एनडीए की राज्यसभा बाधा

चूंकि नरेंद्र मोदी की सरकार को इस बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ कदम उठाने का भरोसा दिलाना तो दूर, अपने राज में असहिष्णुता बढऩे के सच को पहचानना ही मंजूर नहीं है, यह टकराव लंबा खिंच सकता है।...

राजेंद्र शर्मा

बिहार के चुनाव के नतीजों का असर संसद के शीतकालीन सत्र को और हंगामी बनाएगा, कम से कम इतना अनुमान लगाने के लिए किसी विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है। सत्ताधारी एनडीए और उसकी संचालक भाजपा ‘कुछ फर्क ही न पड़ऩे’ का चाहे कितना ही का दिखावा करें, बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी जैसी भारी हार हुई है, उससे उनकी अकड़ कुछ न कुछ ढीली जरूर होगी। दूसरी ओर, विपक्ष के हौसले निश्चित रूप से बुलंद होंगे, जिसमें कांग्रेस पार्टी का भी शामिल होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आखिरकार, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी तो वही है। ऐसे में अगर मोदी सरकार की विभिन्न विफलताओं के अलावा देश में बढ़ती असहिष्णुता और शासन द्वारा चुप्पी से लेकर परोक्ष समर्थन तक विभिन्न रूपों में उसे बढ़ावा दिए जाने का सवाल टकराव का मुख्य मुद्दा न बने, तो ही आश्चर्य की बात होगी।

लेखकों की पुरस्कार वापसी से शुरू हुए सिलसिले ने जिस तरह तमाम बुद्धिजीवियों, विद्वानों तथा कलाकारों की गंभीर चिंता को स्वर दिया है और दूसरी ओर जिस तरह सर्वोच्च स्तर तक से सरकार ने इन चिंताओं को ही नकली, राजनीतिक  आदि, आदि करार देते हुए उनके खिलाफ हमला बोला है, उससे चंद रोज में शुरू होने जा रहे संसदीय सत्र में टकराव के पाले, पहले ही खिंच गए हैं।

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यह अनुमान लगाना भी मुश्किल नहीं है कि यह टकराव इक्का-दुक्का मुठभेड़ तक सीमित रहने वाला नहीं है। चूंकि नरेंद्र मोदी की सरकार को इस बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ कदम उठाने का भरोसा दिलाना तो दूर, अपने राज में असहिष्णुता बढऩे के सच को पहचानना ही मंजूर नहीं है, यह टकराव लंबा खिंच सकता है।

जाहिर है कि इस टकराव का खास मैदान बनेगी राज्यसभा, जहां सत्ताधारी गठजोड़ बहुमत से बहुत दूर है। जीएसटी जैसे विवादास्पद कदम अटके ही रहने वाले हैं। फिर भी अगर संसद पर पड़ने वाले असर के ही लिहाज से देखें, तब भी बिहार के चुनाव नतीजों का असर संसद के एक और सत्र के हंगामे की भेंट चढऩे तक ही सीमित नहीं रहने वाला है।

बिहार के चुनाव के इन नतीजों में खासतौर पर राज्यसभा में ताकतों के संतुलन के संबंध में भी महत्वपूर्ण और दूरगामी संकेत छुपे हुए हैं। वास्तव में यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बिहार के चुनाव ने, राज्यसभा में बहुमत हासिल करने की भाजपा तथा एनडीए की उम्मीदों पर ही पानी फेर दिया है। दिल्ली के विधानसभाई चुनाव के अपवाद को छोड़कर, 2014 के आम चुनाव के बाद हुए सभी विधानसभाई चुनावों में भाजपा ने अपनी ताकत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी के साथ, जीत दर्ज करायी थी। इसका असर धीरे-धीरे ही सही, राज्यसभा में भाजपा की ताकत में बढ़ोतरी के रुझान में दिखाई भी देने लगा था। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद, सत्ताधारी गठबंधन उपरले सदन में बहुमत के आस-पास भी नहीं पहुंच पाया है। बहरहाल, बिहार के चुनाव नतीजों ने उसकी ताकत में बढ़ोतरी की इस धीमी प्रक्रिया पर न सिर्फ फुलस्टॉप लगा दिया है बल्कि उसके पलटे जाने की भी शुरूआत कर दी है।

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कहने की जरूरत नहीं है कि अब बिहार से आने वाली राज्यसभा सदस्यों की हरेक खेप, सत्ताधारी गठजोड़ की ताकत में कुछ न कुछ कमी ही कर रही होगी। यह मामला सिर्फ बिहार तक ही सीमित नहीं रहेगा। याद रहे कि विधानसभाई चुनावों के अगले चक्र में केरल, पश्चिम बंगाल, असम तथा तमिलनाडु जैसे जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें से असम के अपवाद को छोड़ दें तो, बिहार की हार के बिना भी भाजपा अपनी ताकत में किसी खास बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं कर सकती थी। फिर बिहार की हार के बाद खास बढ़ोतरी की उम्मीद का तो सवाल ही कहां उठता है। संक्षेप में यह कि असम को छोडक़र, जहां से वैसे भी इन राज्यों में सबसे कम राज्यसभा सदस्य आते हैं, भाजपा इन राज्यों से अपने राज्यसभा सदस्य बढ़ाने में किसी खास मदद की उम्मीद रख ही नहीं सकती है। उसके ऊपर से बिहार के चुनाव के बाद, और आगे होने वाले उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव में भी आसार कोई बहुत अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी ओर, अपना गढ़ माने जाने वाले गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में भाजपा पहले ही विधानसभा में अपनी ताकत का अधिकतम विस्तार कर चुकी है और उनसे राज्यसभा में ताकत में किसी बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। दूसरे शब्दों में सत्ताधारी गठजोड़ को राज्यसभा में बहुमत के बिना ही गुजारा करना सीख लेना चाहिए।                

