सीवर में बढ़ती मौतें, कौन है जिम्मेवार?

क्या इस तरह की घटना में हो रही मौतें जेई, एई या बेलदार की गिरफ्तारी से रूक सकती हैं। 2013 के कानून और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के बावजूद भी सीवर की सफाई मशीन से क्यों नहीं हो रही है? ...

सुनील कुमार
हाइलाइट्स

क्या इस तरह की घटना में हो रही मौतें जेई, एई या बेलदार की गिरफ्तारी से रूक सकती हैं। 2013 के कानून और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के बावजूद भी सीवर की सफाई मशीन से क्यों नहीं हो रही है? क्यों नहीं खाली पदों को भरा जा रहा है? इस तरह की काम के लिए स्थायी प्रशिक्षित कर्मचारी को क्यों नहीं रखा जा रहा है? सरकारी गोदामों, ऑफिसों में सुरक्षा के उपकरण क्यों नहीं हैं? जिम्मेवार अधिकारियों के बदले बेलदार को गिरफ्तार कर पुलिस अपने कामों को इतिश्री क्यों करना चाहती है? इस तरह की लापरवाही से हो रही मौतों की जिम्मेवारी आखिर किसकी है?

 

सुनील कुमार

दिल्ली में 15 जुलाई, 2017 से लेकर 20 अगस्त, 2017 तक सीवर सफाई में चार घटनाएं (15 जुलाई, 6 अगस्त, 12 अगस्त और 20 अगस्त) हुईं, जिसमें कुल 10 लोगों की मृत्यु हो गई। ये घटनाएं दिल्ली के अन्दर घटी, जहां पर 2013 में ही ‘प्रोहिबिशन ऑफ एंप्लॉयमेंट मैनुअल स्कैंवेंजर एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट’ पास किया गया है। भारत का उच्चतम न्यायालय 27 मार्च, 2014 को आदेश दे चुका है कि 2013 का यह कानून सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू किया जाये व 1993 के बाद मरने वालों को दस लाख रू. का मुआवजा दिया जाए। लेकिन दिल्ली जैसी राजधानी में, जहां पर देश की संसद कानून बनाती है और ऊच्चतम न्यायालय उसको लागू करने का आदेश देता है, इस कानून को लागू नहीं किया जाता है। इससे हम देश के बाकी हिस्सों का अंदाजा लगा सकते हैं कि वहां किस तरह से लोगों की जान के साथ खिलवाड़ हो रहा होगा।

इससे पहले दीपावली के समय केशवपुर सिवेज ट्रीटमेंट प्लांट में विनय की मृत्यु हो गई थी। दिल्ली के अन्दर ही पांच सालों में कुल 84 मौतें हो चुकी हैं। इस तरह की मौतों का रिकाॅर्ड भारत सरकार के पास नहीं है। ‘द हिन्दू’ अखबार में छपे ‘देथस इन द ड्रेंस’ लेख के अनुसार सीवर सफाई के दौरान हर साल 22,237 महिला-पुरुष मजदूरों मौत होती है।

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हैरान करने वाली बात है कि दिल्ली की हालिया घटना (20 अगस्त, 2017) लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल (एलएनजेपी) में हुई, जहां पर लोग दिल्ली ही नहीं, देश के अलग-अलग राज्यों से जान बचाने आते हैं। यह घटना जहां घटित हुई उससे 50-60 मीटर की दूरी पर पीडब्ल्यूडी का ऑफिस है। इस ऑफिस में जिम्मेदार अधिकारी बैठा करते हैं और जहां से कामों का निर्देश दिया जाता है। पीडब्ल्यूडी ऑफिस के बगल में ही एलएनजेपी अस्पताल के कर्मचारियों का यूनियन दफ्तर है। इतने जिम्मेदार दफ्तर के बगल में लापरवाही और कानून के उल्लंघन के कारण एक व्यक्ति की मौत हो जाती है और तीन घायल हो जाते हैं।

