सीओपी 24 के बीच क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट से जानिए गरीबों को जलवायु परिवर्तन कैसे प्रभावित करता है

जलवायु परिवर्तन भारत के भीतर राज्यों के बीच अमीर और गरीब के बीच असमानता को और बढ़ा देगा।...

सीओपी 24 के बीच क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट से जानिए गरीबों को जलवायु परिवर्तन कैसे प्रभावित करता है

How the Climate Change Affects poor

नई दिल्ली, 05 नवंबर 2018। आज "जलवायु परिवर्तन" पर पार्टियों के सम्मेलन का तीसरा दिन है, जिसे सीओपी 24 (COP24) के रूप में जाना जाता है। यह सम्मेलन पोलैंड के कैटोवाइस में हो रहा है।

इस मौके पर दिल्ली स्थित जलवायु अनुसंधान कंपनी क्लाइमेट ट्रेंड्स ने एक रिपोर्ट जारी कर बताया है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम गरीबों को ज्यादा झेलने होते हैं और जलवायु परिवर्तन भारत में असमानता के अंतर को और बढ़ा देगा।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशिका आरती खोसला ने इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि एक आपदा का रूप में इस वर्ष की केरल की बाढ़, जिसने 20 हजार करोड़ रुपए की क्षति पहुंचाई, ने जनता का ध्यान आकर्षित किया। सूखे से लेकर अतिरिक्त बारिश, और ग्रीष्म लहर जैसी चरम मौसम की घटनाएं अब तक का सबसे बड़ा घोटाला हैं, जिस पर जनता और राजनेताओं को ध्यान देने की जरूरत है।

देखते हैं इस रिपोर्ट के कुछ अंश –

सूखे से बाढ़ तक - कैसे जलवायु परिवर्तन-उग्र चरम मौसम घटनाएं भारत के गरीबों के लिए खतरा है

भारत प्राकृतिक आपदा जोखिमों के निशाने पर है - सूखे, गर्मी और बाढ़ के उच्च जोखिम और गरीबी के लिए उच्च भेद्यता दोनों के साथ। हस्तक्षेप के बिना, भारत 2030 तक चरम गरीबी का मुख्य केंद्र होगा।

अकेले भारतीय राज्य केरल में 2018 की बाढ़ से हुए आर्थिक नुकसान  ने 2017 में भारत में सभी बाढ़ से हुई क्षति से अधिक नुकसान पहुंचाया, और राज्य में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में 1% की कमी आई।

जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले चरम मौसम से गरीब बेढंगे तौर पर प्रभावित होते हैं, जिससे आर्थिक विकास के स्तर और प्राकृतिक आपदाओं के संपर्क में निर्धारित जलवायु प्रभाव कमजोर होते हैं।

जलवायु परिवर्तन भारत के भीतर राज्यों के बीच अमीर और गरीब के बीच असमानता को और बढ़ा देगा।

परिचय

वर्ष 2017 में अपने रेडियो कार्यक्रम "मन की बात" में, भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से पीड़ित किसानों की दुर्दशा को स्वीकार किया था। मोदी ने कहा, "जलवायु परिवर्तन, बदलते मौसम चक्र, और पर्यावरण में परिवर्तन, का भी बड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।"

“बाढ़ के परिणामस्वरूप जीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है। फसलें, पशुधन, बुनियादी ढांचे, सड़क, बिजली, संचार संपर्क - सब कुछ प्रभावित हो जाता है।  विशेष रूप से, हमारे किसान भाइयों को अपनी फसलों और खेतों को नुकसान पहुंचने के कारण बहुत नुकसान उठाना पड़ता है "

चरम मौसम की इन घटनाओं से केवल भारतीय किसानों का ही जीवन उल्टा-पुल्टा और अस्त-व्यस्त नहीं हो जाता है, बल्कि शहरों के स्लम एरिया में रहने वाले नागरिक व पर्यटन क्षेत्र के श्रमिक भी उदाहरण हैं कि किस तरह यह मौसम की चरम घटनाएं इन समूहों की आजीविका को खतरे में डालती हैं। इनके परिणाम विशेष रूप से दलितों और अन्य निचले जातीय समूहों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, जिनके पास जमीन नहीं है। आजीविका के अवसर समाप्त होने, आर्थिक संसाधनों और वैकल्पिक वित्तीय अवसरों की कमी ने आत्महत्या की चिंताजनक प्रवृत्ति को बढ़ाया है।

2011-12 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अनुमानतः 269 मिलियन लोग (राष्ट्रीय आबादी का 21.92%) गरीबी रेखा के नीचे रह रहे थे।

एक अध्ययन में कहा गया है कि गरीब लोग जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले चरम मौसम से सामान्य प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली पीड़ा, जोखिम के प्रति संवेदनशीलता और आर्थिक विकास के स्तर के मुकाबले असंगत रूप से प्रभावित होते हैं।

चूंकि जलवायु संचालित चरम मौसम की घटनाएं प्रभावित क्षेत्रों की आर्थिक उत्पादकता को धीरे-धीरे कमजोर करती हैं, इसलिए गरीबी की जद में आने वाले खतरे में लोगों की संख्या में वृद्धि होगी। इस ब्रीफिंग में, हम विशेष रूप से 2017 और 2018 में भारत को प्रभावित चरम मौसम की घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए जांच करते हैं कि गरीबों को जलवायु परिवर्तन कैसे प्रभावित करता है।

