आरटीआई में हुआ खुलासा, दिल्ली का प्रदूषण स्तर इन सर्दियों में 1700 तक पहुंचा, नाकाम ही बना रहा जीआरएपी  

जीआरएपी को जनवरी 2017 में अधिसूचित किया गया था, मगर इस नीति के लागू होने के बावजूद दिल्ली को वर्ष 2017-18 की सर्दियों में प्रदूषण के खतरनाक स्तरों से जूझना पड़ा। ...

नई दिल्ली, 11 जनवरी: दिल्ली के रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (Resident Welfare Association of Delhi,) की शीर्ष संस्था यूनाइटेड रेजीडेंट्स ज्वाइंट एक्शन - यूनाइटेड रेजिडेंट्स ज्वाइंट एक्शन (United Residents Joint Action)  (ऊर्जा) ने दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिये लागू किये गये ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान - Graded Response Action Plan (जीआरएपी) की प्रभावशीलता, प्रदूषण (Pollution) के दमघोंटू स्तर तक पहुंचने के तीन साल बाद इसे लेकर नागरिकों में जागरूकता के स्तर और जीआरएपी को लागू करने के लिये जिम्मेदार संस्थाओं की जवाबदेही मापने की कोशिश की है।

ऊर्जा ने आर्क फाउंडेशन की मदद से एक सर्वेक्षण भी कराया है। इसका उद्देश्य दिल्ली के निवासियों के बीच वायु प्रदूषण को लेकर जागरूकता के स्तर का पता लगाना था। यह सर्वेक्षण केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board) (सीपीसीबी) द्वारा दिल्ली के 10 इलाकों रोहिणी, आनंद विहार, आईटीओ, सिरी फोर्ट, बवाना, आर.के. पुरम, पटपड़गंज, लोधी रोड, द्वारका और अशोक विहार में लगे प्रदूषण निगरानी केन्द्रों के पांच किलोमीटर की परिधि में किया गया। जिन लोगों पर यह सर्वे किया गया, उनमें से 89 प्रतिशत को ऐसी किसी भी निगरानी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वहीं, 88 प्रतिशत लोगों ने वायु की गुणवत्ता सम्बन्धी आंकड़े प्रदर्शित करने वाले एलईडी स्क्रीन को नहीं देखा था। इस तरह वे नवम्बर 2018 से सात जनवरी 2019 के बीच प्रदूषण के खतरनाक स्तरों से बिल्कुल अनजान थे। इस दौरान जहां आनंद विहार में प्रदूषण का स्तर 960 से ज्यादा रहा, वहीं आठ नवम्बर को आईटीओ में यह आंकड़ा 1700 तक पहुंच गया। इसके अलावा लोधी रोड इलाके में प्रदूषण का स्तर 900 से ज्यादा पाया गया। अन्य क्षेत्रों का भी कमोबेश यही हाल रहा।

इस प्रयास के तहत केन्द्र, राज्य तथा नगरीय निकायों के 14 विभागों में आरटीआई कानून 2005 (RTI Act 2005) के अन्तर्गत दाखिल की गई 45 आवेदनों पर सामने आए तथ्यों को जारी किया गया है।

क्या है ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान – जीआरएपी

What is Graded Response Action Plan - GRAP

जीआरएपी को जनवरी 2017 में अधिसूचित किया गया था, मगर इस नीति के लागू होने के बावजूद दिल्ली को वर्ष 2017-18 की सर्दियों में प्रदूषण के खतरनाक स्तरों से जूझना पड़ा। यहां तक कि उस साल गर्मी के मौसम में भी प्रदूषण का स्तर चिंताजनक रूप से काफी ज्यादा था। अप्रैल, मई और जून में सीबीसीबी द्वारा जारी आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। वर्ष 2018 में दिल्ली को सिर्फ पांच दिन स्वच्छ हवा मिली। इसके अलावा 66 दिन प्रदूषण के लिहाज से औसत रहे। वहीं, 145 दिन प्रदूषण का स्तर खराब, 57 दिन बहुत खराब और 92 दिन अत्यधिक खराब रहा।

