लोकसभा चुनाव 2019 : तगड़ी हार की आशंका से भाजपा के माथे पर खिंची चिंता की लकीरें

कुल मिला कर देखा जाय तो उसको 2014 में सत्ता के शिखर पर पहुंचाने वाली हिंदी पट्टी से इस बार भाजपा को बहुत बड़ा झटका मिलने की प्रबल संभावना हैI 

अतिथि लेखक
Updated on : 2018-08-19 12:41:44

लोकसभा चुनाव 2019 : तगड़ी हार की आशंका से भाजपा के माथे पर खिंची चिंता की लकीरें

बिहार और उत्तर प्रदेश में महागठबंधन से महाखतरा

पांच प्रतिशत वोट भी घटा तो सौ सीटें घट जायेंगी

उबैद उल्लाह नासिर

2019 के संसदीय चुनाव को ले कर भाजपा के माथे के बल सामने आने लगे हैं। गहन चिन्तन मनन के बाद संघ और भाजपा के बड़े नेता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि केवल हिंदुत्व ही उनकी नैया पार लगा सकता है। यही कारण है कि मेरठ में हुई भाजपा की बैठक में मोदी योगी सरकार के कथित विकास कार्यों के बजाय नफरत हिंसा और सम्प्र्दायिक विभाजन का पर्याय बन चुके हिंदुत्व को खेवनहार बनाने का फैसला गयाI

भाजपा नेतृत्व जानता है कि नौजवानों की बढ़ती बेरोज़गारी किसानों और छोटे कारोबारियों में फैली मायूसी के कारण वह इनके सामने अपनी किसी सफलता को रख कर वोट नहीं मांग सकता। इस लिए उस ने झूठ लफ्फाजी और सम्प्रदायिकता के सहारे 2019 का चुनाव जीतने का मंसूबा बनाया हैI इसके अलावा उस ने सोशल इंजीनियरिंग का भी सहारा लिया, लेकिन यह उलटा उसके गले पड़ रहा है। उस ने दलितों को रिझाने के लिए दलित एक्ट में सुप्रीम कोर्ट को फैसले को बदलने और प्रोमोशन में आरक्षण देने जैसे क़दम उठाये, लेकिन इससे उसका सवर्ण वोट बुरी तरह नाराज हो गया है। रिजर्वेशन के खिलाफ जितनी मुखर आवाज़ अब उठ रही है वैसी इससे पहले कभी नहीं उठी थी। बहुत से लोगों, विशेषकर दलितों और पिछड़ों का ख्याल है कि यह आवाज़ आरएसएस के इशारे पर उठाई जा रही है जिससे उसका दोहरा चरित्र उजागर हो रहा है। एक प्रकार से देखा जाये तो इस मामले में भाजपा “न खुदा ही मिला न विसाले सनम” वाली स्थिति में दिखाई दे रही है क्योंकि सब को खुश रखने के चक्कर में वह किसी को खुश नहीं रख पा रही हैI

लेकिन भाजपा के सामने सब से बड़ा खतरा उत्तर प्रदेश और बिहार में उभर रहा महागठबंधन है जिसके कारण विगत उपचुनावों में गोरखपुर की मुख्यमंत्री और फूलपुर की उप मुख्यमंत्री द्वारा खाली की गयी अपनी परम्परागत सीट भी नहीं बचा पायी थी। कैराना की सीट पर भी उसका विगत कई चुनावों में कब्जा रहा है। इस सीट को जीतने के लिये भाजपा ने कोई कसर नही छोड़ी थी। जिन्ना बनाम गन्ना से ले कर चुनाव से एक दिन पहले बिलकुल सटे क्षेत्र में प्रधानमंत्री की रैली चुनाव के दिन भरी गर्मी में EVM में खराबी से वोटरों विशेषकर मुस्लिम वोटरों को वोट डालने से रोकने तक की ट्रिक अपनाई गयी। लेकिन ना केवल वहाँ उसको हार का सामना करना पडा बल्कि वर्षों से बिखरा समाजी ताना बाना भी बनता दिखाई दिया। यहाँ लाइन में लगे जाट वोटरों ने मुसलमानों को पहले वोट दे देने दिया, ताकि उन्हें रोजा होने के कारण देर धूप में न खड़े रहना पड़ेI

विगत लोक सभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 73 पर कब्जा किया था। समाजवादी पार्टी को पांच और कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं जबकि बहुजन समाज पार्टी का खाता भी नहीं खुला था।

इसी प्रकार बिहार की 40 सीटों में से उस ने (शायद ) 35 सीटें जीती थीं लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस को मिला कर पांच सीटें जीती थीं। इस प्रकार दोनों राज्यों की 120 सीटों में से उस ने लगभग 108 सीटों पर कब्जा कर लिया थाI

सियासी पंडितों का ख्याल है कि अगर उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठजोड़ हो गया तो भाजपा के लिए 25 सीटें जीतना मुश्किल हो जायगा और यदि इस गठबंधन में कांग्रेस और अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोक दल भी शामिल हो जाए तो भाजपा 15 से 20 सीटें ही जीत पाएगीI

