आईएसआईएस, अबू ज़ैद और उसके बाद आज़मगढ़

पहले हूजी, अलकायदा और अन्य विदेशी संगठनों से जोड़ कर मुकदमे बनाए जाते थे और इस समय एजेंसियों का पूरा फोकस आईएसआईएस पर है।...

मसीहुद्दीन संजरी

आईएसआईएस से जुड़े होने के आरोप में एटीएस उत्तर प्रदेश द्वारा मुम्बई एयरपोर्ट से गिरफ्तार किए गए ग्राम छाऊ जनपद आज़मगढ़ निवासी अबू जैद को चार दिन की पुलिस रिमांड के बाद 11 नवम्बर को अदालती हिरासत में भेज दिया गया। 3 नवम्बर को गिरफ्तारी के बाद अभी उसे ट्रांज़िट रिमांड पर रिमांड पर लखनऊ भी नहीं लाया सका था कि एडीजी (कानून व्यवस्था) आनन्द कुमार बयान आ गया कि अबू जैद का नाम अप्रैल में आईएसआईएस के गिरफ्तार आतंकियों उमर उर्फ नाज़िम, गाजी बाबा उर्फ मुज़म्मिल, मुफ्ती उर्फ फैज़ान और ज़कवान उर्फ एहतेशाम से पूछताछ में सामने आया था और उसके खिलाफ लुक आउट नोटिस भी जारी किया गया था।

आनंद कुमार के अनुसार ज़ैद आईएसआईएस का आइडियालॉग है, वह एक इंटरनेट ऐप के ज़रिए सम्पर्क करता था। निकट भविष्य में वह और उसके साथी भारत के कई नगरों में आतंकवादी हमले करने की योजना बना रहे थे।

...लेकिन अबू ज़ैद के पिता इन आरोपों का खण्डन करते हैं। मानवाधिकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता ऐसी बहुतेरी कारवाइयों के मामले में सरकारी एजेंसियों की मंशा पर ही सवाल उठाते हैं।

अबू जैद के पिता 55 वर्षीय किसान अलाउद्दीन ने बताया कि उनके बेटे ने गांव के ही स्कूल से कक्षा पांच तक पढ़ाई की है। उसके बाद खेती के कामों में उसने अपने पिता का हाथ बटाना शुरू कर दिया। उसके पिता गांव में इलेकक्ट्रिक वाइरिंग का काम भी कर लिया करते थे। बेटे ने भी उनके सहायक के तौर पर काम करते हुए कुछ काम सीख लिया था। इसी आधार पर 2009 में वह सऊदी अरब चला गया, लेकिन वहां उसे कंपनी ने टेलीफोन लाइन बिछाने के काम में लगा दिया। तीन साल बाद जब वह घर वापस आया तो उसकी शादी कर दी। यह उसका तीसरा सफर था जब वह 14 महीने के प्रवास के बाद अपने घर वापस आ रहा था। रियाद से मुम्बई और मुम्बई से कनेक्टिंग फ्लाइट से उसे वाराणसी आना था लेकिन यूपी एटीएस ने उसके वाराणसी आने का इंतेज़ार करने के बजाए मुम्बई एयरपोर्ट से ही गिरफ्तार कर लिया।

अलाउद्दीन का कहना है कि कंपनी में वेतन नियमित रूप से नहीं मिलता था जिसकी वजह से वह पैसे घर पर नहीं भेज पाता था। कई बार तो उसे वहां अपने खर्च के लिए साथियों से उधार भी लेना पड़ा। इसीलिए वह चाहते थे कि ज़ैद अपना अनुबंध खत्म कर के घर वापस आ जाए। तकनीकी एतबार से अनुबंध खत्म किए बिना वापस आने पर वह तीन साल तक सऊदी अरब में कहीं और नहीं जा सकता था।

अलाउद्दीन ने ज़ैद के किसी आतंकवादी संगठन से सम्बंध की सम्भावना से ही इनकार करते हुए कहा कि उनका बेटा छुटि्टयो में घर आने के बाद कभी एक दो दिन के लिए भी कहीं नहीं जाता था जिससे उस पर संदेह किया जा सकता।

