हिटलर की 'आर्य-श्रेष्ठता' की हुंकारों से कम अश्लील और खतरनाक नहीं ट्रंप की दहाड़

लगता है डोनाल्ड ट्रंप पर अभी भी चुनाव के वक़्त का भूत सवार है। वैसे भी उनके स्थान-काल बोध के बारे में सबको गहरे संदेह हैं, ...

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हाइलाइट्स

ट्रंप का भाषण इस बात का गवाह है कि वे सार्वभौम राष्ट्रों के बीच संबंधों के मामले में इस न्यूनतम सौजन्य बोध को भी गँवा चुके है कि ये संबंध आपसी संवाद पर टिके होते हैं और सभ्य समाज में किसी भी परस्पर समस्या का समाधान करने का तरीक़ा युद्ध नहीं बल्कि कूटनीति होती है ; निर्देश नहीं, सलाह-मशविरा होता है।

संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप की दहाड़ में दिखी उनकी घबड़ाहट और बौखलाहट

-अरुण माहेश्वरी

अभी भी चुनाव का भूत सवार है ट्रंप पर

लगता है डोनाल्ड ट्रंप पर अभी भी चुनाव के वक़्त का भूत सवार है। वैसे भी उनके स्थान-काल बोध के बारे में सबको गहरे संदेह हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा में 19 सितंबर को अपने पहले भाषण के वक़्त तो लगता है वे 'अमेरिका, अमेरिका' के नामोच्चार की रटना में उन्माद के अपने चरम पर पहुंच गये थे।

अमेरिकी श्रेष्ठता का उनका बखान हिटलर की 'आर्य-श्रेष्ठता' की हुंकारों से कम अश्लील और खतरनाक नहीं सुनाई दे रहा था। वे अमेरिकी हितों की रक्षा को जिस प्रकार अमेरिका की विध्वंसक सैनिक शक्ति के साथ बार- बार जोड़ रहे थे, इन हुंकारों से ही पता चलता है कि ट्रंप के रहते यह दुनिया उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की तुलना में कहीं ज्यादा बड़े ख़तरे में हैं।

ट्रंप का भाषण इस बात का गवाह है कि वे सार्वभौम राष्ट्रों के बीच संबंधों के मामले में इस न्यूनतम सौजन्य बोध को भी गँवा चुके है कि ये संबंध आपसी संवाद पर टिके होते हैं और सभ्य समाज में किसी भी परस्पर समस्या का समाधान करने का तरीक़ा युद्ध नहीं बल्कि कूटनीति होती है ; निर्देश नहीं, सलाह-मशविरा होता है। दो राष्ट्रों के बीच ही नहीं, बल्कि बहु-स्तरीय अन्तरराष्ट्रीय विषयों पर भी किसी भी जनतांत्रिक राष्ट्र का दायित्व संवाद को बढ़ाने का होता है, न कि अपनी नग्न चौधराहट को स्थापित करने का।

ट्रंप ने पिछले दिनों अपने सलाहकारों में से स्टीव बैनन की तरह के गोरे नस्लवादी को निकाल बाहर किया था, तब यह उम्मीद बंधी थी कि ट्रंप में अमेरिका के राष्ट्रपति पद का बोध पैदा होगा और उनकी भाषा और व्यवहार आगे ज्यादा जिम्मेदारीपूर्ण होंगे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के अपने इस भाषण में जिस प्रकार उन्होंने नाम ले-लेकर अलग-अलग राष्ट्रों को धमकाया है, उससे जाहिर है कि बैनन ट्रंप के अतिरिक्त कोई दूसरा शख़्स नहीं था बल्कि वह तो ख़ुद ट्रंप के अंदर बैठा हुआ है। उत्तर कोरिया को तो उन्होंने पूरी तरह से ख़त्म कर देने की बात कह डाली।

