मुज़फ्फरनगर – बर्निंग लव स्टोरी, न कथा, न घटना, न समस्या, सिर्फ चूं चूं का मुरब्बा

2013 में घटित मुज़फ्फरनगर की घटनाएं अभी इतनी पुरानी नहीं हुयी हैं कि पढने लिखने वाले लोग उसकी सच्चाई भूल गये हों। अब बालीवुड की जो फिल्में केवल व्यवसाय की दृष्टि से बन रही हैं वे बहुत खराब बन रही हैं ...

वीरेन्द्र जैन

2013 में घटित मुज़फ्फरनगर की घटनाएं अभी इतनी पुरानी नहीं हुयी हैं कि पढने लिखने वाले लोग उसकी सच्चाई भूल गये हों। अब बालीवुड की जो फिल्में केवल व्यवसाय की दृष्टि से बन रही हैं वे बहुत खराब बन रही हैं और तकनीक के तमाशे से मजमा जमा कर कुछ बाहुबली भले ही व्यवसाय कर लें किंतु उन्हें आमिर खान की तरह कला के सहारे व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने की श्रेणी में बहुत नीचे के पायदान पर जगह मिलेगी।

हरीश कुमार निर्देशित यह फिल्म अनेक तरह की आशंकाओं, आकांक्षाओं, और अनिश्चितताओं से घिर कर चूं चूं का मुरब्बा बन कर रह गयी है। ऐसा लगता है कि यह फिल्म मुज़फ्फरनगर की कढवी सच्चाइयों को दबाने के लिए बनायी गयी है, क्योंकि इसी घटना के पीछे छुपे षड़यंत्रों को प्रकट करती कुछ डाकूमेंट्रीस और वीडियो फिल्में बनायी जा चुकी हैं जिन्हें घटना के जिम्मेवार लोगों द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन से रुकवा दिया गया है, किंतु फिर भी वे बुद्धिजीवियों के बीच देखी दिखायी जा चुकी हैं। निर्माता ने सत्तारूढ दल के सांसद और अब मंत्री से इस फिल्म निर्माण के लिए आशीर्वाद लिया है इसलिए उनका धन्यवाद भी किया है जो कभी मुम्बई के पुलिस कमिश्नर रहे हैं।

मुजफ्फरनगर में घटित जिस घटना से वहाँ संहार और प्रतिसंहार की घटनाएं घटीं उसको थोड़ा सा बदल कर कहानी का प्रारम्भ किया गया है। पहले एक समुदाय द्वारा और फिर दूसरे समुदाय द्वारा इकतरफा हिंसा की घटनाएं घटी थीं। लोकसभा के आगामी चुनावों को देखते हुए राजनीतिक दलों ने इस आग में घी ही नहीं डाला अपितु आग को फैलाने के लिए हवा भी चलवायी। फिल्म में राजनीतिक दलों के एक पक्ष को दोषी बताया गया है जबकि दूसरे पक्ष के लोग जो बड़े दोषी थे व जिन्होंने नकली वीडियो बना कर उसे अपलोड कर भावनाएं भड़ाकायीं थीं उनकी चर्चा ही नहीं की है। इतना ही नहीं उन आरोपियों को चुनाव प्रचार के दौरान एक दल के बड़े बड़े नेताओं द्वारा सम्मानित भी किया गया था, उन्हें टिकिट भी दिया गया था और बाद में मंत्री भी बनाया गया। इस दुखद घटना में लगभग आधे लाख अल्पसंख्यक लोग सुविधाविहीन कैम्पों में महीनों भूखे प्यासे व स्वास्थ सुविधाओं से वंचित होकर लम्बे समय तक रहे उनकी कोई झलक तक फिल्म में नहीं दिखायी गयी है। 