जीआरएपी के मुताबिक वायु की गुणवत्ता के रखरखाव के लिये सीपीसीबी, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) जिम्मेदार हैं। इन एजेंसियों से अपेक्षा की जाती है कि वे वायु प्रदूषण सम्बन्धी डेटा को प्रोसेस करके वायु की गुणवत्ता की स्थिति के बारे में ईपीसीए को बताए। ईपीसीए इसके मद्देनजर वायु प्रदूषण से निपटने के लिये उठाये जाने वाले कदम सुझाती है और उन्हें सम्बन्धित प्राधिकरणों तक पहुंचाती हैं। इन प्राधिकरणों से अपेक्षा की जाती है कि वे सम्बन्धित दिनों में जीआरएपी और वायु प्रदूषण के स्तरों के हिसाब से उनके नियंत्रण के लिये कदम उठाएंगे।

आरटीआई आवेदनों के जवाब में मिली सूचनाओं से यह पता चलता है कि वायु की गुणवत्ता (Quality of air) खराब होने की स्थिति में त्वरित कदम उठाने के लिये इतनी विस्तृत प्रक्रिया और अधिसूचना की मौजूदगी के बावजूद इसे सही तरीके से लागू नहीं की गई। यहां तक कि जीआरएपी के क्रियान्वयन पर नजर रखने के लिये जिम्मेदार विभागों में सूचनाशून्यता और जागरूकता का अभाव भी पाया गया।

ईपीसीए ने आरटीआई याचिका में पूछे गये सात सवालों में से सिर्फ एक का ही जवाब दिया। वह यह कि जीआरएपी पर 18 बैठकें आयोजित की गयीं और इनमें हिस्सा लेने वालों की सूची से दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन और लोक निर्माण विभाग गायब रहे। परिवहन विभाग का जवाब था कि प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों का चालान किया गया और कार से चलने वाली कारों के मुकाबले डीजल वाली कारों पर ज्यादा कर लगाया गया, मगर विभाग द्वारा वसूले गये पर्यावरण प्रदूषण सम्बन्धी शुल्क के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

जहां सीपीसीबी ने जवाब दिया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित उच्च प्रदूषण श्रेणी वाली 17 औद्योगिक इकाइयों में से केवल तीन के द्वारा ही सीपीसीबी के मानकों का पालन किया गया। इनमें से दो तो अपने आप बंद हो गयीं जबकि एक ने प्रदूषण के सभी मानकों का पालन किया। बहरहाल, दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में प्रदूषण नियंत्रण के मानकों का पालन करने वाली औद्योगिक इकाइयों की संख्या से सही तस्वीर का पता चलता है।

आरटीआई अर्जी के जवाब के मुताबिक हरियाणा में 161 में से पांच राजस्थान में 161 में से 20 और उत्तर प्रदेश में 942 में से महज 25 औद्योगिक इकाइयां ही प्रदूषण नियंत्रण के मानकों पर खरी उतर सकी। सफर के मुताबिक वर्ष 2010 के मुकाबले 2018 में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन में 48 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसा दिल्ली के अंदर नहीं बल्कि उसकी सीमा से सटे क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि के कारण हुआ है।

 

ऊर्जा के अध्यक्ष अतुल गोयल ने कहा “ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान बहुत सोच-समझकर तैयार की गई नीति है। इसे जमीन पर लागू करने की जरूरत है। इससे दिल्ली में हर रोज बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने में मदद मिलेगी। बहरहाल, आरटीआई के जवाबों से पता चलता है कि सम्बन्धित ज्यादातर एजेंसियां और विभाग अपने उन कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से अनजान हैं, जिनका साफ जिक्र जीआरएपी में किया गया है। एजेंसियों से अनेक महत्वपूर्ण सवालों के जवाब नहीं दिये हैं। ऐसे में यह जाहिर है कि या तो वे जीआरएपी के तहत उठाये जाने वाले कदमों से अनजान हैं या फिर अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहतीं। दोनों ही हालात में जीआरएपी एक नाकामी है और इसने दिल्ली वालों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।”

