राजिंदर जोहर, जिन्होंने इच्छा शक्ति के बल पर असंभव को संभव बनाया

राजिंदर जोहर का जीवन सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है क्योंकि उन्होंने दिखा दिया इच्छा शक्ति के बल पर असंभव को संभव बनाया जा सकता है ...

Vidya Bhushan Rawat
हाइलाइट्स

राजिंदर जोहर का जीवन सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है क्योंकि उन्होंने दिखा दिया इच्छा शक्ति के बल पर असंभव को संभव बनाया जा सकता है और उससे ज्यादा के किसी भी व्यक्ति के जो शारीरिक तौर पर किसी भी अक्षमता का शिकार है, परिवार के सदस्यों के सकरात्नक सहयोग से बहुत मजबूती मिलती है और समाज के लिए भी नए उदाहरण बनते हैं.

प्रेरणास्पद व्यक्तित्व के धनी थे राजिंदर जोहर

विद्या भूषण रावत

जब भी मुझे सबसे प्रेरणास्पद लोगों के बारे में पूछा जाएगा, जिन्हें मैं जानता हूँ, तो डॉ राजिंदर जोहर उनमें से एक प्रमुख व्यक्तित्व होंगे. दिल्ली में फैमिली ऑफ़ डिसएबिल्ड नामक संस्था की स्थापना के साथ ही वह वायस नामक पत्रिका के प्रधान संपादक भी थे, जो डिसएबिलिटी के प्रश्नों को समर्पित पत्रिका थी और जिसे स्वयं उन जैसा व्यक्तित्व चला रहा था, जिसे डॉक्टर ने पूर्णतः डिसएबिल्ड घोषित कर दिया था.

डॉ राजिंदर जोहर लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में एक ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट थे. अपने घर पर भी शाम 7.30 बजे से 11 बजे तक वह लोगों को देखते रहते थे. उनकी पत्नी बैंक में थीं और दो छोटे बच्चे थे। 30 मार्च 1986 की एक घटना ने उनका पूरा जीवन बदल दिया. रविवार का दिन था और वह अपने घर पर ही थे कि कुछ गुंडों ने घर पर धावा बोल दिया. घर पर अंधाधुंध फायरिंग में उनके सीने और रीढ़ की हड्डी में गोलियां लगी. शीघ्र ही उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डाक्टरों ने उन्हें बचा तो लिया लेकिन परिवार को यह भी बता दिया कि उन्हें अब बिस्तर पे ही रहना पड़ेगा क्योंकि गोलियों ने उनके पूरे शरीर को पैरालाइज्ड कर दिया था.

एक व्यक्ति जो कुछ दिन पूर्व तक दूसरों को वापस मोशन में लाता था अब इस बात को कैसे स्वीकार करे कि वह उठ बैठ भी नहीं सकेगा. ये इतना बड़ा सदमा है कि किसी भी व्यक्ति को कोमा में पहुंचा सकता है.

राजिंदर जोहर के परिवार के लोग उन्हें दिल्ली ले आये क्योंकि यही उनके पिता रहते थे और यहीं वह बड़े भी हुए थे. उनके पिता भी परेशान रहते. उनके पिता को पूरा भरोषा था कि वह जरूर ठीक होंगे और वह हर किसी से इस बारे में बात करते रहते थे.

जोहर साहेब बताते हैं कि अपनी स्थिति को स्वीकार करने में उन्हें करीब पांच साल लग गए और फिर  उन्होंने कुछ करने का निर्णय लिया, क्योंकि केवल ये सोच करके कि अब जीवन ख़त्म हो गया और मैं कुछ नहीं कर सकता, से कुछ नहीं हो सकता और कोई भी व्यक्ति केवल दूसरों की दया का पात्र बनकर नहीं जी सकता.

‘मैं शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए कुछ करना चाहता था, क्योंकि मै स्वयं एक थेरेपिस्ट था  लेकिन करूँ कैसे, क्योंकि मैं स्वयं भी नहीं चल या उठ बैठ सकता था. पेन भी नहीं पकड़ सकता था. मेरे भाई सुरेन्द्र ने इसको समझा और उन्होंने मेरे लिए एक पेन की खोज की. 19 जनवरी 1992 को उन्होंने मुझे ये पेन दे दिया और मैंने लिखना शुरू किया’, जोहर साहेब ने मुझे बताया.

अपने पेन को राजिंदर जोहर जी बन्दूक कहते थे और वाकई में उन्होंने सिद्ध भी कर दिया कि इस कलम की ताकत से उहोने अपनी बाद की जिंदगी को कैसे सार्थक किया. वह, लोगों से मिलते थे. बहुत से लोग उनसे मिलने आते लेकिन उन्हें देखकर डर जाते और तरह-तरह की बातें करते.

जोहर साहेब बताते है कि कैसे एक बार एक पत्रकार उनसे मिलने आया और उन्हें देख कर रोने लगा, कहने लगा मैं आपके लिए बहुत दुखी हूँ. जोहर साहेब ने उसे बताया कि जब वह स्वयं नहीं रो रहे हैं तो तुम क्यों रो रहे हो. ये सब बंद करो. हम कोई दया के पात्र थोड़े हैं.

लोग आते रहे और बातें करते रहे. बहुत कम लोग उन्हें प्रोत्साहित करते.

