तापमान में भारत से डेढ़ गुना बढ़ोत्‍तरी कर रही है दुनिया, खासकर विकसित देश

लक्ष्‍य से भटकाव : जी20 देशों की जलवायु सम्‍बन्‍धी बैठक में ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र पर बात करना सबसे जरूरी- रिपोर्ट...

तापमान में भारत से डेढ़ गुना बढ़ोत्‍तरी कर रही है दुनिया, खासकर विकसित देश

लक्ष्‍य से भटकाव : जी20 देशों की जलवायु सम्‍बन्‍धी बैठक में ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र पर बात करना सबसे जरूरी- रिपोर्ट

G20 climate action

जलवायु परिवर्तन व पर्यावरण पर एक वैश्विक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जी20 में शामिल किसी भी देश की गतिविधियां वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस से कम रखने के लक्ष्‍य के अनुरूप नहीं है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है जो दो डिग्री के लक्ष्‍य की प्राप्ति के करीब है। दुनिया अब भी तापमान में 3.2 डिग्री की बढ़ोत्‍तरी की राह पर बढ़ रही है। जी20 देशों को वर्ष 2030 तक मोटे तौर पर अपने उत्‍सर्जन की मात्रा आधी करनी होगी, लेकिन उनमें से कुछ ही देशों के पास इस लक्ष्‍य की प्राप्ति के लिये दीर्घकालिक रणनीति है। सऊदी अरब, ऑस्‍ट्रेलिया और रूस इस मामले में पीछे हैं।

जी-20 देशों की 13वीं शिखर वार्ता से दो सप्ताह पहले आज क्लाइमेट ट्रांसपेरेंसी Climate Transparency ने ‘ब्राउन टू ग्रीन 2018’ Brown to green 2018 रिपोर्ट जारी की।

जी 20 लीडर्स का शिखर सम्मेलन ब्यूनस आयर्स में आगामी 30 नवंबर से एक दिसंबर तक आयोजित होगा।

पेरिस समझौते में तय किए गए लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने में दुनिया की 20 प्रमुख अर्थव्‍यवस्‍थाओं की निर्णायक भूमिका है। हो भी क्‍यों न, आखिर दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्‍सर्जन में 80 प्रतिशत हिस्‍सेदारी इन्‍हीं अर्थव्‍यवस्‍थाओं की ही है। लिहाजा,‘क्‍लाइमेट ट्रांसपेरेंसी’ ने आगामी 30 नवम्‍बर से 1 दिसम्‍बर 2018 तक अर्जेंटीना के ब्‍यूनस आयर्स में आयोजित होने वाली जी-20 देशों की 13वीं शिखर वार्ता से पहले आज ‘ब्राउन टू ग्रीन 2018’ G20 Brown to Green Report 2018 रिपोर्ट जारी की।

ब्राउन ग्रीन रिपोर्ट जी20 देशों के जलवायु सम्‍बन्‍धी कदमों के बारे में दुनिया का सबसे विस्‍तृत विश्‍लेषण है। यह इसका चौथा संस्‍करण है। इसे क्‍लाइमेट ट्रांसपेरेंसी नामक संगठन ने संकलित किया है।

आज जारी हुई ब्राउन टू ग्रीन रिपोर्ट-2018 के अनुसार जी20 देशों में कुल ऊर्जा आपूर्ति का 82 प्रतिशत हिस्‍सा जीवाश्‍म ईंधन से आता है। सऊदी अरब, ऑस्‍ट्रेलिया और जापान जैसे देशों में तो यह प्रतिशत 90 से भी ज्‍यादा है। हाल के वर्षों में इस स्थिति में या तो बहुत थोड़ा, या फिर बिल्‍कुल भी बदलाव नहीं हुआ है। दुनिया की प्रमुख 20 अर्थव्‍यवस्‍थाएं पैरिस समझौते के तहत निर्धारित लक्ष्‍यों की प्राप्ति में निर्णायक भूमिका निभाती हैं, क्‍योंकि विश्‍व भर में होने वाले ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्‍सर्जन में इन देशों की 80 प्रतिशत हिस्‍सेदारी है।

          इस रिपोर्ट के सह-लेखकों में शामिल चीन के एनर्जी रिसर्च इंस्‍टीट्यूट के जिंग केजिन ने कहा कि

“हाल में जारी आईपीसीसी 1.5 डिग्री सेल्सियस रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनिया को जलवायु परिवर्तन के मसले पर बहुत तेजी से काम करना होगा। ज्‍यादातर जी20 देशों में कोयले, तेल तथा गैस से बिजली बनाये जाने और प्रदूषणकारी परिवहन साधनों का इस्‍तेमाल किए जाने से सबसे ज्‍यादा प्रदूषण फैलता है।”

