झारखंड में मजदूरों के सम्मेलन में बोलेंगे जस्टिस कोलसे पाटिल

Justice Kolse Patil will speak at the workers conference in Jharkhand. झारखंड में मजदूरों के सम्मेलन में बोलेंगे जस्टिस कोलसे पाटिल...

रांची (झारखंड) Ranchi (Jharkhand) 16 फरवरी। झारखंड क्रांतिकारी मजदूर यूनियन (Jharkhand Revolutionary Labor Union) का 9वां दो दिवसीय सम्मेलन आगामी 17—18 फरवरी को झारखंड के बोकारो में आयोजित है। जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में उच्च न्यायालय के पूर्व जज सह सामाजिक कार्यकर्ता बीजी कोलसे पाटिल (BG Kolse Patil) होंगे। इस अवसर पर जो पर्चा जारी हुआ है उसमें कहा गया है कि जब पूरी दुनिया में पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था का संकट गहरा हो चला है तथा दिन-प्रतिदिन यह और भी गहराता जा रहा है। आज पूरा विश्व घोर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। इस संकट से उबरने के लिए सभी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी सरकारों ने ‘बेल-आउट’ पैकेजों पर अरबों-खरबों डॉलर खर्च किया है और कर रही है, ताकि दिवालिया हो चुके अपने बड़े बैंकों और बड़े कॉरपोरेशनों को बचा सकें। संकट से बाहर निकलने के लिए सरकारी खर्चे को कम करने के नाम पर आम जनता की सामाजिक सेवा की योजनाओं में सभी देश बड़े पैमाने पर कटौती कर रहे हैं, जिससे मजदूर वर्ग और मध्यम वर्ग भारी आर्थिक बोझ तले दबते जा रहे हैं। मजदूरों के वेतनों और पेंशनधारियों के पेंशन में कटौती के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र से मजदूरों को बड़े पैमाने पर निकाला जा रहा है। निजी कम्पनियों ने भी दसियों लाख मजदूरों को काम से निकाल दिया। वे मजदूरों और मध्यम वर्ग के श्रम को चूसकर भारी मुनाफा कमा रही हैं। परिणामस्वरूप, बेरोजगारी काफी बढ़ गई है, जो कि 1950 के दशक के बाद से कभी इस स्तर पर नहीं रही, जनता की क्रय शक्ति में काफी गिरावट हो चली है, जिससे इस संकट की तीव्रता और भी बढ़ रही है। पूरे विश्व में जारी उपरोक्त संकटों ने भीषण रूप से महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि को पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर फैला दिया है, जिसके फलस्वरूप मजदूरों, कर्मचारियों, मध्यम वर्ग व अन्य तबकों का जीवन संकटग्रस्त हो गया है। परिणामस्वरूप, पूंजीवाद के खिलाफ नए नारों के साथ मजदूर वर्गों और मेहनतकशों के विभिन्न संघषों का नया स्वरूप सामने आ रहा है। पूरे विश्व के लगभग तमाम देशों में अपने विभिन्न मांगों को लेकर जनता के विभिन्न तबकों का आंदोलन जुझारू रूप से जारी है और इसमें हजारों-लाखों मजदूरों, कर्मचारियों, छात्रों, नौजवानों, महिलाओं, मध्यम वर्ग और पेंशनधारियों ने बड़े पैमाने पर हड़तालों और जुझारू आंदोलनों में हिस्सा लिए हैं और ले रहे हैं। हाल में फ्रांस के मेहनतकशों द्वारा अपने जुझारू तेवर के साथ ईंधन पर टैक्स बढ़ाने की घोषणा के खिलाफ सड़कों पर उतरकर बड़े पैमाने पर आंदोलन किया जा रहा है, जो आज ‘येलो वैस्ट मूवमेंट’ के नाम से चर्चित हो चुका है, क्योंकि इसमें लोग पीला जैकेट (जो वहां के वाहन चालक पहनते हैं) पहनकर आंदोलन में भाग लेते हैं।

