OMG ! लिपस्टिक अंडर माय बुर्का : हम सपने बहुत देखते हैं

​​​​​​​लिपस्टिक अंडर माय बुर्का महिलाओं की आजादी को जकड़ने वाली बेड़ियों पर एक हद तक चोट करती है।...

वीणा भाटिया

काफी विवादास्पद रही फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ का निर्माण प्रकाश झा ने किया है। इसका निर्देशन अलंकृता श्रीवास्तव ने किया है। शुरू में सेंसर बोर्ड ने इसे प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया था, पर आखिरकार अदालत के दखल के बाद यह फिल्म रिलीज हो गई है। इसे दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स भी मिल रहा है। इस फिल्म को विदेशों में भी काफी सराहा गया है। कहा जा रहा है कि यह फिल्म बोल्ड विषय पर बनी है, पर वास्तव में यह तरह-तरह की पाबन्दियों में जीवन गुजारने वाली महिलाओं के प्रतिरोध की कहान है, भले ही वह प्रतिरोध वास्तविक जीवन में बहुत कारगर नहीं हो पाता है और फैंटेसी के बीच रह जाता है। दरअसल, यह फिल्म स्त्रियों के ठहराव भरे जीवन में सपनों के कुछ रंग दिखाती है। फिल्म में अलग-अलग किरदारों के माध्यम से उनकी कुंठा और उससे मुक्त होने की चाहत खुल कर सामने आती है। पुरुष वर्चस्व वाले समाज में स्त्रियों की छटपटाहट और उनकी मुक्ति की आकांक्षा फिल्म की मुख्य थीम है। दूसरी बात, फिल्म की कहानी ऐसी है कि यह बहुत ही रोचक बन पड़ी है।

कहानी चार औरतों की हैं जो भोपाल के छोटे-से मोहल्ले में रहती हैं। इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों की महिलाएं हैं और उन चारों की परिस्थितियां भी अलग-अलग हैं। लेकिन उनके सपने लगभग एक जैसे हैं, वह है घिसीपिटी जिंदगी और घुटन से आजादी हासिल करना जो वास्तव में  मुमकिन नहीं हो पाता है। फिल्म में एक काल्पनिक किरदार  रोजी के जरिए उन जिंदगियों में झांकने की कोशिश की गई है, जिनका समाज की नजरों में न तो कोई स्वतंत्र अस्तित्व है, ना ही कोई निजी इच्छा।

ऊषा जी जिसका किरदार रत्ना पाठक शाह ने निभाया है, पूरे मोहल्ले की बुआ हैं। वह विधवा हैं, प्रेम और रोमांस की बात सोचना भी समाज की नज़रों में उनके लिए गुनाह है, पर 55 साल की उम्र में उनके भीतर एक 'रोजी' जवान हो रही है। वे धार्मिक ग्रंथों के बीच इरॉटिक किताबें छुपा कर पढ़ती हैं और अपनी फैंटसी उसी से पूरा करती हैं। वह सत्संग में भी जाती हैं और फिर एक कोच के संपर्क में आकर स्विमिंग सीखना शुरू कर देती हैं। फिल्म की शुरुआत जिस दृश्य से होती है, उसमें बुर्का पहने एक लड़की रिहाना (प्लाबिता) एक मॉल से लिपस्टिक चुराती है और वॉशरूम में जींस-टीशर्ट चेंज कर लिपस्टिक लगा कर कॉलेज जाती है। शीरीन (कोंकणा सेनशर्मा)  का पति असलम (सुशांत सिंह) सऊदी अरब में रहता है। वह अपनी पत्नी को मानो बच्चा पैदा करने की मशीन समझता है। हफ्ते-दस दिन के लिए जब भी भारत आता है, उसके साथ बिना मर्जी के संबंध बनाता है और वह अनचाहे प्रेग्नेंट होती है। शीरीन इससे मुक्त होना चाहती है। पति और घर वालों से छुपकर नौकरी करती है और अपने स्वतंत्र वजूद की तलाश करती है। लीला (अहाना कुमरा)  अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की है। वह एक फोटोग्राफर से प्यार करती है, लेकिन उसकी मां इसे पसंद नहीं करती और अरेंज मैरेज करने के लिए दबाव डालती है। देखा जाए तो अलग-अलग उम्र और पृष्ठभूमि की इन चारों महिलाओं की कहानियों में काफी  समानता है। एक आज की आधुनिक कॉलेज में पढ़ने वाली लड़की, एक करियर के लिए संघर्ष करती लड़की, एक शादीशुदा और एक बूढ़ी औरत। देखा जाए तो ये अपनी आजादी और भावनात्मक संबंधों के लिए बेचैन हैं।

