ओलांद सच बोल रहे हों या झूठ, मामले की जांच जरूरी है... सजप के मोदी से चार सवाल

देश की जनता को उसकी मेहनत की कमाई से खर्च होने वाले हर एक पैसे का हिसाब लेने का अधिकार है।...

ओलांद सच बोल रहे हों या झूठ, मामले की जांच जरूरी है... सजप के मोदी से चार सवाल

समाजवादी जन परिषद के

राफेल घोटाले में नरेन्द्र मोदी से चार सवाल

नई दिल्ली, 25 सितंबर। समाजवादी जन परिषद ने कहा है कि राफेल मामले में नरेन्द्र मोदी सरकार इस तरह व्यवहार कर रही है, जैसे यह दो निजी कम्पनियों का व्यापारिक मामला है, जिससे उसका कोई लेना-देना नहीं है। यह भारत की जनता के गरीब और मेहनतकश जनता के हिस्से के 58 हजार करोड़ रुपए में से खर्च होने वाले 30 हजार करोड़ के ऑफ़्सेट ठेके का मामला है। डसाल्ट एविएशन कोई अपने निजी व्यापार के लिए रिलायंस को 30 हजार करोड़ का ठेका नही दे रही है। इसलिए, मोदी सरकार इससे यह कहकर पल्ला नहीं छाड़ सकती कि यह मामला डसाल्ट एविएशन एवं रिलायंस डिफेन्स के बीच का निजी मामला है।

समाजवादी जन परिषद का मानना है कि देश की जनता को उसकी मेहनत की कमाई से खर्च होने वाले हर एक पैसे का हिसाब लेने का अधिकार है।

सजप के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनुराग मोदी ने कहा कि समाजवादी जन परिषद् (सजप)  का यह कहना है कि अगर फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद सच बोल रहे हैं कि राफेल के 30 हजार करोड़ के ऑफसेट ठेके के लिए चुनने के मामले में उनके पास कोई विकल्प नहीं था; उन्हें रिलायंस डिफेन्स का नाम नाम भारत सरकार ने दिया था, तब भी इस मामले की पूरी छानबीन होना चाहिए और यह ऑफसेट ठेका रद्द होना चाहिए। और अगर वो अपनी पार्टनर जूली गाएत की फिल्म में रिलायंस का पैसा लगने की खबर से बचने के लिए झूठ बोल रहे है; इसका मतलब उन्होंने रिलायंस से व्यक्तिगत लाभ ले उसे 30 हजार करोड़ के ऑफसेट ठेका लेने में अनुचित तरीके से मदद की, तो भी इस आधार पर डसाल्ट एविएशन और रिलायंस डिफेन्स के बीच हुए समझौते को रद्द करते हुए उसकी जांच होनी चाहिए।

श्री मोदी ने कहा कि सजप का यह मानना है कि, अगर एक देश का पूर्व राष्ट्रपति अगर हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री पर कोई आरोप लगा रहा है, भले ही अपनी चमड़ी बचाने के लिए,  तो इस मामले को पूरी दुनिया के सामने साफ़ करने और दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए इसमें भारत सरकार को तुरंत एक जांच बैठना चाहिए।

इसके अलावा इस मामले में सजप ने निम्न सवाल किए हैं :

पहला सवाल: जब देश मानव मूल्य सूचांक में 131 वें स्थान पर है; हमारे पड़ोसी भी हमसे कोई बहुत बेहतर स्थिति में नहीं है, तब पड़ोसी देशों से बातचीत के जरिए शांति बहाल करने की बजाए हथियार की खोखली दौड़ में पड़ अपने देश की जनता को भूखी रखकर पश्चिमी देशों की हथियार बनाने वाली कंपनियों के धंदे के जाल में क्यों फंसाना है? क्या मोदी सरकार पड़ोसी देशों से हथियारों की दौड़ खत्म कर सारा पैसा देश की जनता और देश को अन्दर से समृध करने में खर्च करेगी? क्योंकि, अभी तक भारत पाकिस्तान के बीच कई युद्ध हुए, लेकिन उसका कोई ठोस हल नहीं निकला; अगर एक और युद्ध होता है, तो दोनों देश बर्बाद हो जाएंगे और उससे भी कुछ नहीं निकलेगा।

दूसरा: राफेल डील में अगर 58 हजार करोड़ रुपए का ठेका भारत की जनता के पैसे से दिया जा रहा है, तो उसकी असली कीमत सुरक्षा क्षमता दुश्मन को मालूम पड़ जाने की आड़ में देश की जनता से क्यों छुपाई जा रही है? क्या राफेल जहाज अन्य देशों के पास नहीं है? और उन्हें उसकी कीमत और उसकी मारक क्षमता का अंदाज नहीं है?; क्या यह सिर्फ भारत को ही बेचा जा रहा है? वैसे भी उसमे लगने वाले उपकरण की विस्तृत कीमत कोई नहीं पूछ रहा!

तीसरा: अगर रिलायंस को डसाल्ट एविएशन द्वारा दिया जाने वाला 30 हजार करोड़ ऑफसेट ठेके का काम भारत की जनता के 58 हजार करोड़ में से ही दिया गया है; वो डसाल्ट एविएशन का अपना पैसा या उसके अपने काम के लिए दिया जाने वाला ठेका नहीं है। यह ऑफसेट ठेका भारत सरकार की शर्त के तहत ही दिया जाना है, तो फिर उसमें भारत सरकार का मत क्यों नहीं है?  क्या भारत की जनता के पैसे से दिए जाने वाले ऑफसेट ठेके में भारत की सार्वजानिक क्षेत्र की कंपनी को नहीं दिया जाना चाहिए?

चौथा: डसाल्ट एविएशन ने हमारे देश के पैसे से दिए जाने वाले ठेके में से भारत की सार्वजानिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड जैसी 70 साल के अनुभव वाली कंपनी को छोड़कर एक गैर-अनुभवी निजी कम्पनी को ठेका दिया, तो इसे भारत सरकार ने इसे कैसे मंजूर किया? एक अनुभवी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के सामने एक गैर अनुभवी क्षेत्र कंपनी को लड़ाकू जहाज के ऑफसेट का ठेका देने से क्या हमारी डिफेन्स उपकरण की गुणवत्ता में कमी नहीं आएगी?

ज़रा हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।