प्रेम तो आखिर प्रेम है, हमारा आपका सेम है, एलजीबीटीक्यू समूहों के प्रतिनिधि बताएंगे अपने अनुभव

LGBTQ Group representatives will share their experiences. प्रेम तो आखिर प्रेम है, हमारा आपका सेम है, एलजीबीटीक्यू समूहों के प्रतिनिधि बताएंगे अपने अनुभव...

वर्धा, 12 फरवरी। 'वेलेंटाइन डे' (Valentine's Day) की पूर्व संध्या पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय कैम्पस (Mahatma Gandhi International Hindi University Campus) में आयोजित कार्यक्रम में एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) समूहों के प्रतिनिधि प्रेम के अपने अनुभवों को साझा करेंगे !

LGBTQ Group representatives will share their experiences

इस अवसर पर आयोजन समिति की ओर से जारी एक वक्तव्य में कहा गया है -

पिछली कुछ सदियों में मनुष्य के जिन व्यवहारों में सबसे ज्यादा तब्दीली आई वह है उसकी ‘सेक्सुअलिटी’ और उसकी अभिव्यक्ति ('sexuality' and its expression) । यह सबकुछ संस्कृति को एक दायरे में सीमित करने की प्रक्रिया से संभव हुआ। इन परिवर्तनों को बहुत संक्षेप में समझा जाए तो मुख्यतः तीन बातें आधार बनती हैं। पहला, एक ऐसी संस्कृति की निर्मिति दिखती है जिसमें यौन (सेक्सुअल) अभिव्यक्ति (Sexual expression) की एकमात्र वैध जगह परिवार रूपी संस्था में ही निर्धारित हो जाती है जहाँ पति (पुरुष) और पत्नी (स्त्री) के बीच यौनिक संबंध बनते हैं। अन्य सारी यौनिक अभिव्यक्तियां अपसंस्कृति के दायरे में बहिष्कृत हो जाती हैं - लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्विअर। दूसरा, संस्कृति जिस मानवीय यौन जरूरतों (sexual needs) का समाधान पेश करती थी वह स्वयं में समस्याग्रस्त हो जाती है क्योंकि मानवीय भावों की समग्रता को लेस्बियन (lesbian), गे (gay), बायसेक्सुअल (bisexual), ट्रांसजेंडर (transgender) और क्विअर जैसे विभिन्न विभागों में बाँट दिया गया। अंततः एक ऐसे परिवेश का निर्माण होता है जिसमें मानवीय यौनिकता कुंठित, आंशिक और अराजक होकर हिंसा और विकृति को जन्म देने लगती है। परिणामस्वरूप तमाम तरह के कानूनों और सांस्कृतिक बंदिशों के बावजूद यौन अपराध बढ़ते ही जाते हैं। हम यह भी जानते हैं की जिस lgbtq की अब बात हो रही है उसका मुख्यधारा के इतिहास में आपराधिक स्थान है। ऐसा इसलिए भी होता है कि इन यौन अपराधों का डीएनए उन्हीं सांस्कृतिक बंदिशों में ही छुपा हुआ है और फिलवक्त एक पुरुष और स्त्री रूपी यह मानव अपने मित्र, भाई –बहन,पति – पत्नी, साला – साली और सभी सहोदर को गिद्धदृष्टि से देख रहा है।

रिश्तों के जिस संसार में हम रहने के अभ्यस्त हैं वह अपने मूल रूप में इन्हीं यौनिक आदान-प्रदान के नीति-नियमों से बुना हुआ है। इस छोटे से संसार की नींव केवल और केवल उसी स्त्री-पुरुष के परिवार पर टिकी हुई है। लेकिन इस संसार के अलावे भी एक विशाल नैसर्गिक संसार है जिसमें मनुष्यों की यौनिकता का वह रूप खिलता और फलता फूलता है जो तमाम बंदिशों के बावजूद प्रजनन केंद्रित यौन संबंधों के समानांतर सदियों से चलता आया है और उतना ही प्राकृतिक, आनंददायक और समग्र है। उसके अनुभवों में भी ब्रह्मांड की वही परम चेतना अभिव्यक्त होती है।

प्रेम उस तरल की तरह है जो अपने पात्र (देह) के आकार को ग्रहण कर लेता है इसीलिए प्रजनन केंद्रित सांस्कृतिक सत्ता और उसकी सभी सहोदर सांस्कृतिक संस्थाएँ प्रेम को नियंत्रण में रखने का प्रयास करती हैं। लेकिन प्रेम अपनी विशाल ब्रह्मांडीय चेतना में सभी पात्रों (देह) में सर्वव्याप्त होता है। आइए हम रक्त आधारित रिश्ते और सम्बन्धों के बंद कमरे से निकल कर मानवीय भावों पर आश्रित रिश्तों के उन अनुभवों को साझा करते हैं जो नैसर्गिक रूप से हम पर बरसता रहा है। कार्यक्रम में एलजीबीटीक्यू समूहों के प्रतिनिधि प्रेम के अपने अनुभवों को साझा करेंगे।

इस कार्यक्रम के वक्ता हैं

-वीणा शेन्द्रे, मिस ट्रांस क्वीन इंडिया

-रवीना बरिहा, ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड सदस्य, छत्तीसगढ़

-रितु बी. जुमड़े, ट्रांसजेंडर सामाजिक कार्यकर्ता, वर्धा

-सबुरी रैना, अधिवक्ता, छत्तीसगढ़

#दिनांक : 13 फरवरी, 2019

#समय : अपराह्न 3:00 बजे से

#स्थान : कस्तूरबा सभागार, महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र.

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