बिहार में यद्यपि नीतीश से गठबंधन कर के भाजपा ने अपनी पोजीशन मज़बूत कर ली है, लेकिन इस चक्कर में नीतीश की पोजीशन बहुत कमज़ोर हो गयी है। एक ओर उन पर बिना किसी ठोस कारण के लालू प्रसाद यादव को धोखा देने का इलज़ाम है दूसरे लालू के जेल जाने और लगभग वैसे ही जुर्म में पंडित जगन्नाथ मिश्र के बरी हो जाने से बिहार के जातिवादी समाज में लालू के प्रति हमदर्दी बढ़ी है। उसके साथ ही उनके सुपुत्र तेजस्वी यादव ने जिस प्रकार लालू की सियासी विरासत को सम्भाला है उस से राष्ट्रीय जनता दल की लोक प्रियता में बहुत इजाफा हो गया है। यही कारण है कि नीतीश के अलग होने के बाद हुए सभी उप चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल को शानदार सफलता मिली। तेजस्वी लोक प्रियता के मामले में अपने पिता लालू को पीछे छोड़ते दिखायी दे रहे हैं क्योंकि समाज के उस वर्ग में भी उनकी स्वीकार्यता देखने को मिल रही है जो लालू के नाम पर ही बिदक जाता हैI

इस प्रकार उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 लोक सभा सीटों में से इस बार भाजपा का 50 सीटें पाना भी दुर्लभ दिखायी दे रहा हैI इसकी काट के लिए भाजपा के पास दो रास्ते हैं। एक ज़्यादा से ज़्यादा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और जातियों के बीच गलत फहमी के बीज बोना, जैसा उस ने UP विधान सभा चुनाव के समय किया था। अर्थात् दलितों के गैर जाटवों को जाटवों के खिलाफ और गैर यादव पिछड़ों को यादवों के खिलाफ भडका के किया था। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में मायावती को गठबंधन से दूर रखने का हर संभव प्रयास भी जारी है। इसके लिए बहुत सी बातें सुनने को मिल रही हैं कि मायावती को भाजपा की ओर से क्या क्या ऑफर मिल रहे हैं। लेकिन चूँकि इस सम्बन्ध में कोई ठोस बात अब तक सामने नहीं आई है इस लिए उनका लिखना मुनासिब नहीं है, लेकिन सीटों को ले कर मायावती का सख्त मोल भाव खतरे की घंटी तो है ही हालांकि दिल से वह भी जानती हैं कि अगर गठजोड़ को ले कर उन्होंने विधान सभा चुनाव वाली गलती दोहराई तो उसकी कीमत भी उन्हें उस से भी भारी चुकानी पड़ सकती है, क्योंकि इस बार यह सियासी गठबंधन अवाम के दबाव के कारण भी हो रहे हैं। मायावती अगर यह समझती हैं कि उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल भी साबित हो सकता हैI

भाजपा का मज़बूत वोट बैंक मध्य प्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी है। इस तीनों राज्यों में इस साल के अंत तक विधान सभा चुनाव होने वाले हैं और एक TV चैनल द्वारा कराये गए सर्वे के अनुसार तीनों जगह भाजपा बुरी तरह हार रही है। ज़ाहिर है इसका असर तुरंत बाद होने वाले लोक सभा चुनावों पर भी पडेगाI

कुल मिला कर देखा जाय तो उसको 2014 में सत्ता के शिखर पर पहुंचाने वाली हिंदी पट्टी से इस बार भाजपा को बहुत बड़ा झटका मिलने की प्रबल संभावना हैI भाजपा इसकी बंगाल, ओडिशा, आसाम आदि से भरपाई करने का जतन कर रही है, लेकिन हिंदी पट्टी का झटका इतना बड़ा लगने की सम्भावना है कि अन्य राज्यों की मरहम पट्टी से उसकी भरपाई संभव नहीं होगीI

एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि 2014 में जब भाजपा अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थी और जब सब कुछ उसके फेवर में था तब उसे 31 % वोट मिले थे इस बार अगर सत्ता मुखालिफ रुझान के चलते उसके 5% वोट भी घटे तो उसकी 100 से अधिक सीटें घट जायेंगीI

फेसबुक पर भाजपा के एक भक्त पत्रकार ने भी सभी राज्यों की सम्भावित सीटों को जोड़ कर बताया है कि किसी भी प्रकार से भाजपा को 180 सीटों से ज्यादा नहीं मिलेंगीं। ज़ाहिर है उन्होंने जनता के बीच भाजपा के विरोध का वैसा मूल्यांकन नहीं किया होगा जैसा किया जाना चाहिएI

कुल मिला के देखा जाए तो 2019 भाजपा के लिए बड़े खतरे की घंटी है लेकिन उसके तरकश में तीरों की कमी नहीं है वह हारी बाज़ी पलटने की माहिर भी है। देखना होगा कि वह इसके लिए क्या क्या हथकंडे अपनाती है और इसकी कीमत समाजी ताने बाने को कितनी अदा करनी पड़ सकती हैI

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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