित्र का यह पहलु सभी धर्मों के मानने वालों के लिए एक जैसा है। इनके कर्म को ध्यान से देखो तो वही तथ्य बार बार सामने आता है - यहूदी, मुसलमान और कुछ रूढ़िवादी ईसाई वर्ग एक ओर तो सारे ब्रह्माण्ड को ईश्वरीय सृजना मानते हैं तो दूसरी ओर पुरुष के लिंग ऊपर कुदरती त्वचा की पर्त को काटना आवश्यक समझते हैं- क्यों ? क्या ये त्वचा उसी ईश्वर ने नहीं बनाई जिसे इनके मौलवी काट कर फेंक देने को कहते हैं !

इसी तरह से गुरु नानक के जीवन से सम्बंधित सिखों की बनाई हुई कहानियों को देखो - एक कहानी में तो नानक ने हरिद्वार में गंगा में खड़े हो कर ब्राह्मणों की मान्यताओं के विपरीत उलटी दिशा में जल-प्रवाह करके, (सूर्य की बजाए पंजाब में अपने खेतों की और मुँह करके पानी दे कर) अपनी सोच तर्कशील होने का प्रमाण दिया- अन्धविश्वास पर चोट की, और दूसरी ओर उसी गुरु के चेले ये प्रचार करते नहीं थकते कि फलां स्थान पर गुरू नानक ने हाथ के पंजे से चट्टान रोक दी ! यही नहीं, सिख जो आपमें आप को हिन्दू मिथ्यावाद से मुक्त बताते हैं, हिमालय की बर्फीली चोटियों पर हर वर्ष अपने एक गुरु के 'पूर्वजन्म के भक्ति-स्थान' की यात्रा पर जाते रहते हैं।

इस दोगले व्यवहार में हिन्दू भी किसी से कम नहीं - शायद दुनिया में यही एक धर्म है जिस में एक तरफ तो लिंग और योनि की पूजा खुलेआम होती है और दूसरी ओर इसी के कट्टरपंथी यौन सबंधों के विरुद्ध आग उगलते हुए प्रेमी युगलों की हत्याएं करते फिरते हैं।

धर्म मजहब से बड़ी इंसानियत

अपनी बात खत्म करने से पहले, इसी से सबंधित एक और विषय पर बात करना आवश्यक समझता हूँ। मुझे अहसास है कि जब भी कोई धर्मों के अनुयायियों की तरफ से मनुष्यता के विरुद्ध की गई दरिंदगी का ज़िक्र करता है तो लोग अक्सर इस के प्रतिकर्म में साम्यवाद जैसी वित्तीय विचारधारा के नाम पर पनपी तानाशाही सरकारों की मनुष्यता विरोधी कार्यवाहियों का ज़िक्र करके यह प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं कि नास्तिक भी उतने ही अनैतिक हैं।

साम्यवाद और नास्तिकता समानार्थक शब्द नहीं हैं

Communism and atheism are not synonyms

मैं समझता हूँ कि तानाशाही व्यवस्था में मनुष्यता की बर्बादी होनी ही होती है चाहे वह धार्मिक हो या राजनीतिक या वित्तीय। साम्यवाद निरी वित्तीय विचारधारा है जिस के अनुसार पूंजी का बंटवारा मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार होना चाहिए न कि 'जिस की लाठी उस की भैंस' अनुसार, ताकि निर्बल के बलशाली के हाथों शोषण पर नकेल डाली जा सके। यह अलग बात है कि इस वित्तीय सिद्धांत के खोजी कार्ल मार्क्स ने गरीब की अमीर के हाथों होती लूट का एक कारण धर्म भी माना है जो सही भी है। परन्तु इस का अर्थ यह नहीं कि साम्यवाद और नास्तिकता समानार्थक शब्द हैं। ऐसा समझना कोरी मूर्खता है।

एक वित्तीय विचारधारा और एक नैतिक दृष्टिकोण का एक दूसरे के पूरक होना कदापि अनिवार्य नहीं है। आधुनिक पूंजीवादी दुनिया के बहुत सारे नास्तिक चिंतक हैं जो स्टालिन के रूस, माओ के चीन, पोलपोट के कम्बोडिया या आज के उत्तरी कोरिया में परीक्षण किए गए 'साम्यवाद' को कभी भी स्वीकार नहीं करते, जहाँ विचारों की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया गया हो।

दूसरी ओर बुद्ध और नानक जैसे 'धार्मिक' व्यक्तित्व हैं जो सामाजिक समानता, बाँट कर खाने और परिश्रम करते रहने जैसे गुणों का उद्धरण दे कर साम्यवाद के नज़दीक हो जाते हैं।

आज एक ओर चीन जैसा "कम्युनिस्ट" देश है, जो पूँजीवाद की सभी हदें लांघ रहा है और दूसरी तरफ पश्चिमी यूरोप के पूंजीवादी देश Capitalist country हैं जहां सभी नागरिकों के लिए जीने के योग्य साधन उपलब्ध करवाना वहां की सरकारों के जिम्मे है जो समाजवाद का ही सिद्धांत है।

अन्धविश्वास को तर्क से ही खंडित किया जा सकता है और तर्कशील सोच की सहज प्रफुल्ल्ता के लिए सब से प्राथमिक आवश्यकता है - 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' !

This was originally published in Punjabi in quarterly HU'N (ਹੁਣ). Enjoy ! (2014)

(पंजाबी से अनुवाद : सतनाम कौर / 2016)"

(कंवल धालीवाल, लेखक लंदन स्थित भारतीय मूल के चित्रकार हैं। उन्होंने अस्सी के दशक के मध्य में चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्ट से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।)

क्या है डेरावाद का चौरासी- चक्र

जो अपना धर्म हिन्दू बताते हैं उन्हें मालूम ही नहीं उनके धर्म का नामकरण विदेशियों ने किया

 

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