मोदी बंजारा-सिंघल को बचाते हैं तो योगी विक्रम-बृजलाल को

न्यायिक प्रक्रिया को पूरा किए बगैर आए फैसलों से खतरे में आ जाएगा लोकतंत्र...

मोदी बंजारा-सिंघल को बचाते हैं तो योगी विक्रम-बृजलाल को

बहस-विधि प्रश्न सुने बगैर आदालत ने दिया फैसला

लखनऊ कोर्ट ब्लास्ट पर आए फैसले के बाद रिहाई मंच ने यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में की प्रेस वार्ता

लखनऊ, 25 अगस्त 2018। लखनऊ कोर्ट ब्लास्ट पर आए फैसले के बाद रिहाई मंच ने यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में प्रेस वार्ता की। फैसले पर बात करते हुए न्यायिक जवाबदेही के सवाल पर देशभर के पूर्व न्यायाधीश व प्रशासनिक अधिकारियों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानूनविदों से विमर्श कर इस मामले पर उच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित कराने की बात कही।

प्रेस वार्ता को रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब, पूर्वआईजी एसआर दारापुरी, सामाजिक कार्यकर्ता अरुन्धति धुरु, अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन और मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पाण्डे ने संबोधित किया।

न्यायिक प्रक्रिया को पूरा किए बगैर आए फैसलों से खतरे में आ जाएगा लोकतंत्र

रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि अब देश में मोदी-योगी-शाह मॉडल ज्यूडिशमयरी बन रही है जहां जज लोया जैसे लोग भी सुरक्षित नहीं। अगर कोई जज लोया की तरह मौत नहीं चाहता तो उसे इनके मन मुताबिक फैसले देने होंगे। यो

योगी द्वारा आतंकवाद के मामलों के लिए अलग कोर्ट के गठन की मंजूरी का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि सबसे पहले योगी को अपने मामलों की सुनवाई करानी चाहिए। उन्होंने कहा कि तारिक कासमी और अख्तर के लखनऊ के केस में 23 अगस्त 2018 को अकस्मात आए निर्णय ने न्यायिक प्रक्रिया को धता बता देने का काम किया। यह मुकदमा 2008 से चल रहा था। दंड प्रक्रिया की धारा 24 सेशन न्यायालय में बहस की प्रक्रिया की व्यवस्था देती है कि साक्ष्य समाप्त होने के बाद अभियोजक मामले का उपसंहार करेगा और अभियुक्त या उसका वकील उत्तर देने का हकदार होगा। इस केस में अभियोजक अधिकतर खामोश रहे हैं और एटीएस के वकीलों ने बहस की। जहां अभियुक्त या उसका वकील कोई विधि प्रश्न उठाता है वहां अभियोजन न्यायाधीश की अनुज्ञा से ऐसे विधि प्रश्नों पर अपना निवेदन कर सकता है। एटीएस के वकील के निवेदन पर 16 अगस्त 2018 को उन्हें उत्तर देने का समय प्रदान करते हुए न्यायालय ने मुकदमा 23 अगस्त के लिए नियत कर दिया था। धारा 235 दंड प्रक्रिया संहिता की व्यवस्था के अनुसार बहस एवं विधि प्रश्न सुनने के पश्चात न्यायाधीश मामले में निर्णय देगा, लेकिन उससे पहले ही न्यायाधीश द्वारा निर्णय घोषित किया जाना न्यायिक प्रक्रिया की धज्जियां उधेड़ना है। जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को मजबूर होकर जनता के बीच में आकर अपनी मजबूरी का इजहार करना पड़ता है तो हमारे लिए आवश्यक हो जाता है कि हम कानूनी विकल्प के अतिरिक्त जनता को न्यायालय की बदउनवानियों से अवगत कराएं। आज हम अपने इसी धर्म का पालन करने लिए यहां उपस्थित हैं।

वे बताते हैं कि न्यायाधीश महोदया हर तारीख पर जेल कोर्ट में साढ़े 11 से पहले उपस्थित हो जाया करती थीं। किन्तु 23 अगस्त को लगभग सवा 11 बजे मैं जब जेल कोर्ट में पहुंचा तो वहां पर एटीएस के अधिवक्ता भी उपस्थित थे। लगभग 3ः40 बजे न्यायाधीश महोदया जेल कोर्ट में अपने चेंबर में गईं और 4 बजे कोर्ट रुम आकर दोष सिद्ध का निर्णय सुना दिया। पहले से निर्णय पर टाइप शुदा दंड के प्रश्न पर सुनवाई की नियत तिथि 27 अगस्त 2018 घोषित कर चेंबर में वापस चली गईं।