पर्चा में मजदूर वर्ग को संबोधित करते हुए आगे कहा गया है कि  वर्तमान में हमारे देश में अर्द्ध-औपनिवेशिक व अर्द्ध-सामंती व्यवस्था ही है। 1947 में हमारे देश को अंग्रेजों की प्रत्यक्ष गुलामी से मुक्ति तो मिली और महज कुछ लोगों के लिए ‘आजादी’ भी आयी, लेकिन हमारे देष की 90 प्रतिशत जनता आज भी सामंतवादी, साम्राज्यवादी, दलाल, बड़े नौकरशाह व पूंजीपतियों के बूटों तले जीवन जीने को विवश है। इसलिए हमारे देश में सरकारें तो बदलती रहती हैं, लेकिन नीतियां नहीं बदलतीं। जिसको हम 21 जनवरी, 2019 को दावोस में विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की सलाना बैठक से पहले आक्सफैम इंटरनेशनल द्वारा जारी रिपोर्ट से समझ सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में 2018 में प्रतिदिन 2200 करोड़ रूपये का इजाफा हुआ है। इस दौरान, देश के शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों की संपत्ति में 39 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि 50 प्रतिशत गरीब आबादी की संपत्ति में महज तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। देश के शीर्ष नौ अमीरों की संपत्ति 50 प्रतिशत गरीब आबादी के बराबर है।’’ रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘भारत की शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 77.4 प्रतिशत हिस्सा है। इनमें से सिर्फ एक ही प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 51.53 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं करीब 60 प्रतिशत आबादी के पास देश की सिर्फ 4.8 प्रतिशत संपत्ति है।’’ आक्सफैम इंटरनेशनल ने कहा कि एक अनुमान है कि 2018 से 2022 के बीच भारत में रोजाना 70 नए करोड़पति बनेंगे। आक्सफैम इंटरनेशनल की कार्यकारी निदेशक विनी ब्यानिमा ने कहा कि यह ‘नैतिक रूप से क्रूर’ है कि भारत में जहां गरीब दो वक्त की रोटी और बच्चों की दवाओं के लिए जूझ रहे हैं, वहीं कुछ अमीरों की संपत्ति लगातार बढ़ रही है। यदि एक प्रतिषत अमीरों और देश के अन्य लोगों की संपत्ति में यह अंतर बढ़ता गया, तो इससे देश की ‘सामाजिक और लोकतांत्रिक’ व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।

पर्चा में आगे कहा गया है — हमारे देश में 1991 के बाद यानी जब से उदारीकरण, निजीकरण व भूमंडलीकरण की नीतियां जोर-शोर से शुरू हुई है, तब से ही मजदूरों के अधिकारों पर हो रहे निर्मम हमलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। 1991 के बाद हमारे देश में जितनी भी सरकारें आयी हैं, सभी ने इन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाया है। देश की मोदी सरकार पिछले पौने पांच सालों के शासन में पूंजीपति एवं कारपोरेट घरानों के समक्ष घुटने टेक कर पूरी तरह आत्म-समर्पण कर इन्हीं शक्तियों को राहत पहुंचाने की जुगत में लगी हुई है। सरकार ने मुक्त बाजार के नाम पर देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हित में तमाम श्रम कानूनों में संशोधन कर लाखों-करोड़ों मजदूरों को उनके अधिकारों से वंचित कर उन्हें एक किनारे किया है, तो दूसरी ओर आउटसोर्सिंग एवं लचर प्रावधानों से लूट का रास्ता साफ किया है। ऊपर से मोदी सरकार ने नोटबंदी एवं जीएसटी लगाकर देश में घोर आर्थिक संकट पैदा कर दिया। जिसमें लगभग 70 लाख स्थायी मजदूरों की नौकरी चली गई और लगभग ढाई लाख छोटे उद्योग बंद हो गये, जिसके कारण न जाने कितने गरीब मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई। देश की सरकार ने एक बड़ी साजिश के तहत कारखानों में जैसे कोल इंडिया, आयल इंडिया, रेलवे, इस्पात कारखाना, डी.भी.सी., एनटीपीसी, भेल आदि संस्थानों में स्थायी नौकरियों की संख्या को कम कर दिया गया है। बैंक, बीमा जैसी कम्पनियों के विलय के नाम पर उन्हें खत्म करने की साजिश हो रही है। पूंजीपतिपरस्त एवं उदार नीति के कारण सरकारी कारखानों में आउट सोर्सिंग एवं असंगठित क्षेत्र में जुड़े लाखों-करोड़ों मजदूरों को न्यूनतम वेतन, ग्रेजुएटी, भविष्य निधि, पेंशन, समाजिक सुरक्षा एवं बुनियादी सुख-सुविधाओं से वंचित कर तिल-तिल कर मरने पर विवश किया जा रहा है। जबकि इन्हीं असंगठित क्षेत्र से जुड़े मेहनतकश मजदूर ही देश की सकल घरेलू उत्पादन में 65 प्रतिशत का योगदान दे रहे हैं। ऐसे मजदूरों की संख्या देश में लगभग 49 करोड़ की है।

