20 साल की आदिवासी लड़की की कहानी, जिसे माओवादी कहके पकड़ा और फिर छोड़ दिया

लोकतंत्र में अहिंसक आंदोलनों के लिये ही जगह है, संविधान के दायरे में रहकर ही कोई लड़ाई जीती जा सकती है, लेकिन सरकार अगर अहिंसक और संवैधानिक लड़ाईयों को ही कुचलने की कोशिश करे तो क्या रास्ता बचता है...

अविनाश कुमार चंचल

उस लड़की की उम्र बीस साल है। उसका नाम कुनी सिकाका है। उसका गांव नियामगिरी के पहाड़ों पर बसा है। कुनी डोंगरिया कोंध आदिवासी समुदाय से आती है।

पिछले कई सालों से उसके गांव, जंगल और पहाड़ पर एक कंपनी की नजर गड़ी हुई है, जो वहां जंगलों-गांवों को खत्म करके बॉक्साइट निकालना चाह रही है। लेकिन स्थानीय आदिवासी नियामगिरी पहाड़ को अपना भगवान मानते हैं, उनकी जीविका इसी जंगल पर टिकी है। उन्होंने दशक भर से ज्यादा अपने जंगल, पहाड़ और प्रकृति को बचाने के लिये लड़ाई लड़ी- एकदम शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष का रास्ता चुना। इसी संघर्ष का नतीजा है कि कंपनी बॉक्साईट खनन करने में अबतक नाकाम रही है।

इसी संघर्ष में कुनी सिकाका भी शामिल है। सिकाका के परिवार वाले नियामगिरी सुरक्षा समिति से जुड़े हैं, जो जंगल पर आदिवासियों की हक की लड़ाई को शांतिपूर्ण तरीके से लड़ने और जीतने में सफल रही है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि नियामगिरी में खनन होना चाहिए या नहीं यह फैसला वहां के स्थानीय ग्रामसभा तय करेंगे।

कोर्ट के फैसले के बाद ग्रामसभा हुई, जिसमें सभी गांवों ने एकमत से कंपनी को नकार दिया। अभी हाल ही में इस आंदोलन से जुड़े प्रफुल्ला सामंत्रा को नियामगिरी बचाने की लड़ाई लड़ने के लिये दुनिया का प्रतिष्ठित गोल्डमैन अवार्ड दिया गया है, जिसे ग्रीन नॉबल भी कहा जाता है। प्रफुल्ला 2004 से ही इस आंदोलन से जुड़े हैं।

story of a 20 year old tribal girl, who was caught in the name of Maoist and then freed2 मई को सिकाका को पुलिस ने माओवादी होने के आरोप में गोर्टा गांव से गिरफ्तार कर लिया। आरोप लगाया गया कि माओवादियों के लिये तैयार की गयी लिस्ट में उसका भी नाम शामिल है। 3 मई को ओडिसा पुलिस ने एक प्रेस कॉंफ्रेंस की, जिसमें सिकाका के परिवार वालों को भी आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी बताया गया।

हालांकि पुलिस ने उनके साथ फोटो खिंचाने के बाद सिकाका समेत सबको घर जाने दिया। जबकि सिकाका पर पुलिस ने एक लाख रुपये का इनाम भी घोषित कर रखा था। इससे पता चलता है कि कहीं न कहीं गड़बड़ है। सामान्यतः क्या एक लाख के ईनामी ‘माओवादी’ को पुलिस सिर्फ फोटो खिंचा कर घर जाने देगी?

सिकाका और उसके परिवार वाले समाजवादी जनपरिषद से जुड़े हैं। मध्यप्रदेश से लेकर उड़िसा तक यह एक राजनीतिक संगठन है जिसमें लोहिया और गांधी को मानने वाले समाजवादी लोग हैं। ये लोग लोकतंत्र में पूर्ण विश्वास रखते हुए चुनावों में भी हिस्सा लेते हैं और गांधी-लोहिया के रास्ते पर चलने का दावा करते हैं।

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि सिकाका और उसके परिवार वालों को सिर्फ इसलिए फंसाया गया क्योंकि वो अपने हक की लड़ाई लड़ना बंद कर दे, क्योंकि नियामगिरी सुरक्षा समिति को 'माओवादी' घोषित करके उनसे निपटना आसान होगा, क्योंकि बहुत दिनों से खबर आ रही है कि वेदान्ता कंपनी और ओड़िसा सरकार फिर से नियामगिरी में बॉक्साइट खनन की कोशिश कर रही है।

जब एक तरफ एक लंबे संघर्ष के बाद डोंगरिया कोंध समुदाय को अपने जंगल पर जीत मिली थी, वहीं देश-दुनिया में चर्चा में आने की वजह से एक उम्मीद जगी थी कि स्थानीय आदिवासियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ पानी की समस्या को सुलझाया जायेगा, लेकिन इन समस्याओं की तरफ ध्यान न देकर उल्टे फिर से उन्हें परेशान किया जा रहा है ताकी वे अपने जंगल को बचाने की लड़ाई ही छोड़ दें।

स्क्रॉल वेबसाइट के मुताबिक नियामगिरी सुरक्षा समिति ने पुलिस के इस कदम की निंदा करते हुए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को एक ज्ञापन सौंपा है, जिसमें मांग की गयी है कि नियामगिरी पहाड़ी पर रहने वाले आदिवासी समूह को उनका लोकतांत्रिक अधिकार सौंपा जाये और राज्य सरकार को पुलिस के इन मनमाने कार्रवाईयों की समीक्षा करनी चाहिए और दोषियों पर कार्यवायी होनी चाहिए।

लोकतंत्र में अहिंसक आंदोलनों के लिये ही जगह है, संविधान के दायरे में रहकर ही कोई लड़ाई जीती जा सकती है, ये लगभग सभी जनआंदोलनों के लोग मानते हैं, लेकिन सरकार अगर इन अहिंसक और संवैधानिक लड़ाईयों को ही कुचलने की कोशिश करे तो फिर क्या रास्ता बचता है..?

सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है.

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