उल्टा पड़ा मायावती का दांव तो जीवन भर पछताएंगी

ज़मीनी सियासत की कटु सच्चाई नहीं समझ पा रही हैं बहन जी...

अतिथि लेखक
उल्टा पड़ा मायावती का दांव तो जीवन भर पछताएंगी

ज़मीनी सियासत की कटु सच्चाई नहीं समझ पा रही हैं बहन जी

उबैदउल्लाह नासिर

छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव के लिए वहां के बागी कांग्रेसी नेता अजीत जोगी की पार्टी से गठबंधन करके और मध्य प्रदेश के सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का एलान करने के बाद अब पता चला है कि बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती उत्तर प्रदेश के लिए अपने लगभग पचास उम्मीदवारों की लिस्ट का भी जल्द ही एलान करने वाली हैं। इस तरह उन्होंने एक प्रकार से उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ एक महागठबंधन की आशाओं पर पानी फेर दिया हैI

इससे बहुत पहले उन्होंने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर के कहा था की वह सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही महागठबंधन में शामिल होंगी। मायावती के इस बदले हाव-भाव से लोग आश्चर्य चकित थे ही कि उन्होंने एक तरफा कई एलान करके उत्तर प्रदेश की सियासत में भूचाल ला दिया हैI सियासी पंडित उनके इन फैसलों और एलानों की अलग अलग व्याख्या दे रहे हैं,लेकिन इतना तो निश्चित हो गया कि साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ने और देश के समाजी ताने-बाने को बचाने की उनकी चिंता मात्र दिखावा है। उन्हें न देश के बिगड़ रहे समाजी माहौल की चिंता है और न ही उस वर्ग की समस्याओं से कुछ लेना देना, जिसका मसीहा होने का वह दावा करती रहती हैं। क्या मायावती जी नहीं देख रही हैं कि गुजरात के ऊना से ले कर महाराष्ट्र के भीमापुर कोरेगाँव और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में संघ परिवार से सम्बंधित लम्पट युवा दलितों पर क्या अत्याचार कर रहे हैं, जिसका मुख्य कारण उनका सत्ता से निकट होना है जिसके कारण पुलिस प्रशासन ही नहीं कई मामलों में तो उन्हें जिला अदालतों से भी राहत और हिमायत मिल जाती हैI क्या मायावती जी नहीं देख रही हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को किस प्रकार चौपट कर दिया गया जिसका सब से बड़ा खमियाज़ा देश की गरीब जनता को भुगतना पड़ रहा है जिसमें दलित,पिछड़े और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोग सब से अधिक आते हैंI

बहुत से सियासी पंडितों का ख्याल है कि मायावती अपनी कुछ मजबूरियों के चलते मनुवादी ताकतों के हाथों में खेलने को मजबूर हैं उनका कहना है कि इलाहबाद हाई कोर्ट ने बहुजन स्मारकों के रख रखाव से सम्बंधित 14 अरब रूपये के घपले की जांच से सम्बंधित विजलेंस जांच की स्टेटस रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार से तलब कर ली है, जिसमे मायावती और उनके भाई समेत उनके मंत्री मंडल के कई सदस्य और उनके करीबी अफसरशाह अभियुक्त हैं। भ्रष्टाचार के कई अन्य मामलों में मायावती अब तक बचती रही हैं लेकिन उनके दिल में चोर तो बैठा ही है कि कहीं आयु के इस दौर में उनका अंजाम भी लालू यादव जैसा न होI

लेकिन यह तस्वीर का एक रुख ही है उनके उक्त राजनैतिक फैसलों के अन्य कारण भी हैं जिलमें सब से महत्वपूर्ण कारण यह है कि मायावती को अन्दाजा है कि अगली लोक सभा में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलना कठिन है, ऐसी हालत में अगर उनके पास पचास साठ सांसद हों तो वह सेक्युलर पार्टियों के बीच में देवगौड़ा बन कर उभर सकती हैं। उनके सभी राजनैतिक निर्णयों में यही सब से मुख्य कारण है वह उत्तर प्रदेश में महागठबंधन के लिए पचास सीटों का दावा करेंगी और चालीस पैंतालीस के बीच में समझौता कर लेंगी। इसके अलावा वह मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी लोक सभा की कुछ सीटें चाहेंगी। कुल मिला कर वह सत्तर पचहत्तर सीटों पर लड़ कर 50-60 सीटें जीतने की जुगत में हैं। वह अपने इस खेल में सफल भी हो सकती हैं क्योंकि कांग्रेस नहीं चाहेगी कि मोदी जी किसी भी तरह दोबारा प्रधान मंत्री बनें। इसी तरह बीजेपी भी नहीं चाहेगी कि राहुल गांधी या कोई और प्रधान मंत्री बने। इस लिए दोनों ग्रुप मायावती को आगे कर सकते हैं लेकिन इस राह में भी कई पेंच हैंI

सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि यदि उत्तर प्रदेश में मायावती महागठबंधन से अलग हो कर लड़ेंगी तो उन्हें मुस्लिम वोट लगभग न के बराबर मिलेगा, क्योंकि उनके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए उनके बीजेपी के पाले में जाने की सम्भावना से मुस्लिम वोट उन से सतर्क रहेगा। दूसरी ओर दलितों में अगर जाटवों को छोड़ दिया जाए तो अन्य जातियां कोइरी, पासी, बाल्मीकि धोबी आदि बीजेपी के साथ जा चुके हैं। दलितों में भी जिग्नेश मेवानी, चंद्रशेखर और भाई तेज सिंह जैसे दलित नेता उभर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटवों पर चंद्रशेखर की पकड़ काफी मज़बूत बताई जा रही है। उन्होंने अपनी रिहाई के बाद मायावती को बुआ कह के उनकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था, लेकिन मायावती ने उसे झटक दिया। दरअसल वह कोई अन्य दलित नेतृत्व उभरने ही नहीं देना चाहती हैं, जबकि दलितों में राजनैतिक रूप से सब से सजग जाटव बिरादरी नए नेतृत्व और नए विकल्प को तलाश रही है। इस लिए डर लगता कि दोनों हाथों में लड्डू रखने के चक्कर में मायावती कहीं पिछले लोक सभा और विधान सभा के चुनाव वाले नतीजे पर न पहुंचेंI

बहरहाल यह तो तय है कि मायावती कठिन मोलभाव कर के ज्यादा से ज़्यादा सीटें हथियाने के चक्कर में हैं, लेकिन क्या अखिलेश यादव इतनी सीटें देने पर राज़ी हो जायेंगे। अब अखिलेश भी उतना नहीं दबेंगे जितना वह पहले की हालत में दब सकते थे अब वह मायावती से बराबर सीटों का ही समझौता करेंगे क्योंकि मुलायम सिंह तो वैसे भी मायावती और कांग्रेस से समझौते के विरोधी हैं I

जहां तक कांग्रेस की बात है उत्तर प्रदेश में वह किसी भी पार्टी से मोलभाव करने की पोजीशन में नहीं है, हो सकता है वह बहुत दब के भी समझौता कर ले लेकिन पार्टी की राज्य इकाई सम्मान जनक समझौते या फिर अकेले लड़ने का जोर डाल रही हैI प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने आशा जताई है कि महागठबंधन अंतिम समय तक ज़रूर बन जायगा, लेकिन पार्टी में ही एक बड़ा वर्ग यह समझता है कि अकेले लड़ कर भी पार्टी 12 से 15 सीटें तक जीत सकती है क्योंकि लोक सभा चुनाव की गणित विधान सभा चुनाव से भिन्न होती है। पार्टी के वरिष्ट नेताओं का दावा है कि मोदी सरकार की अकर्मण्यता भ्रष्टाचार साम्प्रदायिकता और मंहगाई के कारण जनता का मोह बीजेपी से भंग हुआ है और वह कांग्रेस विशेषकर राहुल गाँधी की ओर ही आशा भरी नज़रों से देख रहे हैं। यही कारण है कि पार्टी में प्रबुद्ध वर्ग के लोगों के शामिल होने का सिलसिला जारी हैI

कुल मिला के फिलहाल उत्तर प्रदेश में ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी महागठबंधन कोई स्वरूप नहीं ले सका है लेकिन उत्तर प्रदेश में मायावती ने जैसा पेच फंसा दिया है वैसा अन्य राज्यों में नहीं फंसा है। मायावती ने अपने स्तर पर बहुत बड़ा रिस्क लिया है या तो वह राजनीति के शिखर पर पहुँच सकती हैं लेकिन यदि इस बार गिरीं तो फिर उनका उठ पाना बहुत बहुत कठिन हो जाएगाI

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