इस केस में तत्कालीन न्यायाधीश के सामने बहस पूरी की जा चुकी थी और एटीएस की ओर से बचाव पक्ष की बहस का जवाब देने के लिए बार-बार तारीखें लेकर न्याय में विलंब किया जाता रहा। अपै्रल माह में बहस लगभग समाप्त हो चुकी थी। उसी दौरान तत्कालीन न्यायाधीश का स्थानांतरण लखनऊ में ही दूसरे न्यायालय में कर दिया गया। मौजूदा न्यायाधीश महोदया ने  26 अपै्रल को कार्यभार ग्रहण किया। उसी दिन बचाव पक्ष द्वारा सत्र न्यायाधीश लखनऊ के सामने प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर न्याय में विलंब रोकने के उद्देश्य से केस को पूर्व न्यायाधीश के समक्ष स्थानांतरित करने का अनुरोध किया गया। लेकिन सेशन न्यायाधीश ने प्रार्थना पत्र की सुनवाई एक महीने के लिए टाल दी। इस बीच मौजूदा न्यायाधीश महोदया बहस सुनती रही और स्थानांतरण प्रार्थना पत्र आज भी लंबित है जिसमें सुनवाई की अग्रिम तिथि 7 सितंबर 2018 नियत है।

खुद मुकदमों को लंबा खींचती है एटीएस

इस फैसले के बाद आतंकवाद के मुकदमों में तेजी लाने के एटीएस के दावों पर मुहम्मद शुऐब कहते हैं कि एटीएस खुद मुकदमों को लंबा खींचती है। एटीएस एक-एक गवाह प्रस्तुत करने में महीनों का समय लगाती है। सीआरपीएफ कैंप समेत कई मामलों में तो मुकदमों में तेजी लाने के लिए अभियुक्तों को हाईकोर्ट तक जाना पड़ा था। तब भी उसकी कार्यपद्धति में कोई बदलाव नहीं आया। यह माननीय कोर्ट की अवमानना है।

आतंकवाद के मामलों में अदालती अनुभवों को रखते हुए वे कहते हैं कि बारांबकी में निर्णय सुनाते समय वहां के न्यायाधीश ने ईमानदारी बरती थी- स्वीकार किया था कि बहुत मजबूरी में उन्हें वह निर्णय पारित करना पड़ा। फैजाबाद न्यायालय में भी श्री आरके गौतम गवाहों के बयान कराते समय उनके द्वारा दिए गए बयान को अभियोजन के पक्ष में लिखाने का प्रयास करते रहते थे। उन्होंने यह भी कहा कि उनका एक मुस्लिम दोस्त आरएसएस का मेंबर है। जिसके बाद हमारी तरफ से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 479 के तहत प्रार्थना पत्र देकर कहा गया कि वह उक्त मुकदमे में व्यक्तिगत रुप से हितबद्ध है और मुकदमा अपने पास से हटा लें, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।

यह फैसला नजीर न बन जाए इसलिए जनता को लड़ना होगा

वे कहते हैं कि कोर्ट ब्लास्ट के फैसले पर एटीएस की विज्ञप्ति स्पष्ट करती है कि निर्णय पारित करवाने में एटीएस का हाथ रहा है। इस विज्ञप्ति से पहले एटीएस की कोई विज्ञप्ति निर्णय पर नहीं आई है और यह भी विदित हो कि निर्णय की प्रतिलिपि किसी को उपलब्ध नहीं कराई गई। उसका प्रभावी भाग न्यायालय कक्ष में मेरे अलावा किसी ने पढ़ा भी नहीं था जो मुझे बहुत मुश्किल से पढ़ने को मिला।

पूर्व आईजी एसआर दारापुरी ने उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अयोग अध्यक्ष और पूर्व एडीजी लॉ एण्ड आर्डर बृजलाल द्वारा आधिकारिक रूप से विज्ञप्ति जारी करने पर सवाल उठाया। क्योंकि बृजलाल इस मुकदमे में एक हितबद्ध पक्षकार हैं जिन्हें आरडी निमेष आयोग ने दोषी पाया। उनके खिलाफ खालिद मुजाहिद की हत्या का आरोप भी विचाराधीन है। खालिद की हत्या की विवेचना के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिका विचाराधीन है और बाराबंकी न्यायालय में हत्या के केस में प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट अब तक स्वीकार नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि इस मामले में बृजलाल समेत विक्रम सिंह, अमिताभ यश, मनोज कुमार झा जैसे वरिष्ठ अधिकारियों पर सवाल उठे हैं। फटाफट आया फैसला लॉबी के दबाव के चलते आया ताकि दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई न हो जिसकी सिफारिष निमेष आयोग ने की है।

दोषी पुलिस अधिकारियों को बचाने में लगा पूरा तंत्र

सामाजिक कार्यकर्ता अरुन्धति धुरु कहती हैं कि पुलिस पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वो फर्जी मुकदमों के जरिए लोगों को फंसाती है। इसपर माननीय न्यायालयों ने भी कई बार टिप्पणी की है। अगर यही काम न्यायालय करने लगेंगे तो यह बहुत मुष्किल होगी। यह बड़ी घटना है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही न्याय की घोषणा कर दी जाती है। इसे न्याय तो नहीं कहा जा सकता। यहां तो न्यायालय ही न्यायिक प्रक्रिया की अवमानना करता हुआ दिखता है। न्यायालयों के उत्तरदायित्व को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। अगर यह नजीर बन जाएगी तो इस तरह न्यायिक प्रक्रिया को पूरा किए बगैर फैसले से पूरा लोकतांत्रिक ढांचा खतरे में आ जाएगा।