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ऋषि पाल अपनी पत्नी गीता और तीन बच्चों के साथ वेलकम में 25-30 गज के मकान में रहते हैं, जो उनके पिताजी ने बनवाया था। ऋषि पाल करीब 20 साल से जी बी पंत और एलएनजेपी जैसे अस्पतालों में सीवर सफाई का काम करते हैं। बच्चों को बेहतर जिन्दगी देने के लिए ऋषि पाल की पत्नी भी शहादरा इलाके में घरेलू कामगार (डोमेस्टिक वर्कर) का काम करती है। 22 अगस्त को ऋषि पाल अपने घर से साईकिल से निकलते हैं और दस बजे एलएनजेपी पहुंच जाते हैं। वहीं पर उनके साथी सुमित व किरन मिलते हैं। सभी मिलकर अपने कपड़े बदलते हैं, उसी समय बिशन भी आ जाते हैं। चारों मिलकर वार्ड नं. 19 की सफाई करते हैं। सफाई खत्म होते ही उनके बेलदार उनको वार्ड नं 13 में जाकर सफाई करने को कहते हैं। तभी बिशन के फोन पर जेई का इमरजेंसी फोन आता है और वार्ड नं. 14 के पीछे का लाईन साफ करने को कहा जाता है। उनके पास काम करने के लिए सुरक्षा के नाम पर एक रस्सा था, इसके आलावा और कुछ नहीं था।

ऋषि पाल रस्सा के सहारे सीवर में उतरते है। ऋषि पाल के सीवर में उतरते ही बिशन को एक तेज चीख सुनाई देती है। बिशन ने सीवर में उतर कर ऋषि पाल को बचाने की कोशिश की। लेकिन सीवर में कुछ अन्दर जाते ही उसका दम घुंटने लगा तो वह बाहर आ गया और बेहोश हो गया। सुमित ने बचाने की कोशिश की, लेकिन वह भी नाकामयाब रहा और ऊपर आकर बेहोश हो गया। बिशन और सुमित को ऊपर बेहोश होते देख किरन ऋषि पाल को बचाने के लिए सीवर में उतरा। लेकिन वह बाहर नहीं आ पाया और अन्दर ही गिर गया। शोर मचा और लोग इकट्ठा होने लगे।

पास में ही एबीसी फायर सर्विस का काम चल रहा था। इसके मजदूर राजू ने बताया कि कोई व्यवस्था नहीं थी, रस्सा भी वह लेकर आया था। जो अफसर आये, वे फोन पर ही लगे रहे।

राजू ने यह भी बताया कि फायर बिग्रेड के कर्मचारी सीवर में जाने से मना कर दिये और एक लड़का सुमित ने अन्दर जाकर ऋषि पाल और किरन को निकाला।

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राजू का कहना था कि अगर जल्दबाजी में निकाला गया होता, तो उनकी जिन्दगी बच सकती थी। लेकिन निकालने में करीब एक घंटे की देरी हुई है। सुमित ऋषिपाल और किरन को निकालते ही बेहोश गया, जिसको फायर बिग्रेड वालों ने आक्सीजन देकर बचाया।

बिशन की दादी रामश्री भी एलएनजेपी अस्पताल में सफाई कर्मचारी के बतौर रिटायर हुई है। बिशन के पिता कन्हैया भी पीडब्ल्यूडी में बेलदार हैं और उसी ऑफिस में नियुक्त हैं जहां पर यह घटना घटी थी।

कन्हैया बताते हैं कि एलएनजेपी, आई सेंटर, मृदु लेन मिलाकर चार-पांच लाईन है, जिसमें स्थायी रूप से 50-60 कर्मचारी हैं। उनकी संख्या पहले 150 हुआ करती थी। लोग रिटायर होते गये, मर गये, लेकिन उन पदों को भरा नहीं गया। दो जेई के पास कुल मिलाकर सात स्थायी कर्मचारी हैं और पन्द्रह ठेकेदारी पर काम करने वाले कर्मचारी हैं।