2019 के आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर मोदी सरकार अपने राजनीतिक फायदे के लिए सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण का लालच देकर उन्हें अपने पाले में करने की कोशिश में है। जबकि सच्चाई यह है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जाति को मिलने वाले आरक्षित कोटा में से एससी-एसटी के पद पूरा नहीं किया गया एवं ओ.बी.सी. की स्थिति और भी दयनीय है। किसी भी केंद्रीय सरकारी विभाग में 12 प्रतिशत से कम पद प्राप्त है। इससे सरकार की मंशा साफ जगजाहिर होती है। ऐसे में समाज के हर तबके के लोग मोदी सरकार से पिछले पौने पांच सालों के देश के समक्ष किये गये वादों और उपलब्धियों का हिसाब-किताब मांग रहे हैं। केन्द्र की जनविरोधी मोदी सरकार के नक्शेकदम पर चलते हुए भाजपा के रघुवर दास ने झारखंड की गद्दी पर बैठने के साथ तुरंत ही यहां भी मजदूर-किसान विरोधी नीतियों को लागू करना शुरू कर दिया। सीएनटी-एसपीटी कानून में संशोधन करने में असफल होने पर तुरंत ही दूसरा हथकंडा अपनाकर आदिवासी-मूलवासियों की जमीन छीनने का भूमि अधिग्रहण कानून विधानसभा में पारित करवा लिया। उसका एकमात्र उद्देश्य है, दलाल, नौकरशाही, पूंजीपति व विदेशी पूंजीपति या कारपोरेटों को झारखण्ड के विशाल खनिज भण्डारों को लूट की खुली छूट देना और इस तरह से रक्तपिपासु शोषकों के हितों की रक्षा करना। रघुवर दास सरकार द्वारा पारित स्थानीयता नीति संबंधी कानून पूरा का पूरा आदिवासी-मूलवासी के स्वार्थ विरोधी है और इस स्थानीयता नीति का अर्थ है, अपनी वास भूमि पर आदिवासी जनता को प्रवासी का जीवन बिताने के लिए मजबूर करना। रघुवर सरकार का मजदूर विरोधी मंशा इस बात से साबित हो जाता है कि झारखंड में लगभग 30 सालों से काम कर रहे पंजीकृत ट्रेड यूनियन ‘मजदूर संगठन समिति’ को 22 दिसंबर, 2017 को ‘भाकपा (माओवादी)’ का अग्र संगठन बतलाकर सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित कर दिया जाता है, क्योंकि इस संगठन ने अपने एक डोली मजदूर (मोतीलाल बास्के, आदिवासी) सदस्य की सीआरपीएफ कोबरा द्वारा फर्जी मुठभेड़ में की गई हत्या के खिलाफ उभरे जनांदोलन का नेतृत्व किया था।      

पर्चा में अपील की गई है कि देश व राज्य की ऐसी विषम परिस्थितियों में मजदूर वर्ग की एक एक अहम् भूमिका बन जाती है और प्रगतिशील जनवादी शक्तियां खासकर समाज के शोषित-उत्पीड़ित एवं दबे-कुचले वर्ग को लेकर संयुक्त संघर्ष की रूप-रेखा तय करनी होगी।

विशद कुमार

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