जब न्यायालय ही न्यायालय की गरिमा को ध्वस्त करने लगे

भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि बृजलाल जो खालिद मुजाहिद हत्या मामले में नामजद अभियुक्त हैं उनको प्रदेश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष कैसे बनाया गया है। जबकि सामान्य व्यक्ति जिसपर छोटी-मोटी धारा लगी होती है उसको वीजा पासपोर्ट नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई लड़ी जाएगी और ये लोग बंजारा-सिंघल की तरत जेल काटेंगे। जब न्यायालय ही न्यायालय की गरिमा को ध्वस्त करने लगे या पुलिस प्रशासन और पुलिस अधिकारियों के दबाव में निर्णय देने लगे तो न्यायालय की महत्ता घटती है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए घातक है। न्याय शाष्त्र ने कभी भी पुलिस की गढ़ी हुई कहानी को महत्व नहीं दिया है। पुलिस के समक्ष अंकित किए गए अभियुक्त के बयान को विश्वसनीय नहीं माना जाता है। यही कारण है कि सरकारें बार-बार ऐसे गैर लोकतांत्रिक कानून लाती हैं जिनमें यह व्यवस्था की जाती है कि पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया बयान न्यायालय में ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाएगा।

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पाण्डेय ने कहा कि बृजलाल बताएं कि क्या वे आरडी निमेष अयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हैं तथा उच्च अदालतों से अभियुक्तो के बरी होने पर लिखित माफी मांगने और अपना गुनाह कुबूल करने को तैयार हैं। बृजलाल के कार्यकाल में आतंकवाद के आरोपों में पकड़े गए और बाद में अदालतों से दोषमुक्त हुए युवकों के फैसले आने के बाद उन्होंने क्यों नहीं माफी मांगी। कचहरी धमाकों के लेकर शुरु से ही बहुत से सवाल उठते रहे हैं। तारिक-खालिद की गिरफ्तारी पर गठित निमेष कमीशन ने दोनों की गिरफ्तारी को संदिग्ध बताया जिसके बाद खालिद की हिरासत में हत्या हो गई। 2008 में इन मुकदमों को लड़ने से रोकने के लिए मुहम्मद शुऐब पर जानलेवा हमला भी कोर्ट परिसरों में हुआ। इन मुकदमों की जेल की चारदिवारी के भीतर सुनवाई होने लगी। वहीं जिस तरह इस मामले की बहस पूरी होने के बाद न्यायाधीश का ट्रांसफर हो गया, बाहर से दूसरी जज आईं और इसी दौरान मीडिया में खबरें आईं कि नाभा जेल जैसी कोई बड़ी वारदात ये करना चाहते थे और इसलिए इनके जेलों का स्थानांतरण किया जाएगा। जबकि अभियुक्तगण लगातार जेल में हो रहे उत्पीड़न की शिकायत कर रहे थे। यह सब बताता है कि यह पूरा मामला राजनीति का शिकार हो गया है। जिसमें पुलिस ऐन केन प्रकारेण छूटना चाहती है क्योंकि उसे डर है कि आरडी निमेष आयोग ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है। तभी एक पूरी लॉबी लगकर निमेष आयोग के सार्वजनिक होने के बाद भी उस पर दबाव बनाकर कार्रवाई नहीं होने दी और अब इस तरह 11 साल पुराने मामले में 2 मिनट में फैसला दे दिया गया।

गौरतलब है कि 23 नवंबर 2007 को लखनऊ कचहरी में हुई वारदात के बाद तारिक कासमी, खालिद मुजाहिद, सज्जादुर्ररहमान, अख्तर वानी, आफताब आलम अंसारी की गिरफ्तारी हुई थी। जिसमें आफताब आलम अंसारी के खिलाफ साक्ष्य न मिलने पर विवेचना अधिकारी ने उन्हें 22 दिन में क्लीनचिट दे दिया था। वहीं सज्जादुर्ररहमान को जेल कोर्ट ने 14 अपै्रल 2011 को बरी कर दिया था। तारिक और खालिद की गिरफ्तारी पर आरडी निमेष आयोग ने 2012 में अपनी रिपोर्ट में यूपी एसटीएफ द्वारा की गई गिरफ्तारी को संदिग्ध कहते हुए दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई की सिफारिश की थी। जिसके बाद खालिद की हिरासत में हत्या कर दी गई थी। तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह, एडीजी लॉ एण्ड आर्डर बृजलाल जैसे बड़े अधिकारियों समेत आईबी पर हत्या का मुकदमा पंजीकृत हुआ था। यहां एक बात और अहम है कि 2007 में कोर्ट ब्लास्ट के लिए हूजी को जिम्मेदार ठहराया गया था तो वहीं सितंबर 2008 बाटला हाउस इनकाउंटर के बाद आईएम को जिम्मेदार ठहराकर पुलिस ने एक ही मामले में दो थ्योरी खड़ी कर दी थी जबकि चार्जषीट तक आ चुकी थी।

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