किसी दुर्घटना के साम्प्रदायिक दंगे में बदलने के पीछे बहुत सारी कारगुजारियां होती हैं जो वर्षों से चल रही होती हैं। कुछ संगठन इसके लिए निरंतर काम करके समाज में नफरतों के झूठे सच्चे इतिहास के सहारे समाज को साम्प्रदायिक दृष्टि से सम्वेदनशील बनाते रहते हैं, और अब ऐसे संगठन दोनों तरफ काम कर रहे हैं। ध्रुवीकरण का चुनावी लाभ हमेशा बहुसंख्यकों को मिलता है इसलिए ज्यादातर वे आक्रामक और अल्पसंख्यक रक्षात्मक होते हैं। जब अल्पसंख्यक को उत्तेजित कर दिया जाता है तो कई बार भय की अवस्था में वह भी पहले हमलावर हो जाता है।

इस घटना से उठायी गयी कथा पर लगभग तीस साल पहले वाली बम्बैया फिल्मों के ढाँचे में पिरो दिया गया है जिसमें हीरो का हीरोइन से उलझ कर प्रथम दृष्ट्या प्रेम हो जाता है। हीरो और हीरोइन अलग धर्मों के परिवार से हैं। शहर में शूटिंग की प्रैक्टिस के लिए दिल्ली शहर में रह कर आया हीरो दस बीस लोगों को अकेले ही ठिकाने लगा देता है और उनकी लाठी डंडे बन्दूकें काम नहीं आते। नायक या खलनायक के साथ घटी हिंसा के अलावा अन्य किसी के साथ घटी हिंसात्मक घटनाएं पुलिस और कानून का मामला नहीं बनतीं। कहानी में अनावश्यक रूप से गीत और नृत्य ठूंसे गये हैं जिनकी अस्वाभाविकता से फिल्म के विषय की गम्भीरता नष्ट होती है। हीरोइन कुछ ही दिनों में आईपीएस होकर सीधे एसपी के रूप में अपने होम टाउन में पदस्थ हो जाती है व ऐसी टाइट वर्दी पहिनती है जिससे वह एसपी से ज्यादा हीरोइन दिखायी दे। हीरो देव शर्मा सीधे सीधे अमिताभ की पुरानी एंग्री यंगमैन की छवि से प्रभावित है व वैसा ही नकल करने की असफल कोशिश कर रहा है, वहीं हीरोइन ऐश्वर्या देवान उसी दौर की किसी नायिका की तरह व्यवहार करते हुए ओवरएक्टिंग करती हैं। कुछ संवाद जरूर अच्छे लिखे गये हैं किंतु गलत डायलोग डिलीवरी और कमजोर पटकथा के कारण वे थेगड़े से लगते हैं। खलनायक के रूप में अभिनेता अनिल जार्ज अवश्य प्रभावित करते हैं।

सेंसर बोर्ड से पास इस फिल्म को भी प्रचार के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पाँच जिलों में प्रदर्शन के लिए प्रतिबन्धित किये जाने की खबरें समाचार पत्रों में प्रकाशित की गयी हैं जिसे अधिकारियों का मौखिक आदेश भी बताया जा रहा है। आजकल प्रचार के लिए ऐसे हथकंडे फिल्म व्यवसाय का आवश्यक हिस्सा बन गये हैं। नायक नायिका का पारिश्रमिक फिल्म निर्माण के बज़ट का सबसे बड़ा हिस्सा होते हैं किंतु इस फिल्म में वे नये हैं, इसलिए यह कम लागत की फिल्म है क्योंकि शूटिंग के लिए भी बड़े सेटों की जरूरत नहीं पड़ी है और सब कुछ पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसी गाँव, हवेली या ड्राइंग रूम में हो गयी है। कम लागत के कारण इसे व्यावसायिक रूप से असफल नहीं कहा जायेगा किंतु फिल्म के रूप में ना तो यह कलात्मक, न घटनाप्रधान, न मनोरंजक, न ही यथार्थवादी, न कुशल अभिनय निर्देशन सम्पन्न फिल्म कही जा सकती है। अगर भविष्य में नायक नायिका सफल होंगे तो यह फिल्म उन्हें पहले पहल प्रस्तुत करने के लिए उल्लेखित होगी।

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