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 ऐसा नहीं है कि भाजपा नेताओं को इस सचाई का अहसास ही नहीं है। सबसे बढक़र राज्यसभा की बाधा से उबरने की ही कोशिश में उन्होंनेे एक ओर कांग्रेस और दूसरी ओर वामपंथ को छोडक़र, सभी बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों को साधने की सचेत रूप से काफी कोशिशें भी की हैं। जयललिता, ममता बैनर्जी और नवीन पटनायक के साथ रिश्ते बढ़ाने की खासतौर पर कोशिशें की गयी हैं।

यह संयोग ही नहीं है कि इन तीनों की सरकारों के विरोध का जिम्मा भाजपा के स्थानीय नेताओं के स्तर पर ही छोड़ दिया गया है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम चुनाव के बाद से उनकी पार्र्टियों के खिलाफ एक शब्द तक नहीं कहा है। उल्टे उनकी सरकार उनके साथ रिश्ते सुधारने में ही लगी रही है। लेकिन, राज्यसभा में मदद की उम्मीद में इन पार्टियों के प्रति इस तरह का ‘‘अनुकूल’’ रुख, संबंधित राज्यों की विधानसभाओं में अपनी ताकत में बढ़ोतरी करने की भाजपा की न्यूनतम उम्मीदों के भी खिलाफ ही जाता है। वास्तव में इन स्थितियों से समझौता कर भाजपा अगर इन राज्यों में जूनियर पार्टनर की हैसियत से गठबंधन करने का रास्ता अपनाना चाहे तब भी, जयललिता और ममता बैनर्जी इसके लिए शायद ही तैयार होंगी। उल्टे चूंकि उनके राज्यों में चुनाव नजदीक हैं, कम से कम फिलहाल राज्यसभा में भी सत्ताधारी गठजोड़ उनसे ज्यादा नरमी की उम्मीद नहीं कर सकता है।                

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इन हालात में उपरले सदन, राज्यसभा के खिलाफ सत्ताधारी गठजोड़ की मुहिम तेज न हो तो ही आश्चर्य की बात होगी। मोदी सरकार के सबसे महत्वपूर्ण सिद्घांतकार, अरुण जेटली ने बजट सत्र के बाद ही बाकायदा यह मुहिम छेड़ दी थी कि लोकसभा के बहुमत की इच्छा जनतांत्रिक व्यवस्था में सर्वोच्च है और राज्यसभा को, जो प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदन नहीं है, इस जनादेश के आड़े नहीं आने दिया जाना चाहिए। उसके बाद से उन्होंने अनेक मौकों पर अनिर्वाचित सदन, राज्यसभा के ‘‘वीटो’’ के अधिकार को खत्म करने के लिए जरूरी बदलाव करने की अपनी मांग दोहरायी है। इसके बावजूद, वह यह कहने से कतरा रहे हैं कि वास्तव में उनकी मांग, मौजूदा संसदीय व्यवस्था में ही फेर-बदल की मांग है।                

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वास्तव में राज्यसभा के वीटो अधिकार की यह शिकायत झूठी है। हमारे संविधान निर्माताओं ने दो सदनों के मामले में ब्रिटिश संसद का अनुकरण जरूर किया था, लेकिन उन्होंने उपरले सदन की कल्पना में अपना मौलिक तत्व भी जोड़ा और उसे कुछ-कुछ अमरीकी सीनेट की तरह राज्यों का सदन बनाया, जो मुख्यत: राज्य विधानसभाओं के जरिए परोक्ष रूप से निर्वाचन के जरिए ही गठन होना था। राज्यों के हितों के साथ ही, निर्वाचन के जरिए सामने आए उनके राजनीतिक संतुलन को भी प्रतिबिंबित करने वाले इस सदन को, अनिर्वाचित किसी भी तरह से नहीं कहा जा सकता है। इसके बावजूद, जैसाकि 28 जुलाई 1947 को संविधान सभा में दो-सदनों की व्यवस्था स्वीकार किए जाने से पहले हुई बहस में गोपाल स्वामी आयंगर ने रेखांकित किया था, संविधान निर्माताओं ने खासतौर पर राज्यों के संबंधित विषयों को छोडक़र सभी मामलों में राज्यसभा को, दूसरे सदन के ‘जल्दबाजी’ में लिए गए जाने वाले निणर्यों में ‘विलंब’ कराने का ही अधिकार दिया है!  वित्तीय निर्णयों से संबंधित विधेयकों के मामले में तो उसे इतना अधिकार भी नहीं दिया गया है। इसे राज्यसभा का वीटो का अधिकार बताकर, दोनों सदनों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश करना, वाकई संसदीय व्यवस्था पर ही चोट करना है।                

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समस्या सरकार का राज्यसभा में बहुमत न होना नहीं है। पहले भी ऐसा हुआ है। समस्या है मौजूदा सरकार का बहुपक्षीय सहयोग तथा सर्वानुमति के बजाए, विपक्ष के प्रति वैरभाव का प्रदर्शन करते हुए, इकतरफा निर्णयों से शासन तथा संसद को चलाने की कोशिश करना। राज्यसभा का मौजूदा गणित ठीक इसी के आड़े आ रहा है। यही बार-बार गतिरोध पैदा करता है।

अब जबकि राज्यसभा में बहुमत का उसका सपना लगभग टूट चुका है, क्या मोदी सरकार विपक्ष से सहयोग तथा सर्वानुमति के रास्ते पर लौटेगी! आने वाले सत्र में कम से कम इशारों में तो इसका जवाब मिल ही जाएगा।

2015-11-21 23:01:04

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