ऊर्जा की आरटीआई याचिकाओं से मिले नतीजे यह बताते हैं कि वायु प्रदूषण की समस्या के लगातार बरकरार रहने, जनस्वास्थ्य पर उसके दुष्प्रभावों और दिल्ली के प्रदूषण की वैश्विक राजधानी के रूप में कुख्यात होने के बावजूद जिम्मेदार लोग इस समस्या के निदान के प्रति गम्भीर नहीं हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन द्वारा नेशनल क्लीन एयर प्लान (एनसीएपी) की घोषणा किये जाने की सम्भावना है। संसद में चार जनवरी 2019 को उठाये गये एक सवाल पर पर्यावरण मंत्री डाक्टर हर्ष वर्द्धन ने कहा कि एनसीएपी प्रदूषण की बढ़ती हुई समस्या से निपटने के लिये देशव्यापी पंचवर्षीय रणनीति है। इसके तहत वर्ष 2024 तक पीएम 2-5 और पीएम10 के स्तरों में 20&30 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य है। इसके लिये वर्ष 2017 को आधार वर्ष माना गया है। मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले (नान अटेनमेंट) 102 शहरों में एनसीएपी को लागू किया जाएगा। इस पर दो साल में 300 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है।

ऊर्जा के मुख्य अधिषासी अधिकारी अतुल गोयल ने कहा “एनसीएपी एक स्वागतयोग्य योजना है और हम सरकार द्वारा इसकी औपचारिक घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। इससे इस तथ्य को मान्यता मिलेगी कि वायु प्रदूषण सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत के शहरों पर असर डाल रहा है। बहरहाल, जीआरएपी के हश्र और दिल्ली में प्रदूषण की रोकथाम में इसकी कामयाबी की दर मद्देनजर यह देखना दिलचस्प होगा कि एनसीएपी को देश के द्वितीय तथा तृतीय श्रेणी के शहरों में किस तरह लागू किया जाता है। वायु प्रदूषण अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपदा बनता जा रहा है और जिम्मेदारों द्वारा इसका संज्ञान लिये जाने का यह सही समय है।“

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण भारत में स्वास्थ्य के नुकसान के तौर पर चुकायी गई कीमत इसके सकल घरेलू उत्पाद के 3 प्रतिशत के बराबर है। पर्यावरण करों जैसे नीतिगत कदमों का इस्तेमाल कम खर्च में अधिक पर्यावरणीय लाभ पाने के लिये किया जा सकता है। पीएम10 कराधान जैसे नीतियों को लागू करके भारत 59 अरब डालर का अतिरिक्त मुनाफा कमा सकता है।

सवाल उठाने वाले आरटीआई आवेदनों से निकली प्रमुख बातें:

सीपीसीबी- आरटीआई से पता चला है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित उच्च प्रदूषण श्रेणी वाली 17 औद्योगिक इकाइयों में से केवल तीन के द्वारा ही सीपीसीबी के मानकों का पालन किया गया। इनमें से दो तो अपने आप बंद हो गयीं जबकि एक ने प्रदूषण के सभी मानकों का पालन किया। इसके विपरीत हरियाणा में 161 में से पांच, राजस्थान में 161 में से 20 और उत्तर प्रदेश में 942 में से महज 25 औद्योगिक इकाइयां ही प्रदूषण नियंत्रण के मानकों का पालन कर सकीं।

आश्चर्यजनक रूप से प्रदूषणकारी उद्योगों की सूची में भारी प्रदूषण फैलाने वाले वे ऊर्जा संयंत्र और अवैध निजी फैक्ट्रियां शामिल नहीं की गई हैं, जो अब भी कोयले और तेल से चलती हैं। इनमें कचरे के निस्तारण के समुचित बंदोबस्त नहीं हैं और वे हवा में भारी मात्रा में धूल छोड़ते हैं। ऐसा ज्यादातर राख के भारी उत्सर्जन के कारण होता है। इससे वायु (प्रदूषण का नियंत्रण एवं रोकथाम) अधिनियम का उल्लंघन होता है।

