जानें क्या है GST का पूरा इतिहास और क्यों हो रहा है इसका विरोध

पहली बार 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने उलझी हुई कर प्रणाली को सरल करने के लिए देश का ध्यान खींचा। राजीव गांधी सरकार ने किया कर सुधारों का सबसे पहला और बड़ा काम..विरोध किया था मोदी & शिवराज सरकार ने...

राजीव रंजन श्रीवास्तव

30 जून 2017 की मध्यरात्रि देश में एक कर व्यवस्था यानी जीएसटी लागू कर दी गई। केंद्र सरकार का दावा है कि यह देश की दूसरी आजादी के समान है। गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स को गुड एंड सिंपल टैक्स जैसी सरल भाषा में लपेट कर देश के सामने पेश किया गया है, लेकिन जीएसटी के लागू होने पर देश में जिस तरह की अफरा-तफरी का माहौल है, विशेषकर व्यापारी वर्ग जैसा विरोध कर रहा है, उसे देखकर लगता नहीं कि यह बात इतनी सीधी और सरल है।

जीएसटी आखिर है क्या और क्यों इस पर इतना हंगामा खड़ा हुआ है, क्यों सरकार ने इसे लागू करने में हड़बड़ी दिखाई, इन तमाम पहलुओं पर हम चर्चा करेंगे। पर पहले भारत में जीएसटी के इतिहास पर एक नजर डालते हैं ।

पहली बार 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने उलझी हुई कर प्रणाली को सरल करने के लिए देश का ध्यान खींचा। उस दौरान सरकार की ओर से गठित अप्रत्यक्ष कर जांच समिति के अध्यक्ष थे एल के झा। शायद उसी का नतीजा है कि चार दशक बाद भारत की टैक्स प्रणाली सरल रूप में हमारे सामने आई है।

राजीव गांधी सरकार ने किया कर सुधारों का सबसे पहला और बड़ा काम

देश में कर सुधारों का सबसे पहला और बड़ा काम किया राजीव गांधी की सरकार ने। उस समय वित्त मंत्री थे विश्वनाथ प्रताप सिंह। 1 मार्च 1986 को मोडीफाइड वैल्यू एडेड टैक्स यानी 'मॉड वैट' व्यवस्था लागू की गई। जिसका मकसद था- ग्राहकों तक माल पहुंचने से पहले अलग-अलग जगहों पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी को कम करना।

1991-92 में पी वी नरसिंह राव की सरकार में वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने राजा चेलय्या को कर सुधारों के लिए गठित आयोग का अध्यक्ष बनाया। इसी आयोग ने पहली बार देश में वैट लागू करने की सिफारिश की।

इसके बाद 1997 में  प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा की यूनाइटेड फ्रंट सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एक ड्रीम बजट पेश किया था जिसमें कस्टम ड्यूटी की दर 50 प्रतिशत से कम करके 40 प्रतिशत कर दी गई।

1999 में  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार देश के सभी राज्यों को करों के मामले एक फ्रंट पर लाने की शुरुआत की। वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कर सुधारों के बाकी बचे एजेंडे पर काम शुरू किया। पहली बार केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहमति बनी कि बिक्री कर पर खींचतान कम की जाए। सभी राज्यों के वित्त मंत्रियों की एम्पॉवर्ड कमेटी के अध्यक्ष बने पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता। इस तरह देश में वैट लागू करने का काम शुरू हो गया।

भाजपा शासित राज्यों के व्यापारियों ने विरोध किया था वैट का

भारत में 1 अप्रैल 2002 से वैट लागू करने की घोषणा की गई। लेकिन भाजपा शासित राज्यों के व्यापारियों ने इसका कड़ा विरोध किया। जिसके कारण इसे अगले साल 1 अप्रैल 2003 तक के लिए टालना पड़ा।

2003 में वित्त मंत्री जसवंत सिंह के दौर में संविधान में एक बड़ा बदलाव किया गया। जिसके तहत केंद्र सरकार को सेवाओं पर कर लगाने का अधिकार मिला। यही वो समय था जब एक टास्क फोर्स के जरिए जीएसटी का पहला प्रारूप तैयार किया गया। इसमें राज्यों के लिए 7 प्रतिशत और केंद्र के लिए 5 प्रतिशत की दर तय की गई। लेकिन फिर वैट लागू करने की तारीख बढ़ाकर 1 अप्रैल 2005 कर दी गई। आखिरकार प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम के दौर में 1 अप्रैल 2005 से देश में वैट लागू कर दिया गया।

2007 में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने बजटीय भाषण में जीएसटी लागू करने के लिए अप्रैल 2010 की समय सीमा का ऐलान किया। एम्पॉवर्ड कमेटी को राज्यों से बात कर नया कानून बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

2009 में वित्त मंत्रालय की ओर से पहली बार जीएसटी पर पहला परिचर्चा पत्र तैयार किया और उसे जारी भी किया। 2009-10 में 13वें वित्त आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस का विस्तार करके इसमें जीएसटी को शामिल किया गया। यही वो समय था जब वित्त आयोग ने जीएसटी लागू होने पर राज्यों को अनुदान देने का सुझाव भी दिया।

जीएसटी का पुरजोर तरीके से विरोध किया था मोदी और शिवराज सरकार ने

2011 में पी चिदंबरम के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री बनाए गए।

प्रणब मुखर्जी ने जीएसटी फ्रेमवर्क के लिए 115वां संविधान संशोधन विधेयक सदन में पेश किया, जिसे पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति के पास भेजा गया। समिति ने दो साल बाद 2013 में अपनी रिपोर्ट पेश की। लेकिन इस दौरान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा शासित राज्यों ने जीएसटी का पुरजोर तरीके से हर मंच पर विरोध किया।

2013 में भाजपा शासित राज्यों के विरोध के कारण यूपीए सरकार अपनी दूसरी पारी में भी जीएसटी से जुड़ा कानून पास कराने में नाकाम रही। हालांकि इसी बीच, जीएसटीएन GSTN  (गुड्स एंड सर्विसेस टैक्सेशन नेटवर्क) बना। इंफोसिस के पूर्व सीईओ नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में बनी एक समिति ने जीएसटीएन की सिफारिश की थी।

2014 में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र की सरकार बनी तो जीएसटी का विरोध करनेवाली भाजपा के सुर भी बदल गए। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दिसंबर 2014 में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया, जिसे 2015 में लोक सभा की ओर से पारित कर दिया गया। ये संशोधन विधेयक फिर राज्य सभा की चयन समिति के पास भेजा गया। 2016 में लोक सभा से पारित संविधान संशोधन विधेयक राज्य सभा से भी पास हो गया। इसी के साथ जीएसटी परिषद ने टैक्स रेट और बाकी जुड़े विषयो पर काम शुरू कर दिया।

जीएसटी लागू करने की तारीख 1 अप्रैल 2017 तय कर दी गई। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जीएसटी लागू करने के लिए देश के सभी मुख्यमंत्रियों के अलावा सभी राजनीतिक दल के नेताओं से बातचीत की। सभी राज्यों में जीएसटी को लेकर एक राय बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही। सभी राज्यों के सहमत होने के बाद ही जीएसटी लागू करने की तारीख 1 जुलाई 2017 तय हो पाई।

 

देशबन्धु समाचारपत्र के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव का स्तंभ 

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