अलाउद्दीन के पड़ोस के एक बुज़ुर्ग ने तंज़ करते हुए कहा कि एटीएस वाले उसे आईएसआईएस का आइडियालॉग कह रहे हैं लेकिन शायद ज़ैद को यह भी पता न हो कि आइडिया किसे कहते हैं। उनका कहना है कि देश में मुसलमानों के खिलाफ अत्याचार और हिंसक हमले हो रहा है, सम्भव है उसने अपनी योग्यता के अनुसार उन पर कोई आलोचना या टिप्पणी की हो लेकिन यह कहना कि वह आतंकवादी और आईडियालॉग है, बिल्कुल हास्यास्पद आरोप है।

इस तरह के मुकदमों से लम्बे समय से जुड़े रहने वाले लखनऊ के मशहूर वकील मुहम्मद शुएब का कहना है कि ऐसे फर्जी मुकदमे कायम करने का सिलसिला काफी पुराना है। पहले हूजी, अलकायदा और अन्य विदेशी संगठनों से जोड़ कर मुकदमे बनाए जाते थे और इस समय एजेंसियों का पूरा फोकस आईएसआईएस पर है। उनका कहना है कि जब कोई घटना हुई ही नहीं तो सबूत कहां से आएगा। ऐसे में एजेंसियां मुकदमा कायम करने के बाद आरोप के समर्थन में सबूत गढ़ती हैं। ऐसे सबूत अदालतों में टिक नहीं पाते। आरोपी को रिहाई मिलती है लेकिन तब तक अदालती दावपेच में वह अपने जीवन के कीमती साल खो चुका होता है। मुहम्मद शुएब का कहना है कि बेगुनाहों की आठ–दस साल बाद रिहाई पूरा न्याय नहीं है, पुलिस और जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि बेगुनाहों को पूरा इन्साफ मिल सके।

निर्दोषों की रिहाई के लिए काम करने वाले संगठन ‘रिहाई मंच’ के महा सचिव राजीव यादव के अनुसार खुफिया का आईएसआईएस के नाम पर वर्तमान अभियान साम्प्रदायिक आधार पर चलाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश भर में गाय, मांस, लव जिहाद आदि के नाम पर भीड़ लोगों को मार डालती है, ट्रेनों में दाढ़ी, बुरका देख कर हमले किए जाते हैं। एजेंसियों को अच्छी तरह मालूम है कि ऐसे लोग किस संगठन और पार्टी से जुड़े हुए हैं उनको ‘रेडिक्लाइज़’ होना नहीं कहा जाता। दूसरी तरफ अगर कोई मुसलमान केवल इतना कह देता है कि देश हालात बहुत खराब होते जा रहे हैं इसके लिए कुछ किया जाना चाहिए तो उसे रेडिक्लाइज़्ड या गुमराह मान लिया जाता है और हमारी एजेंसियां गुमराह नवजवानों के सुधार का प्रचार कर के उस पर पुष्टि की मुहर भी लगाने का काम करती हैं।

उन्होंने कहा कि अक्सर ऐसे नवजवानों पर आरोप लगाया जाता है कि वह किसी दरगाह या इमाम बाड़े पर धमाके की योजना बना रहे थे। इस तरह वह एक तरफ हिंदू–मुस्लिम नफरत पैदा कर दोनों को बिल्कुल अलग कर देना चाहते हैं तो दूसरी तरफ अक्सर आतंकवाद जैसे मसले पर विभिन्न मत रखने वाले मुस्लिम समूहों के गोलबंद हो जाने की सम्भावना को खत्म कर देने का प्रयास करते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान या मध्यपूर्व के देशों में मुसलमानों के विभिन्न मतों में टकराव की जैसी स्थिति भारत में कभी नहीं रही। उन देशों में सत्ता संघर्ष की वजह ऐसे हालात पैदा हुए हैं लेकिन भारत में ऐसा नहीं है, यहां उनकी एकता का आधार उत्पीड़न है।