फिल्म के क्लाइमेक्स में दिवाली का मेला है। हर तरफ बम-पटाखों का शोर है और इन चारों की जिंदगियों में पूरी तरह से उथल-पुथल मच चुकी है। हर तरफ से मुसीबतों से घिरीं ये जब फटे हुए कपड़ों और किताबों के बीच बैठी हैं, तब भी इनकी आंखों में हैं, 'नाउ ऑर नेवर वाले सपने' और 'लिपस्टिक वाले सपने’।

यह फिल्म महिलाओं की आजादी को जकड़ने वाली बेड़ियों पर एक हद तक चोट करती है। फिल्म में दिखाया गया है कि हमारे समाज में औरतों के दुखों की कहानी एक जैसी ही है, चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाली हों, कुवांरी हों, शादीशुदा हों या फिर उम्रदराज। उन पर बंदिशें हैं और बंदिशों से मुक्त होने की छटपटाहट भी है। इस छटपटाहट में वे किसी न किसी फैंटेसी  में जीती हैं और फैंटेसी को सच होते देखना चाहती हैं। फिल्म के एक दृश्य में एक लड़की कहती है, “हमारी गलती यह है कि हम सपने बहुत देखते हैं।“ दरअसल, यह फिल्म लड़कियों और महिलाओं को उन सपनों को हकीकत में तब्दील करने का हौसला देती है, फिर नतीजा चाहे जो हो। समाज में जो नैतिकता के ठेकेदार बनते हैं, वे उनकी राह में रोड़ा बनते हैं। फिर देखने में ये  आता है कि उन्हें हर जगह धोखे का शिकार भी होना पड़ता है।

शिरीन ( कोंकणा सेन शर्मा) एक सेल्सवुमन है जो अपने पति से छुप कर घर-घर जाकर सामान बेचती है। एक दिन जब वह अपने पति को किसी दूसरी औरत के साथ घूमते देखती है तो उसे झटका लगता है। लीला (अहाना कुमार) मेकअप आर्टिस्ट है जो अपने फोटोग्राफर ब्वॉयफ्रेंड से शादी करना चाहती है, लेकिन वह भी बस उसका इस्तेमाल करता है। इससे यह सच्चाई सामने आती है कि औरतों का संघर्ष बहुत कठिन है, वे किस पर भरोसा करें और कैसे करें, यह एक बड़ा सवाल है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि फिल्म में इस कड़वी सच्चाई को बहुत ही नए अंदाज़ में सामने लाया गया है कि भले ही समानता की बातें जितनी की जाएं, महिलाओं को भोग की एक वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता। फिल्म में इरॉटिक नॉवेल की हीरोइन रोजी की फैंटेसी को बेहद खूबसूरत अंदाज में चारों मुख्य किरदारों की कहानी में पिरोया गया है। कहा जा सकता है कि विशुद्ध मनोरंजन वाली फिल्मों के इस दौर में यह फिल्म कुछ अलग हट कर सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है।

फिल्म – लिपस्टिक अंडर माय बुर्का

कलाकार - कोंकणा सेन, रत्ना पाठक, अहाना कुमार, प्लाबिता

निर्देशक - अलंकृता श्रीवास्तव

 

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