          उन्‍होंने कहा कि

“कोई भी जी20 देश इन क्षेत्रों की तरफ समुचित ध्‍यान नहीं दे रहा है। खासकर ऑस्‍ट्रेलिया, अमेरिका, रूस और इंडोनेशिया। ये सभी पैरिस समझौते के लक्ष्‍यों की प्राप्ति के प्रयासों के मामले में बहुत पीछे हैं। हालांकि ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने कोयले और अन्‍य जीवाश्‍म ईंधन से चलने वाली कारों को चरणबद्ध ढंग से हटाने का निर्णय लेकर सार्थक कदम उठाये हैं।”  

          रिपोर्ट के एक अन्‍य सह-लेखक जान बर्क (जर्मनवॉच) ने कहा कि

“दरअसल जी20 देशों को वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिये वर्ष 2030 तक अपने यहां होने वाले प्रदूषणकारी तत्‍वों के उत्‍सर्जन की मात्रा आधी करनी पड़ेगी।”

          उन्‍होंने कहा कि

“लेकिन इस दिशा में त्‍वरित कदम उठाने के बजाय जी20 देश जलवायु को और बर्बाद करने वाली चीजों पर भारी धन निवेश कर रहे हैं। जैसे कि कड़े कदम उठाने के बजाय जीवाश्‍म ईंधन पर सब्सिडी देना आदि। सऊदी अरब, इटली, ऑस्‍ट्रेलिया और ब्राजील प्रति जीडीपी सबसे ज्‍यादा मात्रा में यह सब्सिडी उपलब्‍ध करा रहे हैं।”

          मिशन 2020 की संयोजक और यूएनएफसीसीसी (2010-2015) की पूर्व अधिशासी सचिव क्रिस्‍टीना फिगरेस ने कहा “वर्ष 2020 में दुनिया में प्रदूषणकारी तत्‍वों के उत्‍सर्जन में कमी लाये जाने की आवश्‍यकता है।

ब्राउन टू ग्रीन रिपोर्ट हमें इस बात का स्‍वतंत्र अंदाजा दिलाती है कि हम आखिर कहां खड़े हैं। यह देशों के लिये बेहद कीमती जानकारी का दस्‍तावेज है, खासकर तब, जब वे वर्ष 2020 में जलवायु परिवर्तन को सम्‍भालने के अपने इरादों का एलान करेंगे।”

ब्राउन टू ग्रीन 2018’ रिपोर्ट के प्रमुख तथ्‍य

Key points of 'Brown to Green 2018' report

• दक्षिण अफ्रीका, ऑस्‍ट्रेलिया और इंडोनेशिया जी20 में शामिल ऐसे देश हैं जो प्रदूषणकारी तत्‍वों का सबसे ज्‍यादा उत्‍सर्जन करते हैं, क्‍योंकि इनके यहां ऊर्जा के साधन के तौर पर जीवाश्‍म ईंधन का बहुत ज्‍यादा इस्‍तेमाल होता है। इनमें से किसी भी देश के पास कोयले के प्रयोग को चरणबद्ध तरीके से बंद करने की पर्याप्‍त नीतियां नहीं हैं। हालांकि दक्षिण अफ्रीका ने हाल में अपने यहां कोयले के इस्‍तेमाल में कमी लाने की योजना पेश की थी। जी20 के 14 देशों द्वारा अपने यहां ऐसे ही फेज-आउट लक्ष्‍य तय किए जाने की जरूरत है। कनाडा, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन ने अपने यहां कोयले के प्रयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्‍त करने की तारीखें तय कर ली हैं, लेकिन दरअसल ये देश पहले ही कोयले का ज्‍यादा इस्‍तेमाल नहीं करते।

• जी20 में शामिल किसी भी देश के पास वर्ष 2050 तक अक्षय ऊर्जा पर 100 फीसद निर्भर होने का कोई लक्ष्‍य नहीं है। अक्षय ऊर्जा के लक्ष्‍य तय करने और इससे सम्‍बन्धित नीतियां बनाने के मामले में अर्जेंटीना, ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी, जापान, दक्षिण अफ्रीका और ब्रिटेन अग्रणी हैं।

जीवाश्‍म ईंधन fossil fuel से चलने वाली कारों का चलन चरणबद्ध तरीके से बंद करने की योजनाओं के मामले में फ्रांस, जापान और ब्रिटेन अग्रणी हैं। हालांकि महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍यों के बावजूद फ्रांस में परिवहन क्षेत्र द्वारा उत्‍सर्जन की मात्रा में लगातार वृद्धि हो रही है। परिवहन की बढ़ती मांग और परिवहन के तौर-तरीकों में प्रभावी बदलाव सम्‍बन्‍धी अपर्याप्‍त नीतियों की वजह से ऐसा हो रहा है। अमेरिका, कनाडा और ऑस्‍ट्रेलिया सबसे फिसड्डी हैं। इन सभी देशों में प्रतिव्‍यक्ति परिवहन उत्‍सर्जन की मात्रा सबसे ज्‍यादा है। साथ ही उन देशों में कारों के लिये उत्‍सर्जन सम्‍बन्‍धी मानक या तो अपर्याप्‍त हैं, या फिर हैं ही नहीं।

