जीवन के लिए आवश्यक हैं स्वस्थ फेफड़े, जानिए पर्यावरण और फेफड़ों का संबंध

बिना स्वस्थ पर्यावरण के जन-स्वास्थ्य मुमकिन नहीं

एजेंसी
Updated on : 2018-08-24 18:04:30

Environment and lung health are vital for sustainable societies

बिना स्वस्थ पर्यावरण के जन-स्वास्थ्य मुमकिन नहीं

बॉबी रमाकांत,

सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस)

पर्यावरण के निरंतर पतन से जन स्वास्थ्य को भी चिंताजनक क्षति पहुँच रही है। डॉ ईश्वर गिलाडा जो पर्यावरण और श्वास-सम्बंधी रोगों पर हो रहे 24वें राष्ट्रीय अधिवेशन (नेसकॉन 2018) के सह-अध्यक्ष हैं, ने कहा कि यदि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लक्ष्य पूरे करने हैं तो पर्यावरण और श्वास सम्बंधी रोगों में अंतर-सम्बंध को समझना ज़रूरी है.

भारत सरकार ने न सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य पूरे करने का वादा किया है बल्कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य भी पूरे करने के लिए वह वचनबद्ध है।

डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि 193 देशों के प्रमुख नेत्रित्व, सितम्बर 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में “सतत समाज” के विषय पर बहस और चर्चा करने के लिए एकत्रित होंगे। इसी दौरान टीबी समापन और ग़ैर-संक्रामक रोगों के नियंत्रण के लिए संयुक्त राष्ट्र की उच्च स्तरीय बैठकें होंगी। यदि सतत समाज के सपने को पूरा करना है तो यह नज़र-अन्दाज़ नहीं किया जा सकता कि पर्यावरण असंतुलन कितनी भीषणता से जन स्वास्थ्य को कुप्रभावित कर सकता है। स्वास्थ्य कार्यक्रम जो सफलता प्राप्त करते हैं वह सब प्राकृतिक विपदा के चलते पलट सकती है।

हमें चेतावनी देती है केरल बाढ़ त्रासदी

उदाहरण के लिए केरल में आयी बाढ़ त्रासदी हमें चेतावनी देती है कि कैसे प्राकृतिक विपदाएँ सामाजिक विकास और जन स्वास्थ्य को ध्वस्त कर सकती हैं। भारत के अन्य राज्य की तुलना में केरल राज्य विभिन्न मानव विकास संकेतक पर प्रशंसा का पात्र रहा है परंतु प्राकृतिक विपदाएँ इन सामाजिक विकास पर प्रगति को उलट सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि समय से पर्याप्त आकस्मक क़दम नहीं उठाए गए तो संक्रामक रोग फैल सकते हैं। डॉ गिलाडा ने सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) से कहा कि यह अत्यंत ज़रूरी है कि यह सुनिश्चित हो कि पर्यावरण संरक्षण और जन स्वास्थ्य नीतियों और कार्यक्रमों में सामंजस्य और कुशल तालमेल हो।

फिल्म अभिनेता अनिल कपूर : स्वस्थ फेफड़े के 'एम्बेसेडर'

फ़िल्म अभिनेता अनिल कपूर को 2016 में इसी पर्यावरण और श्वास सम्बंधी रोगों के राष्ट्रीय अधिवेशन में स्वस्थ फेफड़े के लिए 'एम्बेसेडर' बनाया गया था। कुछ महीने बाद ही 25 सितम्बर 2017 को पहला वैश्विक फेफड़े दिवस (वर्ल्ड लंग डे) मनाया गया क्योंकि स्वस्थ फेफड़े जीवन के लिए आवश्यक हैं। द्वितीय वैश्विक फेफड़े दिवस 25 सितम्बर 2018 को है और विश्व हृदय रोग दिवस 29 सितम्बर को।

