शाही शातिर राजनीति के सामने सपा-बसपा चुनावी गठबंधन टिक पाने में विशेषज्ञों को संदेह

बसपा में कांशीराम के कैडर वाले सारे लोग ठिकाने लगाए जा चुके हैं और सपा में खुद मुलायम सिंह यादव खुद ठोकरें खा रहे हैं।...

नई दिल्ली, 12 जनवरी। आगामी लोकसभा चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन पर विशेषज्ञों को शंका (Experts doubt on SP-BSP coalition) है कि ये गठबंधन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ()Amit Shah की शातिर राजनीति के सामने टिक पाएगा। इसके दो प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। पहला जब 1993 में “मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम” नारा लगाकर सपा-बसपा गठबंधन बना था उस समय भी यह गठबंधन सरकार नहीं बना सका था और चुनाव बाद कांग्रेस का सहारा लेना पड़ा था, जबकि उस समय सपा और बसपा के वोट एक दूसरे को ट्रांसफर हुए थे। आज की परिस्थिति में न तो मायावती, कांशीराम हैं और न अखिलेश, मुलायम हैं। बसपा में कांशीराम के कैडर वाले सारे लोग ठिकाने लगाए जा चुके हैं और सपा में खुद मुलायम सिंह यादव खुद ठोकरें खा रहे हैं।

युवा पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हरे राम मिश्र कहते हैं कि “अमित शाह की शातिर राजनीति के सामने सपा और बसपा का यूपी में किया गया चुनावी गठबंधन टिक पाएगा मुझे बहुत संदेह है। अगर इसमें कांग्रेस होती तब यह टिकाऊ होता।”

मायावती द्वारा देशहित में गेस्ट हाउस कांड भूलने पर वे कहते हैं, “मायावती देश हित की बात नहीं बल्कि बसपा के हित की बात करें।”

हरे राम मिश्र कहते हैं कि सपा और बसपा ने यूपी में गठबंधन करते वक्त कांग्रेस को साथ नहीं लिया। इसका मतलब यही है कि कांग्रेस की मजबूती से उन्हें बहुत खतरा महसूस हो रहा है।

वह कहते हैं, #यूपी में यादव और जाटव एक साथ आ गए हैं. लेकिन इस गठबंधन से जवानी कुर्बान गैंग (उत्साही किन्तु अधकचरे राजनैतिक समझ वाले मुस्लिम नौजवानों) को कोई फायदा नहीं होगा, दोनों ही पार्टियां घोर मुसलमान विरोधी हैं। इसलिए जवानी कुर्बान गैंग अब वहां केवल और केवल दरी बिछाएगी।

कम से कम 20 मुसलमानों को जिताने का आश्वासन दे गठबंधन

मुस्लिम पॉलिटिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. तसलीम रहमानी ने कहते हैं कि यूपी में मुस्लिम नेताओं के लिए सुगम गठबंधन बना है। अब यह देखना होगा कि यह गठबंधन वहां के मुसलमानों को कितना प्रतिनिधित्व देता है। उन्हें कम से कम 20 मुसलमानों को जिताने का आश्वासन देना चाहिए। इस गठबंधन को यह याद रखना चाहिए कि इस संयोजन और भाजपा के बीच सिर्फ आधा प्रतिशत का वोट मार्जिन है। इसलिए कृपया किसी को भी इसे अपने टिकटों की बिक्री दरों को बढ़ाने के लिए एक अवसर के रूप में नहीं लेना चाहिए। अगर सभी के साथ न्याय नहीं किया गया तो तालिकाओं को आसानी से बदल दिया जा सकता है। हम आपको करीब से देख रहे हैं।

डॉ. तसलीम रहमानी ने कहा आरएलडी गठबंधन से बाहर। कांग्रेस के लिए इस गठबंधन का हिस्सा बनने का कोई मौका नहीं। लोक सभा चुनाव के लिए दिलचस्प मुकाबला।

उन्होंने कहा कि आरएलडी के बिना गठबंधन निश्चित रूप से वेस्ट यूपी में कुछ सीटें जीतने के लिए बीजेपी को बढ़त देगा क्योंकि जाट वोट अब बीजेपी को जाएगा। अगर अजीत सिंह अलायंस में होते तो जाट बीजेपी में शिफ्ट नहीं होते।

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