इससे पता चलता है कि एजेंसियों द्वारा प्रदूषण की निगरानी किया जाना कतई असरदार नहीं है। ओखला में एसडीएमसी के तहत संचालित संयंत्र को वर्ष 2014 में एनजीटी द्वारा गठित टीमों के निरीक्षण के बाद प्रदूषणकारी तत्वों का उत्सर्जक माना गया। आरटीआई से हुए खुलासे से एनडीएमसी द्वारा सितम्बर 2018 के दौरान बड़े पैमाने पर प्रदूषणकारी औद्योगिक इकाइयों को सील करने की कार्रवाई पर भी सवाल उठते हैं।

सीपीसीबी और लोक निर्माण विभाग - सीपीसीबी ने सभी नगर निगमों को कचरा जलाने तथा निर्माण कार्यों से निकलने वाली धूल से होने वाले वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये प्रभावी कदम उठाने और यंत्रीकृत झाड़-पोंछ के निर्देश दिये थे। इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग ने अभी तक एक भी यंत्रीकृत वैक्यूम स्वीपिंग मशीन नहीं खरीदी है। एयर एम्बिएंस फंड में धन होने के बावजूद ऐसा नहीं किया जा रहा है। यह धन स्वच्छ वायु प्रौद्योगिकियों के विकास एवं इस्तेमाल, कचरा प्रबन्धन तथा सम्बन्धित अन्य गतिविधियों पर खर्च करने के लिये है, ताकि वायु प्रदूषण को कम करने के लिये स्वच्छ वायु सम्बन्धी नीतियों को बढ़ावा दिया जा सके।

सीपीसीबी- सीपीसीबी प्रदूषण निगरानी केन्द्रों तथा केन्द्रीय नियंत्रण कक्ष की सूचना नहीं दे सका। उसने न तो उपग्रह आधारित निगरानी केन्द्रों के बारे में और न ही इलेक्ट्रानिक ट्रैफिक निगरानी तंत्र के बारे में कोई जानकारी दी।

 

डीपीसीसी- डीपीसीसी ने 03जुलाई 2017 को दिल्ली में 20 स्थानों पर वायु की गुणवत्ता पर निगरानी के लिये केन्द्रों की स्थापना पर 19,06,81,086 रुपये खर्च किये। डीपीसीसी ने जनवरी 2017 में जीआरएपी के लागू होने के बाद वायु प्रदूषण पर नजर रखने के लिये एक भी रियल टाइम मानीटरिंग स्टेशन स्थापित नहीं किया।

लोक निर्माण विभाग- लोक निर्माण विभाग सड़कों से उठने वाली धूल को रोकने के लिये चौराहों तथा अन्य स्थानों पर लगाये गये फौव्वारों की संख्या के बारे में जवाब नहीं दे सका।

डीएमएआरसी- वायु प्रदूषण के विषय पर डीएमआरसी से पूछे गये सात सवालों में से किसी का भी जवाब नहीं दिया गया। डीएमआरसी ने कहा कि पूछे गये सवाल उसके विभाग से सम्बन्धित नहीं हैं। यह अचम्भित करने वाला है क्योंकि दिल्ली में सबसे ज्यादा निर्माण कार्य डीएमआरसी ही कराता है। उसके इस गैरजिम्मेदाराना जवाब से अपनी जवाबदेही के प्रति उसकी लापरवाही का पता लगता है।

परिवहन विभाग- पेट्रोल से चलने वाली कारों के मुकाबले डीजल वाली कारों पर अधिक कर लगाया गया है। हालांकि 2000 सीसी या उससे ज्यादा क्षमता वाले डीजल वाहनों के पंजीयन से वसूले जाने वाले पर्यावरण प्रदूषण सम्बन्धी शुल्क के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह भी पता लगा कि बुराड़ी स्थित वाणिज्यिक वाहन टेस्टिंग केन्द्र को अपग्रेड नहीं किया गया है और पिछले दो सालों के दौरान एक भी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया।

कचरे का जलाया जाना:

Burning of waste:

आरटीआई अर्जी से प्राप्त सूचना से पता चलता है कि एमसीडी ने बड़ी संख्या में कूड़ा जलाने वालों का चालान किया है। साथ ही इस सम्बन्ध में जागरूकता अभियान भी चलाया है। इसके बावजूद सभी वार्डों में कचरा जलाने का सिलसिला जारी है। इससे निकलने वाला जहरीला धुआं सांस लेने में दिक्कत और आंखों में जलन पैदा कर रहा है।