कन्हैया का कहना है कि 100 पद खाली होते हैं तो आठ भरे जाते हैं। वे बताते हैं कि 13 साल की उम्र में अलीगढ़ से अपनी मां के साथ दिल्ली आये थे। वे 28 फरवरी, 1985 को अस्थायी तौर नौकरी में लगे थे और उन्हें 1993 में आठ साल बाद स्थायी नौकरी पर रखा गया। नियम कहता है कि आठ माह के नियमित नौकरी करने पर स्थायी नौकरी मिल जाना चाहिए, वहीं कन्हैया को स्थायी होने में आठ साल लग गये। 

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यह सीवर 15 फीट गहरा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार 5 फीट से ज्यादा गहरे सीवर में मशीन से सफाई करानी चाहिए थी। लेकिन यहां नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं। सीवर के अन्दर एक-एक फीट की ऊंचाई पर लोहे लगे होने चाहिए, जिसको पकड़कर सीवर में उतरा-चढ़ा जा सके। लेकिन बिशन के अनुसार इस सीवर में लोहे भी नहीं लगे थे, केवल एक लोहा लगा है दो फीट के बाद। बिशन के पास आई कार्ड नहीं है।

वे बताते हैं कि आई कार्ड मांगने पर टरकाते रहते है। कभी कहते हैं एई से बात करो, एई कहता है कि जेई से बात करो, जेई सुनता नहीं है। हार कर एक्शन के पास जाते हैं तो वह कहता है कि ठेकदार से बात करो और ठेकेदार सुनता नहीं है। हमारे पास सेफ्टी बेल्ट, ऑक्सीजन नहीं होते हैं। मांगने पर कहते हैं कि नौकरी करना है तो करो, नहीं तो घर जाओ। यहां तक कि घटना के बाद बेल्ट मेट्रो वालों से मांग कर लाना पड़ा और ऑक्सीजन का सिलेंडर अस्पताल के वार्ड से आया। छोटे-छोटे बच्चे हैं तो इनके गुजारे के लिए नौकरी करना पड़ता है। यहां पर ठेका अनुप इन्टरप्राइसेस के नाम से चलाता है और ठेकेदार का नाम पीयुष है।

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इस घटना के तुरंत बाद दिल्ली सरकार के मंत्री ने कहा कि ये कर्मचारी पीडब्ल्यूडी या जल बोर्ड के नहीं थे। राज्यपाल ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए जेई और एई को संस्पेड कर दिया। इस घटना में बेलदार प्रेम सागर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

प्रेम सागर का परिवार पास के ही सरकारी क्वार्टर में रहता है। उनके पारिवार में दो बेटे, एक बहु और एक बेटी है। प्रेम सागर की पत्नी ने रोते हुए बताया कि उनके पति को पुलिस वाले रात को बारह बजे बुलाकर ले गये कि बात करनी है, उसके बाद वे घर नहीं आये।  उनको कहां रखा गया है, अभी तक हमें जानकारी नहीं है। बेटा कोर्ट गया हुआ है, आने के बाद जानकारी मिलेगी। वे बताती हैं कि उनके पैर और हाथ में चोट लगा हुआ है तो ठीक से चल भी नहीं पाते हैं, उनको झूठे केस में फंसाया गया है बड़े लोगों को बचाने के लिए। इसी तरह ऋषि पाल के ससुर गोपाल राम सिंह ने कहा कि जिम्मेवार लोगों को बचाने के लिए बेलदार को गिरफ्तार किया गया है।

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क्या इस तरह की घटना में हो रही मौतें जेई, एई या बेलदार की गिरफ्तारी से रूक सकती हैं। 2013 के कानून और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के बावजूद भी सीवर की सफाई मशीन से क्यों नहीं हो रही है? क्यों नहीं खाली पदों को भरा जा रहा है? इस तरह की काम के लिए स्थायी प्रशिक्षित कर्मचारी को क्यों नहीं रखा जा रहा है? सरकारी गोदामों, ऑफिसों में सुरक्षा के उपकरण क्यों नहीं हैं? जिम्मेवार अधिकारियों के बदले बेलदार को गिरफ्तार कर पुलिस अपने कामों को इतिश्री क्यों करना चाहती है? इस तरह की लापरवाही से हो रही मौतों की जिम्मेवारी आखिर किसकी है?

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