‘मै अपने आप से बात करता था कि क्या करना चाहिए. मैंने सोचा कि हम लोगोंका एक परिवार होना चाहिए, क्योंकि परिवार में लोग एक दूसरे की मदद करते हैं, एक दूसरे की भावनाओं को समझते हैं, एक दूसरे की ख़ुशी और दुखों को साझा करते हैं. शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को भी एक परिवार की जरूरत है क्योंकि वे तो परिवार में भी अलग-थलग रहते हैं.“

और फिर साथियो के साथ उन्होंने फॅमिली ऑफ़ डिसएबिल्ड को रजिस्टर करने का फैसला किया. 11 मार्च 1994 को रजिस्ट्रार खुद उनके कार्यालय में आकर उनके संगठन को रजिस्टर किया. ये एक बहुत बड़ी बात थी कि एक अधिकारी ने उनके घर पर आकर रजिस्टर किया.

‘मैंने बहुत सी गलतियां कीं क्योंकि ये तो मेरे लिए ये बहुत मुश्किल था क्योंकि अधिकांश लोग तो मुझे देखकर मुझ पर दया भाव दिखाते. कुछ ये कहते कि मैं ये कैसे करूँगा क्योंकि तुम तो पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर हो. मेरे पिता को भी मुझ पर ज्यादा भरोसा नहीं था और वो सोचते थे कि मैं रात के 11 बजे तक क्या करता रहता हूँ..

‘लोग मेरे पास आते, कुछ मुझे ऐसा देखते जैसे मैं अजूबा हूँ. जब मैंने लिखना शुरू किया तो वो मुझे लिखने को कहते. मैं वो सब करता लेकिन ये भी कहता कि शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को नाकारा मत समझो, उनमें भी योग्यता होती है उसका सम्मान करो.”

‘मुझे पता था कि मैं चार दिवारी के अन्दर हूँ, लेकिन मै सोच सकता था. ये भी हकीकत है कि मैं बाहर नहीं जा सकता था लेकिन मुझे सुविधाए उपलब्ध थी’.

जोहर साहेब कहते हैं कि धीरे धीरे लोगो ने स्वीकार कर लिया, नाम होने लगा और 1993 में उन्हें मानव सेवा पुरुस्कार से सम्मानित किया गया, जिसको स्वीकार करने के लिए उनके पिता उनके साथ तीन मूर्ति गए जहाँ नेहरु जी का आधिकारिक आवास था. मदर टेरेसा ने उन्हें लिखा. लोग फिल्म स्टार्स को बुलाते थे और मैंने अपने कार्य के बारे में मदर को लिखा और उनका जवाब आया तो बहुत प्रेरणा मिली. अब उनके पिता को लगा कि वह इतनी मेहनत क्यों कर रहे थे. दुनिया भर से उनके कार्यो की सराहना होने लगी.

उन्होंने अपना रोजगार योजना 800 से अधिक युवाओं को सहायता प्रदान की. इस योजना के तहत गरीब वर्ग के युवाओं को 3000 से 5000 रुपये का लोन देकर आत्मनिर्भर बनने लिए प्रोत्साहित किया. लगभग 1700 युवाओं को व्हीलचेयर, बैसाखियां और अन्य सामग्री प्रदान की ताकि वे आपना कार्य आसानी से कर सकें. 150 युवा कलाकारों का एक डाटा बैंक है जिनके कार्यो को समय-समय पर विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शित किया गया है.

उनके जीवन का सपना था कि फॅमिली ऑफ़ डिसएबिल्ड का एक ऐसा केंद्र हो जहाँ लोगों को सुविधाएं मुहैय्या हों. ख़ुशी की बात ये है कि उनके जीवन में ये सपना भी पूरा हो गया और उम्मीद है कि फैमिली ऑफ़ डिसएबिल्ड के साथी उनके सपनो को पूरा करेंगे.

उनका कहना था कि ‘लोगों को हमको स्वीकार करना पड़ेगा. ये सही हो सकता है कि हम आपकी तरह नहीं हैं और हमारी अपनी सीमाएं हो सकती हैं लेकिन लोगों में कहीं न कहीं कोई कमी होती है. उन सभी को एक ही ढ़ांचे में नहीं रखना चाहिए और उनकी योग्यता का सम्मान किया जाना चाहिए. समाज में शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों के प्रति पूर्वाग्रहों को ख़त्म करना होगा और उनको अलग-थलग करने के हर प्रयास का विरोध करना होगा और उन्हें समाज को अपनी मुख्यधारा से जोड़ना होगा.

डाक्टर राजिंदर जौहर हमारे बीच नहीं है लेकिन 1986 से 2017 तक का उनका जीवन समाज को समर्पित था जिसने बहुतों को हँसने खेलने का मौका दिया और जीवन को नया आयाम दिया. उनके परिवार के सदस्यों ने उनका पूरा साथ दिया. उनके कारण कई लोगों को जीवन में कुछ काम करने का मौका मिला और लोगों को उन लोगों के साथ भी बैठने का मौका मिला जिन्हें हमने जीवन की दौड़ में हाशिए पर खदेड़ दिया क्योंकि उनका कोई अंग पूरा नहीं था. उन लोगों के जीवन में उन्होंने एक नयी उर्जा का संचार किया.  

राजिंदर जोहर का जीवन सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है क्योंकि उन्होंने दिखा दिया इच्छा शक्ति के बल पर असंभव को संभव बनाया जा सकता है और उससे ज्यादा के किसी भी व्यक्ति के जो शारीरिक तौर पर किसी भी अक्षमता का शिकार है, परिवार के सदस्यों के सकरात्नक सहयोग से बहुत मजबूती मिलती है और समाज के लिए भी नए उदाहरण बनते हैं. राजिंदर जोहर के निधन पर हमारी श्रद्धांजलि और उनके परिवार और फॅमिली ऑफ़ डिसएबिल्ड संगठन के प्रति हमारी सहानुभूति और सहयोग. उम्मीद है उनका संगठन उनके मिशन और विज़न को आगे ले जाएगा.

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