अधिकारियों का जो रवैया है, वह यही दिखाता है कि कूड़े को यूं ही फेंककर उसे जला दो और बला टालो। कूड़े के ऊंचे-ऊंचे ढेर लगे हैं। उनमें से अनेक में रात में चुपके से आग लगा दी जाती है। ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा किसी भी हालत में नहीं होने देना चाहिये, क्योंकि कूड़ा पूरी तरह जल नहीं पाता और इससे भारी प्रदूषण फैलता है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) द्वारा जारी निर्देशों के मुताबिक दिल्ली में कहीं भी खुले में कूड़ा फेंकने या उसे जलाने से 5000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।

मुंडका के रहने वाले सतीश कुमार और टिकरीकलां के निवासी महावीर सिंह ने हाल में एनजीटी में दाखिल की गई याचिका में आरोप लगाया कि मुंडका और नीलवाल गांवों में कृषि भूमि पर अवैध रूप से चल रही औद्योगिक इकाइयों द्वारा चमड़ा, प्लास्टिक, तेल तथा रबर जलाये जाने से भारी वायु प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है।

दिल्ली सरकार अब तक इस मुद्दे के समाधान के लिये कोई भी कदम उठाने में नाकाम रही है। अब तक साढ़े चार साल गुजर चुके हैं, लिहाजा एनजीटी ने उसे 25 करोड़ रुपये जुर्माना अदा करने को कहा है। इसके अलावा शाहदरा नाले के पास कूड़ा फेंकने और उसे जलाने का सिलसिला जारी है। यहां जिम्मेदार लोग ही नुकसानदेह कूड़े को जला रहे हैं।

टॉक्सिक लिंक रिपोर्ट-2013 (Toxic link report-2013) के मुताबिक दिल्ली में स्थित 1-3 लाख औद्योगिक इकाइयों में से एक लाख से भी ज्यादा तो रिहायशी इलाकों में स्थित अनाधिकृत और गैर-अनुरूपण क्षेत्रों में संचालित की जा रही हैं। इस समस्या से निपटने के लिये केन्द्र सरकार ने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 (Plastic West Management Rules 2016) जारी किया था। इसमें एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर्स रेस्पांसिबिलिटी के क्रियान्वयन और अनौपचारिक क्षेत्र को जोड़ने की बात कही गई थी। हालांकि नगर निगम के अधिकारियों द्वारा निगरानी और क्रियान्वयन के अभाव के कारण इन नियमों का समुचित पालन नहीं किया जा रहा है।

सरकार ने हर नियम का क्रियान्वयन सुनिश्चित कराने और इसकी स्थिति पर नजर रखने के लिये विशेष निगरानी समितियां बनायी थीं। इसके बावजूद टनों विषैला कचरा अब भी खुले में जलाने का सिलसिला जारी है।

इस सबको देखते हुए नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के तहत निर्धारित लक्ष्यों के हासिल होने को लेकर गम्भीर आशंकाएं पैदा हो गई हैं।

ऊर्जा क्या है

यूनाइटेड रेजीडेंट्स ज्वाइंट एक्शन आफ डेल्ही (ऊर्जा) दिल्ली में रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशंस की शीर्ष संस्था है। वर्ष 2005 में गठित यह संस्था एक जवाबदेह, दक्ष एवं उत्तरदायी सरकार के जरिये दिल्ली के निवासियों के लिये मूलभूत आवश्यकताओं, स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षा, स्वच्छ हवा और पानी की समुचित उपलब्धता की मांग के वास्ते सूचनाएं एकत्र करने के साथ-साथ उनका विश्लेषण और प्रसार करती है। यह विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के साथ-साथ 2500 रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशंस के साथ सम्पर्क करती है। ऊर्जा जन नीति के मुद्दों पर सरकार के साथ सहयोग करने के साथ-साथ उसे उस नीति पर चुनौती भी देती है जो दिल्ली के नागरिकों को सेवाओं की सुपुर्दगी और न्याय की उपलब्धता से जुड़ी हैं।

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