राजीव यादव ने यह सवाल भी उठाया कि अगर अबू ज़ैद अप्रैल में गिरफ्तार कथित आईएसआईएस आतंकियों के सम्पर्क में था और किसी आतंकी घटना को अंजाम देने की योजना बना रहा था तो अपने साथियों की गिरफ्तारी के बाद वह भारत आने की मूर्खता क्यों करता? इसके अलावा जब अबू ज़ैद कुछ ही घंटे बाद अगली फ्लाइट से वाराणसी जाने वाला था तो एटीएस ने उसे मुम्बई से गिरफ्तार करना क्यों उचित समझा जबकि दूसरे प्रान्त से गिरफ्तारी से कानूनी औपचारिक्ताएं बहुत बढ़ जाती हैं।

ज़ैद की गिरफ्तारी के बाद उसके गांव के रहने वाले चार नवजवानों को मुम्बई क्राइम ब्रांच के अहलकारों ने पूछताछ के नाम पर उठा लिया। जन दबाव में देर रात को उन्हें छोड़ा तो गया लेकिन पूछताछ के नाम पर उन्हें परीशन करने का सिलसिला अगल चार दिनों तक चलता रहा।

गांव के बुज़ुर्ग और राजीव यादव के आरोपों की पुष्टि उस समय भी हो जाती है जब 7 नवम्बर (ठीक उसी रात में जिस दिन अबू ज़ैद को ट्रांज़िट रिमांड पर लखनऊ ला कर अदालत में पेश किया गया था) को पुलिस ने आज़मगढ़ के ही कुजियारी गांव को घेर कर चार मुस्लिम नवजवानों को उठा लिया।

इशराक की पत्नी नेहा खातून का कहना है कि मग़रिब (सूर्यास्त के बाद पढ़ी जाने वाली नमाज़) बाद उनके पति अपने कुछ साथियों के साथ लूडो खेल रहे थे। सादे कपड़ों में 4-5 लोग आए और अपने को पुलिस बताते हुए हाथ ऊपर उठाने को कहा, फिर उनको पकड़ कर ले गए। इस बीच उन्होंने पूरे घर को तहस–नहस कर दिया।

उसका कहना है कि जिस तरह से वह लोग धमकी दे रहे थे उससे डर कर वह अपनी एक साल की बेटी को लेकर घर छोड़ कर भाग गई। जब रात में उसने थाने पर फोन किया तो दूसरी तरफ से डांट कर फोन न करने के लिए कहा गया। दूसरे दिन उनमें से तीन लोगों को कथित रूप से रिश्वत लेकर छोड़ दिया लेकिन इशराक पुत्र शब्बीर जिस पर कुछ अपराधिक मुकदमे पहले से ही हैं, पांच दिनों तक गैर कानूनी हिरासत में रख कर पूछताछ करते रहे। दूसरी तरफ मीडिया में उसको ज़ैद और आईएसआईएस से जुड़े होने की खबरें आने लगीं। दैनिक जागरण ने तो यहां तक लिख दिया यूपी एटीएस उसे पूछताछ करने के लिए लखनऊ ले गई है।

इशराक ने बताया कि उससे ज़ैद और उससे सम्बंध के बारे सवालात किए जाते रहे और यातना भी दी गई। इन घटनाओं को लेकर क्षेत्र में कई तरह की आशंकाएं हैं।

यह और इस तरह के सवाल पहले भी उठते रहे हैं और उनमें से अधिकांश के जवाब में एजेंसियों को कोई दिलचस्पी नहीं है।

यह सवाल भी कि विगत में आईएसआई को देश की सैनिक और संवेदनशील सूचनाएं देने के आरोप में मध्यप्रदेश से विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के पदाधिकारी और कार्यकार्ताओं की गिरफ्तार हुई थी तो उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ भी क्या इसी तरह का सलूक किया गया था?

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