मानो इस जगत के अकेले मालिक हैं ट्रंप

अपने भाषण में ट्रंप ने पहले तो संयुक्त राष्ट्र और मार्शल योजना की तरह के राष्ट्रों के बीच परस्पर सहयोग के बहुराष्ट्रीय मंचों और कार्रवाइयों की प्रशंसा की जो राष्ट्रों को मज़बूत करके इस दुनिया को ज्यादा सुरक्षित बनाने के कदम रहे हैं। लेकिन बाद में जब वे आज की विश्व परिस्थिति पर ठोस रूप से बात करने लगे, उस समय उनका पूरा लहजा ऐसा था मानो वे इस जगत के अकेले मालिक हैं जिसके आदेशों का पालन दुनिया के प्रत्येक देश को करना पड़ेगा।

ईरान के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करने की खुली धमकी

ईरान की सरकार को उन्होंने हत्यारी सरकार कहा जो 'खतरनाक मिसाइलों का निर्माण करने के साथ ही दुनिया को अस्थिर करने की गतिविधियों' में लगी हुई है। उन्होंने साफ कहा कि हम पहले के ऐसे किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे जो ईरान को नाभिकीय हथियार बनाने की अनुमति देता है। ईरान के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करने की खुली धमकी देते हुए कहा कि "दमनकारी शासन हमेशा के लिये बने नहीं रह सकते हैं। वह समय आयेगा जब लोगों को चुनना होगा कि क्या वे ग़रीबी, ख़ून ख़राबे, और आतंक के रास्ते पर ही रहेंगे ? अथवा इरानी जनता सभ्यता, संस्कृति और समृद्धि के एक केंद्र के रूप में अपने राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा को अपनायेंगे जिसमें लोग ख़ुश और समृद्ध हो सके। "

ट्रंप की बेसिर-पैर की बातों पर बस हँसा ही जा सकता है

ट्रंप को इस सच का भी अहसास नहीं है कि सोवियत संघ के पतन के बाद चौथाई सदी से ज्यादा समय बीत चुका है, और इन पचीस से ज्यादा सालों में दुनिया ने जितने युद्ध और तबाही के मंज़र को देखा है, वह द्वितीय विश्वयुद्ध से भी कहीं ज्यादा डरावना है। अर्थात यह उस काल की डरावनी सचाई है जब सोवियत संघ की तरह के समाजवाद का अस्तित्व नहीं रह गया है। फिर भी ट्रंप ने समाजवाद को मानव समाज की सारी बर्बादियों के लिये ज़िम्मेदार बताने से परहेज़ नहीं किया !

वेनेज़ुएला का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ की समस्या यह नहीं है कि "समाजवाद पर सही ढंग से अमल नहीं किया गया, बल्कि यह है कि उस पर पूरी निष्ठा से अमल किया गया। सोवियत संघ से क्यूबा, वेनेज़ुएला तक, जहाँ भी सच्चे समाजवाद या साम्यवाद को अपनाया गया, वह परेशानियों, तबाही और विफलता का सबब ही बना है। जो भी इस बदनाम विचारधारा की बातों का प्रचार करते हैं वे इनके शासन में रहने वाले लोगों की दुर्दशा को बढ़ाने में योगदान करते हैं। "

उन्होंने जब चीन और रूस को प्रतिशोधमूलक राष्ट्र कहा जो दूसरों की सार्वभौमिकता में हस्तक्षेप करते हैं, तब किसी भी आदमी को हँसी के सिवाय और कुछ नहीं आ सकती। अमेरिका ने अपनी सैनिक चौकियों से सारी दुनिया को घेर रखा है और दुनिया के तमाम राष्ट्रों की सार्वभौमिकता में वह जितनी बेशर्मी से हस्तक्षेप करता हैं, उससे किसी भी दूसरे देश की तुलना नहीं की जा सकती है। और अमेरिका का राष्ट्रपति ही दूसरे देशों को अन्यों की सार्वभौमिकता का सम्मान करने का उपदेश दे रहा है !

बहरहाल, ट्रंप की इस दहाड़ के अंदर से कहीं न कहीं, उनके अंदर की कमज़ोरी का भी परिचय मिलता है। थोथा चना बाजे घना वाली बात है। इसमें दुनिया पर अपनी अब तक चली आ रही चौधराहट को खोने का उनका एक डर भी बोल रहा है।

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