प्यार अगर थामता न पथ में...

निरवंशी रहता उजियाला गोद न भरती किसी किरन की, और ज़िन्दगी लगती जैसे- डोली कोई बिना दुल्हन की, दुख से सब बस्ती कराहती, लपटों में हर फूल झुलसता करुणा ने जाकर नफ़रत का आँगन गर न बुहारा होता। प्यार ...

प्यार अगर थामता न पथ में...

राजीव मित्तल

जब गुनगुनाने से मामला आगे बढ़ा तो हकीक़त का ... होके मजबूर मुझे और कारवां गुजर गया जुबान पे चढ़ चुके थे..बस थोड़ा फर्क यह था कि कैफ़ी आज़मी बहुत दूर थे और नीरज बहुत पास..

फिर 1970 के फागुन में प्रेमपुजारी देख कर निकला तो दिल ओ दिमाग में बस .फूलों के रंग से दिल की कलम..से गूंज रहा था..गीत के रोम रोम में रोमांस छलक रहा था..लेकिन तब तलक रोमांस से अपन की एक कदम की दूरी बची थी..और जो मिली भी तो उससे बहुत शरमा रहा था, अन्यथा नीरज की प्रतिमा तभी न बन जाती..

उसके बाद 1971 की बरसातों में मद्रास में देखी गई ...तेरे मेरे सपने..देख सुन कर एक बार फिर दुनिया घूमने लगी..

हम और बंधेंगे..

हम तुम कुछ और बंधेंगे..

होगा कोई बीच तो हम और बंधेंगे

 

माई गॉड..दिल ओ दिमाग के पुर्जे हिला दिए थे इंटर का इम्तिहान दिए इस छोरे के..

 

और कुछ महीनों बाद उषा दीदी की डायरी में एक गीत मिला नीरज का..तो डायरी अपने पास ही रहती..एक खुशबू सी..उषा दी के पेन की चेलपार्क की ब्लू एंड ब्लैक इंक से लिखी डायरी ..कई खुशबुओं से लबरेज..

 

प्यार अगर थामता न पथ में उँगली इस बीमार उमर की

हर पीड़ा वेश्या बन जाती, हर आँसू आवारा होता।

 

निरवंशी रहता उजियाला

गोद न भरती किसी किरन की,

और ज़िन्दगी लगती जैसे-

डोली कोई बिना दुल्हन की,

दुख से सब बस्ती कराहती, लपटों में हर फूल झुलसता

करुणा ने जाकर नफ़रत का आँगन गर न बुहारा होता।

प्यार अगर...

 

मन तो मौसम-सा चंचल है

सबका होकर भी न किसी का

अभी सुबह का, अभी शाम का

अभी रुदन का, अभी हँसी का

और इसी भौंरे की ग़लती क्षमा न यदि ममता कर देती

ईश्वर तक अपराधी होता पूरा खेल दुबारा होता।

प्यार अगर...

 

जीवन क्या है एक बात जो

इतनी सिर्फ समझ में आए-

कहे इसे वह भी पछताए

सुने इसे वह भी पछताए

मगर यही अनबूझ पहेली शिशु-सी सरल सहज बन जाती

अगर तर्क को छोड़ भावना के सँग किया गुज़ारा होता।

प्यार अगर...

 

मेघदूत रचती न ज़िन्दगी

वनवासिन होती हर सीता

सुन्दरता कंकड़ी आँख की

और व्यर्थ लगती सब गीता

पण्डित की आज्ञा ठुकराकर, सकल स्वर्ग पर धूल उड़ाकर

अगर आदमी ने न भोग का पूजन-पात्र जुठारा होता।

प्यार अगर...

 

जाने कैसा अजब शहर यह

कैसा अजब मुसाफ़िरख़ाना

भीतर से लगता पहचाना

बाहर से दिखता अनजाना

जब भी यहाँ ठहरने आता एक प्रश्न उठता है मन में

कैसा होता विश्व कहीं यदि कोई नहीं किवाड़ा होता।

प्यार अगर...

 

हर घर-आँगन रंग मंच है

औ’ हर एक साँस कठपुतली

प्यार सिर्फ़ वह डोर कि जिस पर

नाचे बादल, नाचे बिजली,

तुम चाहे विश्वास न लाओ लेकिन मैं तो यही कहूँगा

प्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता।

प्यार अगर...

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