चरम मौसम की मानव लागत में गहरी असमानता

प्राकृतिक आपदाओं से लोग कैसे प्रभावित होते हैं, इसमें गहरी असमानता का एक पैटर्न है। हालांकि उच्च आय वाले देशों में चरम मौसम आपदाओं से पूर्ण आर्थिक नुकसान अधिक होता है, लेकिन मानवीय ह्रास कम और निम्न-मध्यम आय वाले देशों पर अधिक भारी पड़ता है। कम आय वाले देशों में उच्च आय वाले देशों के मुकाबले समान आबादी की तुलना में प्राकृतिक खतरों से लोगों को मरने की संभावना सात गुना और घायल होने या विस्थापित होने की संभावना छह गुना अधिक है।

जलवायु परिवर्तनपहले से ही पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1 डिग्री सेल्सियस वैश्विक तापमान बढ़ने का कारण बन गया है।  जब तक उत्सर्जन तेजी से कम नहीं हो जाता तापमान 2040 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस और 2065 में दो डिग्री सेल्सियस 2100 में 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की संभावना है, जिससे अगले 10 से 12 वर्षों में जलवायु परिवर्तन तेजी से होगा। हाल ही में प्रकाशित जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की विशेष 1.5 सी रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि असमान और कमजोर आबादी को खाद्य असुरक्षा, उच्च खाद्य कीमतें, आय घाटे, आजीवका के खोए हुए अवसर, प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभाव, और जनसंख्या विस्थापन द्वारा बुरी तरह प्रभावित करेगी।  

"खाद्य असुरक्षा, उच्च खाद्य कीमतें, आय में कमी, आजीविका के अवसरों की कमी, प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभाव, और जनसंख्या विस्थापन के माध्यम से वंचित और कमजोर आबादी असमान रूप से प्रभावित होती है"। जलवायु परिवर्तन दुनिया के गरीबों के लिए एक दुष्चक्र बनाने का खतरा है, क्योंकि आगे का बढ़ता तापमान गरीबी में और अधिक लोगों को धकेलेगा, जिससे जलवायु प्रभावों में उनकी भेद्यता बढ़ जाती है।

अब जलवायु आधारित चरम मौसम घटनाओं जैसे कि बाढ़, सूखा, गर्मी और चक्रवात के संबंध में यह स्पष्ट है, कि यह एक विशाल मानवीय चुनौती पेश करती हैं। संयुक्त राष्ट्र के आपदा जोखिम में कमी (यूएनआईएसडीआर) द्वारा प्रकाशित प्राकृतिक आपदाओं का एक संयुक्त विश्लेषण में पाया गया कि जलवायु से संबंधित और भौगोलिक आपदाओं से दुनिया भर में 1.3 मिलियन लोगों की मौत हुई और पिछले 20 वर्षों में 4.4 बिलियन लोग घायल हो गए हैं।

अत्यधिक मौसम की घटनाएं बिजली, आवास, खाद्य उत्पादन और जल आपूर्ति, स्वास्थ्य देखभाल और आपातकालीन सेवाओं जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए खतरा साबित हो सकती है। बड़े पैमाने पर बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं से उबरने में महीनों या साल लग सकते हैं, और यह वर्षों के विकास की प्रगति और आर्थिक विकास को मिटा सकती हैं। तापमान वृद्धि होने से इन सभी चरम घटनाओं के और भी खराब होने की आशंका है।

विगत कुछ वर्षों में भारतीय उपमहाद्वीप पर हमला करने वाले जलवायु आपदाओं के नाटकीय उदाहरण सामने आए हैं, जो स्पष्ट दीर्घकालिक प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हैं। सरकारी आंकड़ों पर आधारित एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि तीव्र मौसम की घटनाओं के कारण भारत में प्रतिवर्ष लगभग 5600 लोग अथवा पांच व्यक्ति प्रति मिलियन लोग काल कवलित हो जाते हैं। भारत में कुल आकस्मिक मौतों की एक चौथाई आकस्मिक मौतें प्राकृतिक आपदाओं के कारण होती हैं। यह संख्या कम अनुमानित होने की संभावना है क्योंकि सूखे से हुई मौतें इसमें शामिल नहीं हैं, उदाहरण के लिए 2015-16 के भारतीय सूखे से लगभग 330 मिलियन लोग प्रभावित हुए।

इस संदर्भ में अमीरों और गरीबों के बीच खाई एक महत्वपूर्ण पहलुओंे में से एक है कि जलवायु परिवर्तन किस तरह भारत जैसे गरीब देशों को प्रभावित करेगी, जहां जलवायु के दुष्परिणामों से प्रभावित होने वाली एक बड़ी  आबादी निवास करती है।

वर्तमान में भारत की जलवायु : बाढ़ और सूखे से उबरने के लिए गरीब संघर्ष कर रहे हैं

भारत पहले से ही जलवायु से संबंधित खतरों की एक श्रृंखला का सामना कर रहा है, ये जलवायु आपदाएं लोगों की आजीविका के लिए खतरा हैं, और ये गरीबीं में रहने वाले लोगों का जीनव और नारकीय बनाने की चुनौती पेश करती हैं।

(…. जारी…)

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