चालीस साला औरतें : इस तरह ढह जाता है एक देश

कविताओं ने हमेशा ही फासीवाद के खिलाफ लड़ाई की है । कविताओं ने हमेशा ही समाज को सही राह दिखाने का काम किया गया है और हमेशा ही फासिज्म के विरुद्ध हथियारों से अधिक ताकतवर भूमिका साहित्य ने निभाई है ।

अतिथि लेखक
Updated on : 2018-07-25 12:49:19

चालीस साला औरतें : इस तरह ढह जाता है एक देश

नित्यानंद गायेन द्वारा रचित ‘इस तरह ढह जाता है एक देश’ और अंजू शर्मा द्वारा लिखित ‘चालीस साला औरतें’ के लोकार्पण के अवसर पर लेखकों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कविता को फासीवाद विरोधी एक औजार के रूप में चिन्हित किया

अरुण प्रधान

दिनांक 21/07/2018 को नव सर्वहारा सांस्कृतिक मंच की ओर से नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में अधिकरण प्रकाशन से प्रकाशित युवा कवि नित्यानंद गायेन के कविता संग्रह ‘इस तरह ढह जाता है एक देश’ और कवयित्री अंजू शर्मा के कविता संग्रह ‘चालीस साला औरतें’ के लोकार्पण के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया गया । कार्यक्रम में आरंभिक वक्तव्य देते हुए शिवमंगल सिद्धान्तकर ने कहा कि कुछ वर्षों पहले नव सर्वहारा सांस्कृतिक मंच ने ‘अंधेरे के खिलाफ कविताएं’ सीरीज में अंबुज और विष्णु नागर के एकल कविता पाठ करवाए थे जो हमारे फासीवाद विरोधी अभियान के हिस्से रहे हैं और भी कार्यक्रम हुए पर नवसम पूर्ण सांगठिन रूप नहीं ले सका है । इन दो कविता संग्रहों के लोकार्पण के साथ संगठन को पुनर्गठित किये जाने की योजना है । कई प्रदेशों में कुछ कार्यक्रम आयोजित करने के बाद अखिल भारतीय सम्मलेन कर देश स्तर पर इसे गठित किया जाएगा I शिवमंगल सिद्धान्तकर मार्क्स के हवाले से कहा कि कविता मनुष्यता की मातृभाषा है और नलिन विलोचन शर्मा के इस कथन को दोहराया कि मानवता के कुछ एक पर्यायों में कविता भी एक है । इस तरह मार्क्स से लेकर उदार बूर्ज्वा लेखकों तक ने मानवता विरोधी फासीवाद के खिलाफ कविता को एक संघर्ष के औजार के रूप में चिन्हित किया है । इस तरह मैं समझता हूँ कि कविता फासीवाद से लड़ने का एक औजार है I इस दृष्टि से नित्यानंद गायेन का पूरा संग्रह फासीवाद के खिलाफ संघर्ष के औजार के रूप में चिन्हित किया जा सकता है । और अपने ढंग से अंजू शर्मा की कविताएं भी इसी भूमिका की तरफ जाती हुई दिखती हैं।

शिवमंगल सिद्धान्तकर ने कहा कि कविताओं ने हमेशा ही फासीवाद के खिलाफ लड़ाई की है । खुसरो का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कवि हमेशा ही शोषण और दमन के खिलाफ आवाज उठाता रहा है I और संस्कृति साहित्य और मुख्य रूप से कविता किस तरह से फासीवाद से लड़ने के औजार के रूप में है इस दिशा में नवसम अपनी प्रमुख भूमिका अदा करेगा।

कार्यक्रम का समापन करते हुए आनंद स्वरूप वर्मा ने कविताओं के महत्व को बताते हुए कहा कि कविताओं ने हमेशा ही समाज को सही राह दिखाने का काम किया गया है और हमेशा ही फासिज्म के विरुद्ध हथियारों से अधिक ताकतवर भूमिका साहित्य ने निभाई है । इस संदर्भ में उन्होंने जस्टिस जे. एस. वर्मा के लेख का हवाला दिया कि किस तरह सियाराम शरण गुप्त की बचपन में पढ़ी हुई एक कविता ने दलितों के मंदिर में प्रवेश के पक्ष में फैसला देने की दिशा दिखाई थी ।

आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि दुनियाभर में जहां–जहां फासीवाद आया है वहां–वहां कविता और अपने आपको कवियों ने फासीवाद के खिलाफ खड़ा किया है I कुछ वर्ष पहले लेखकों द्वारा पुरस्कार वापसी ने भी मौजूदा फासीवादी सत्ता को हिला दिया था जिसका असर आज भी कायम है ।

मशहूर कवि मंगलेश डबराल ने दुनियाभर के फासीवाद विरोधी लेखकों जैसे लोर्का और ब्रेख्त इत्यादि के हवाले से काफी विस्तार से बताया कि फासीवाद के खिलाफ लेखकों ने अपने लेखन और संगठन के द्वारा किस तरह से संघर्ष किया था । आज हमारे लिए वे प्रेरणा के स्त्रोत हैं ।

नित्यानंद गायेन की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए मंगलेश डबराल ने कहा कि ये कविताएं अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करते हुए, सीधी और सरल भाषा में हमारे सामने खड़ी फासीवादी ताकतों का पुरजोर विरोध करती हैं । वर्तमान सत्ता के चरित्र को बताती यह कविताएं पूरे नयेपन के साथ पाठकों से सीधे संवाद करती हैं । ‘नफरत की इस दुनिया में मैं प्रेम करूंगा’ कविता का उदाहरण देते हुए वे कवि की इन विपरीत परिस्थितियों में भी आशावादिता को रेखांकित करते हैं ।

अंजू शर्मा की कविताओं पर बोलते हुए आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि अंजू शर्मा की कविताएं अपने आस–पास की प्रकृति को समेटे हुए मध्यमवर्गीय महिलाओं के जीवन पर केन्द्रित कविताएं हैं । ये कविताएं केवल महिलाओं की स्थिति को ही नहीं बताती बल्कि महिलाओं के दुनिया को देखने के नज़रिये को भी बताती हैं । इन कविताओं में विषय की विविधता भी है और कई आधुनिक विषयों को गम्भीरतापूर्वक चुना गया है । उनकी कविताएं केवल स्त्रियों की स्थिति पर ही नहीं बल्कि मौजूदा राजनैतिक परिस्थिति पर भी अपनी नजर रखती हैं ।

इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध साहित्यकार व पत्रकार महेश दर्पण ने नित्यानंद गायेन की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इनकी कविताएं फासीवादी सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की कविताएं हैं । जिन पर बहुत कुछ कहा जा सकता है । और आज इस प्रकार की शुद्ध राजनैतिक कविताओं की आवश्यकता है जिनकी भाषा सरल हो और जो आम जन तक आसानी से पहुँच सके ; अंजू शर्मा की कविताएँ मैं पढ़ता रहा हूँ औैर मेरी नजर में उनकी कविताओं का महत्वपूर्ण स्थान है ।

कार्यक्रम में नित्यानंद गायेन ने ‘इस तरह ढह जाता है एक देश’, ‘अन्तिम समय में तानाशाह’ और ‘बच्चों ने शैतान को देखा’ आदि कविताओं का पाठ किया । अंजू शर्मा ने भी अपनी कविता ‘विचार कभी नही मरते’ व ‘दीवारें’ आदि कविता का पाठ किया तथा अपनी कविता ‘चालीस साला औरतें’ के भी कुछ अंश प्रस्तुत किये ।

कार्यक्रम का संचालन नवसम के संयोजक अरूण प्रधान ने किया । इस कार्यक्रम में अन्य महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के रूप में विनीत तिवारी, अभिषेक श्रीवास्तव, संदीप राउजी, डॉ पूरन सिंह, कमलेश कमल, गोपाल शून्य, निवेदिता झा, वंदना ग्रोवर, नरेन्द्र, नीलिमा शर्मा, विवेक मिश्र, रमा भारती, राजेश चंद्रा, राजीव तनेजा, हर्ष मेहता इत्यादि लोग शामिल थे ।

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