उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों पर फिर उठे सवाल, पुलिस मारे गए लोगों के परिवार वालों को कर रही है प्रताड़ित

मुठभेड़ में घायल लोगों को जेल में नहीं मिल रहा है उचित इलाज़...

नई दिल्ली 20 जनवरी। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में योगी सरकार (Yogi Sarkar) आने के बाद अचानक बढ़ी पुलिस मुठभेड़ों की जांच (investigation of police encounters) के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में पीयूसीएल (PUCL) की तरफ से याचिका डाली गई थी। इस याचिका के बाद योगी सरकार ने पीड़ितों को न्याय (justice to victims) दिलाने के लिए कोई कदम उठाने की जगह अपनी पुलिस के द्वारा मारे गए लोगों के परिवार वालों को प्रताड़ित करना शुरु कर दिया है। आज देश की राजधानी दिल्ली में मानवाधिकार संगठन (human rights organization) एन.सी.एच.आर.ओ. (NCHRO) के तत्वावधान में आयोजित पत्रकार वार्ता में इस पुलिसिया दमन पर कई वक्ताओं ने विस्तृत रूप से बात रखी।

मुठभेड़ में घायल लोगों को जेल में नहीं मिल रहा है उचित इलाज़

पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए रिहाई मंच (Rihai Manch) के राजीव यादव (Rajeev Yadav) ने कहा कि सरकार इन फ़र्ज़ी मुठभेड़ों पर सवाल उठाने वाले मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर भी अत्याचार कर रही है। उन्हें डराने की कोशिश की जा रही है। उन पर फ़र्ज़ी मुक़दमे लगाने की धमकियां दी जा रही है।

वक्ताओं ने सवाल उठाया कि जो लोग इन मुठभेड़ों में  घायल हुए हैं, सरकार उनका सही से इलाज़ नहीं करवा रही है। उनको जेल में बगैर उचित इलाज़ के मारने की साजिश हो रही है। सरकार के मुताबिक 409 अपराधी मुठभेड़ में घायल हुए हैं।

उत्तर प्रदेश की जेलों में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो इस सरकारी ज़ुल्म के शिकार हैं।

पत्रकार वार्ता में बोलते हुए एड्वोकेट अन्सार इन्दौरी ने इन मुठभेड़ों को फासीवादी मानसिकता का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि जो सरकारें देश के नागरिकों से ज़्यादा दूसरों के हितों की बात करती हैं वो अपने नागरिकों के अधिकारों को भी समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। उन्होंने कहा कि योगी सरकार इन हत्याओं को सही ठहराने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है। योगी सरकार द्वारा अदालत में दाखिल की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने 20 मार्च 2017 से 31 मार्च 2018 के बीच तीन लाख आरोपियों को गिरफ्तार किया। कई पुलिस कार्रवाई में आरोपियों ने गिरफ्तारी का विरोध किया और पुलिस कर्मियों पर गोलीबारी की। फलस्वरूप पुलिस को आत्मरक्षा में कार्रवाई करनी पड़ी। रिपोर्ट में कहा गया कि 20 मार्च 2017 से 31 मार्च 2018 के बीच कुल 3,19,141 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया जो पुलिस कार्रवाई में 48 लोगों के मारे जाने के ठीक विपरीत है। यह अपने आप में इस तथ्य की पुष्टि है कि पुलिस की मंशा केवल आरोपियों की गिरफ्तारी है।

उन्होंने कहा कि सरकार की ये रिपोर्ट अपने काले कारनामो पर पर्दा डालने जैसी है।

उन्होंने आगे कहा कि एनकाउंटर के मामले में उत्तर प्रदेश का रिकॉर्ड पहले भी कुछ ऐसा ही रहा है। पिछले 12 सालों में फर्जी एनकाउंटर्स की जितनी शिकायतें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पहुंचीं हैं, उनमें एक तिहाई से ज़्यादा मामले यूपी पुलिस के खिलाफ थे। साल 2000 के दशक में इसकी संख्या में तब बढ़ोत्तरी हुई जब बदमाशों को मुठभेड़ में मारने वाले पुलिसकर्मियों को 'आउट ऑफ टर्म' प्रमोशन का लालच दिखाया गया। कई पुलिस कर्मियों को ये फ़ायदा मिला भी लेकिन बाद में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से 'आउट ऑफ टर्म' प्रमोशन पर रोक लग गई जिसके बाद से एनकाउंटर की रफ़्तार भी धीमी हो गई।

पत्रकार वार्ता में उत्तर प्रदेश में हो रही पुलिस मुठभेड़ों पर सवाल उठाते हुए अफ़क़ार इंडिया फाउंडेशन के अकरम अख्तर चौधरी ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने बयानों से सत्ता में आते ही ये स्पष्ट कर दिया था कि वो मरने मारने की नीति पर विश्वास करते हैं। मुख्यमंत्री योगी ने 19 नवंबर 2017 को कहा था कि अपराधी या तो जेल में होंगे या फिर मुठभेड़ में मारे जाएंगे।

इसके अलावा वक्ताओं ने 9 फरवरी के बयान का भी जिक्र किया, जिसमे कहा गया था कि सबकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी लेकिन जो लोग समाज की शांति भंग करना चाहते हैं और बंदूक में विश्वास करते हैं, उन्हें बंदूक की भाषा में ही जवाब मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के 19 नवंबर के बयान पर संज्ञान लेते हुए एन.एच.आर.सी. ने नोटिस जारी किया था।

पत्रकार वार्ता में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार किरण शाहीन ने कहा कि मुठभेड़ से जुड़े कई ऐसे तथ्य हैं जो संदेह पैदा करते हैं। पहली तो ये कि इन सभी 16 मामलों में दर्ज हुए दस्तावेजों में करीब-करीब एक जैसी ही एनकाउंटर की कहानियां बताई गई हैं। जैसे अपराधियों को पकड़ने का तरीका और एनकाउंटर में हर बार एक अपराधी मारा जाता है, जबकि दूसरा मौके पर फरार होने में सफल हो जाता है। इसके अलावा ये भी कि पुलिस ने जिन अपराधियों को एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया था, उनके शरीर पर कई तरह के जख्म के निशान मिले थे, जिससे मामला एनकाउंटर की तरफ न जाकर, पुलिस प्रताड़ना की तरफ घूम जाता है। उन्होंने कहा कि मुठभेडों में अपराधियों को बिल्कुल पास से गोली मारी गई है, जो एनकाउंटर पर सवाल खड़े करता है।

पत्रकार वार्ता में बोलते हुए पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया के मुफ़्ती शहज़ाद ने कहा कि एनकाउंटर के तहत अमूमन गोली तब चलाई जाती है, जब अपराधी भाग रहा होता है या पुलिस पर हमला बोल देता है। ऐसे में गोली बिल्कुल पास से कैसे लग सकती है?

पत्रकार वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि मुठभेड़ों में खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। उनके मुताबिक, एनकाउंटर में पुलिस का निशाना ज्यादातर ऐसे मुसलमान बने हैं जो गरीब तबके से हैं। 

वक्ताओं ने कहा कि पुलिस पहले गोली मार देती है और बाद में उसके हाथ में बंदूक पकड़ा दी जाती है, ताकि उसे एनकाउंटर का रूप दिया जा सके। 

 सभी वक्ताओं ने संयुक्त रूप से कहा कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और इनकी न्यायिक जांच जरूर होनी चाहिए।

पत्रकार वार्ता को मारे गए लोगों के परिवारजनों ने भी सम्बोधित किया।

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