. यूरोपीय यूनियन एकमात्र जी20 अर्थव्‍यवस्‍था है जिसने वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिये विनिर्माण क्षेत्र से सम्‍बन्धित योजना तैयार की है। विनिर्माण क्षेत्र से सर्वाधिक उत्‍सर्जन के मामले में कनाडा और जर्मनी सबसे आगे हैं, लेकिन इन दोनों के पास सभी नयी इमारतों को जीरो-एनर्जी बनाने के लक्ष्‍य मौजूद हैं।

• औद्योगिक क्षेत्र में, यूरोपीय संघ ही एकमात्र ऐसा संगठन है जिसके पास प्रदूषणकारी तत्‍वों के उत्‍सर्जन में कमी लाने की नीतियां हैं। उद्योग क्षेत्र द्वारा उत्‍सर्जन के मामले में दक्षिण अफ्रीका, रूस और चीन सबसे आगे हैं। यह ध्‍यान देने योग्‍य है कि अगर कहीं और उत्‍पादित एनर्जी इंटेंसिव सामान के उत्‍पादन से होने वाले उत्‍सर्जन को शामिल करें तो विकसित देशों का उत्‍सर्जन 10 से 20 प्रतिशत ज्‍यादा होगा।

• देखा जाए तो वर्ष 1990 से अब तक वन सम्‍पदा की क्षति सहन करने के मामले में इंडोनेशिया, ब्राजील और अर्जेंटीना सबसे आगे हैं। मगर, इनमें से किसी ने भी इस स्थिति को बदलने का कोई इरादा जाहिर नहीं किया।

• अनेक जी20 देशों ने अपने वित्‍तीय तंत्र को पर्यावरण के प्रति मित्रवत बनाने, वित्‍तीय व्‍यवस्‍था को निम्‍न कार्बन परिदृश्‍य की तरफ लाने तथा पर्यावरण के अनुकूल विकास की ओर बढ़ने के लिये नीतियां तैयार की हैं। हालांकि उनमें से कुछ ही देशों ने इन योजनाओं पर ठीक तरीके से अमल शुरू किया है और ‘ब्राउन फाइनेंसिंग’ को सुव्‍यवस्थित तरीके और चरणबद्ध ढंग से समाप्‍त करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

• समाप्‍त करने के पुराने संकल्‍प के बावजूद वर्ष 2007 से 2016 के बीच जीवाश्‍म ईंधन पर सब्सिडी की धनराशि 75 अरब डॉलर से बढ़कर 147 अरब डॉलर तक पहुंच गयी। हालांकि वर्ष 2015-16 में इसमें गिरावट दर्ज की गयी। जी-20 देशों ने वर्ष 2013 से 2015 के बीच जीवाश्‍म ईंधन आधारित परियोजनाओं पर सब्सिडी की मद में औसतन 91 अरब डॉलर खर्च किए।

• सिर्फ कनाडा और फ्रांस ने वर्ष 2016 में जीवाश्‍म ईंधन पर सब्सिडी की मद में खर्च की गयी धनराशि के मुकाबले वर्ष 2017 में कार्बन प्राइसिंग के जरिये अधिक धन अर्जित किया। हालांकि कनाडा के अनेक प्रान्‍तों में कार्बन प्राइसिंग की योजनाएं कानूनी चुनौतियों का सामना कर रही हैं।

क्या है क्‍लाइमेट ट्रांसपेरेंसी

What is Climate Transparency

यह संगठन 14 जलवायु अनुसंधान संगठनों तथा गैर सरकारी संस्‍थाओं की वैश्विक साझीदारी है। इनमें से ज्‍यादातर संस्‍थाएं जी20 देशों की हैं, उनमें से भी कई तो उभरती हुई अर्थव्‍यवस्‍थाओं वाले देशों से हैं। यह रिपोर्ट 2017 से सम्‍बन्धित उत्‍सर्जन सम्‍बन्‍धी ताजा आंकड़ों पर आधारित है। इसमें डी-कार्बनाइजेशन, जलवायु सम्‍बन्‍धी नीतियों, वित्‍त तथा जलवायु परिवर्तन के कारण उत्‍पन्‍न जोखिमों सम्‍बन्‍धी 80 संकेतकों को शामिल किया गया है। रिपोर्ट में रेटिंग के जरिये जी20 देशों में पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से अग्रणी और पिछड़े देशों की पहचान भी की गयी है।


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