विशिष्ट पर्यावरण मित्र पुरस्कार

पर्यावरण और श्वास सम्बंधी रोगों पर 24वें राष्ट्रीय अधिवेशन के सह-अध्यक्ष डॉ सलिल बेंद्रे ने बताया कि इस अधिवेशन में दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (ऐम्स) के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया करेंगे। इसी अधिवेशन में विशिष्ठ पर्यावरण मित्र पुरस्कार दिए जाएँगे - पुरस्कृत सम्मानित लोग इस प्रकार हैं: श्री एमएन देशमुख, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री कैज़र ख़ालिद, पुलिस महानिरीक्षक मुंबई; डॉ एस उत्तरे, अध्यक्ष, महाराष्ट्र मेडिकल काउन्सिल; और डॉ संजय अरोरा, निदेशक, सब-अर्बन डायग्नोस्टिक्स।

इस नेसकॉन 2018 अधिवेशन में भारत सरकार की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के उप-महानिदेशक डॉ केएस सचदेवा जो केंद्रीय टीबी डिविज़न के भी प्रमुख हैं; चंडीगढ़ के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ डी बेहेरा; कानपुर के प्रख्यात चिकित्सक डॉ एसके कटियार और लखनऊ के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ राजेंद्र प्रसाद का मुख्य व्याख्यान होगा।

दवा प्रतिरोधक टीबी पर एक श्वेत पत्र जारी

नेसकॉन 2018 के सह-अध्यक्ष डॉ सलिल बेंद्रे ने कहा कि इस राष्ट्रीय अधिवेशन में दवा प्रतिरोधक टीबी पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाएगा। दवा प्रतिरोधकता एक गम्भीर जन-स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए चेतावनी है. यह अत्यंत चिंता का विषय है कि दवा प्रतिरोधक टीबी के नए रोगियों की संख्या में गिरावट नहीं आ रही है। हर दवा प्रतिरोधक टीबी का नया रोगी या तो कमज़ोर स्वास्थ्य प्रणाली का प्रतिबिम्ब है या असफल संक्रमण नियंत्रण का।

प्रोफेसर (डॉ) केसी मोहंती को श्रद्धांजलि

भारत के प्रख्यात श्वास सम्बन्धी रोगों के विशेषज्ञ और एनवायरनमेंटल मेडिकल एसोसिएशन के प्रेरणा-स्तम्भ, स्वर्गीय प्रोफेसर डायरेक्टर (डॉ) केसी मोहंती, न सिर्फ टीबी या अन्य श्वास सम्बन्धी रोगों के लिए राष्ट्रीय अभियान के लिए चिन्हित हुए, बल्कि श्वास सम्बन्धी रोगों को पर्यावरण स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता से जोड़ कर उन्होंने विशिष्ठ कीर्तिमान स्थापित किये. उन्होंने चिकित्सकों की अनेक पीढ़ियों को प्रोत्साहित किया, मार्गनिर्देशन किया और श्वास सम्बन्धी रोगों और पर्यावरण संरक्षण के महत्त्व को प्रभावकारी ढंग से अंकित किया.

उनकी मृत्यु से चंद माह पहले ही उनके एक साक्षात्कार में उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया था कि कैसे चिकित्सकों की 3-4 पीढियां उनसे प्रेरित हो कर पर्यावरण और फेफड़े स्वास्थ्य पर समर्पण के साथ कार्यरत हैं: http://bit.ly/drkcmohanty

प्रोफेसर डायरेक्टर (डॉ) केसी मोहंती की इस धरोहर को पर्यावरण और श्वास सम्बन्धी रोगों पर 24वें राष्ट्रीय अधिवेशन जीवित रखेगा और इसी आशय से यह अधिवेशन आयोजित हो रहा है.

पर्यावरण और श्वास सम्बन्धी रोगों पर 24वें राष्ट्रीय अधिवेशन ने भारत के प्रधान मंत्री और अन्य 190+ देशों के प्रमुखों से अपील की कि वह अगले माह, संयुक्त राष्ट्र महासभा और उच्च स्तरीय बैठकों में, पर्यावरण संरक्षण और श्वास सम्बन्धी रोगों के नियंत्रण के लिए ठोस नीतियां बनायें, और प्रभावकारी कदम उठायें.

(विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) महानिदेशक से 2008 में पुरुस्कृत बॉबी रमाकांत स्वास्थ्य और सतत विकास से जुड़े मुद्दों पर लिखते रहे हैं और सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) के नीति निदेशक हैं.

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