अहमद पटेल ने भाजपा की चोटी काट ली !

काँग्रेस का पहला तमाचा वो भी फासिस्टों के गढ़ में मुबारक हो.... अहमद पटेल जीते, सोशल मीडिया में अमित शाह, मोदी-भाजपा की थू-थू...

हाइलाइट्स
  • काँग्रेस का पहला तमाचा वो भी फासिस्टों के गढ़ में मुबारक हो
  • अहमद पटेल जीते, सोशल मीडिया में अमित शाह, मोदी-भाजपा की थू-थू

 

नई दिल्ली। कांग्रेस और भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बने गुजरात राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की जीत के बाद सोशल मीडिया में एक से बढ़कर एक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। चहुँओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमितशाह और भारतीय जनता पार्टी की आलोचना हो रही है।

समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सदस्य जावेद अली खान ने फेसबुक पर पूछा –

“अहमद पटेल जीत गए !

मुस्लिम विधायकों के धुवीकरण से ?”

उनकी पोस्ट पर Nazim Ali Khan ने कमेंट किया – “अहमद पटेल ने भाजपा की चोटी काट ली।“

पत्रकार संजय तिवारी ने लिखा –

“अहमद पटेल को राज्यसभा में पहुंचने से रोकने की कोशिश बीमार लोकतंत्र का लक्षण है। इस बीमारी को पैदा कांग्रेस ने किया था अब बीजेपी उसी का इस्तेमाल कांग्रेस के खिलाफ कर रही है।

मैं जानता हूं कि इसके पीछे का मकसद क्या है। वो सोनिया गांधी को बताना चाहते हैं कि आपके पार्टी की दशा ये हो गयी है कि अपने सबसे करीबी व्यक्ति को राज्यसभा भी नहीं भेज सकते।

लेकिन जो लोग ऐसी रणनीति को बीजेपी की कामयाबी मान रहे हैं वो जान लें बीजेपी का कल भी आयेगा। वैसे ही जैसे कांग्रेस का आज आया हुआ है। और वह कल जब आयेगा तो बीजेपी का भी हिसाब होगा। वैसे ही जैसे आज कांग्रेस का हो रहा है। नियति सबका बराबर हिसाब करती है।“

सामाजिक कार्यकर्ता संदीप वर्मा ने लिखा –

“ढोल ताशे और गाजे बाजे के साथ विवाह में दुल्हन को घर लाने का मतलब यह नहीं है कि कोई भी ऐरा-गैरा ढोल नगाड़े बाजे और भीड़ लेकर किसी भी लड़की को उसके घर से उठा कर उसे अपनी दुल्हन बना ले। मगर इस निजाम में यह भी होने की कोशिश होने लगी है। मीडिया जिस तरह से किराए के ढोल ताशे वाले बनकर अपहरणकर्ताओं के पक्ष में गाना गा कर श्री अहमद पटेल जी को हराने के लिए शोर मचाकर अनैतिक और गैर-कानूनी तरीकों को चन्दन तिलक लगाकर पूजनीय बता रहे थे, वह घोर आपत्तिजनक तो है ही बल्कि लुटेरों, अपहर्ताओं, अपराधियों के कारनामों को समाज में आदर्श स्थापित करने की कोशिश भी है। जिस तरह एक जमाने में मनोहर कहानियां जैसी पत्रकाए चम्बल के डाकुओं, नृशंस हत्यारों की ग्लैमरस कहानियाँ छाप-छाप कर उन्हें हीरो बनाती थी, उसी परम्परा का विकास मीडिया में श्री अहमद पटेल जी को हारने के प्रयास में दिखाई दिया है।”

कांग्रेस कार्यकर्ता रामकृष्ण मिश्र ने लिखा –

“गुजरात का राज्यसभा चुनाव कांग्रेस के धैर्य, संघर्ष और एकजुटता की परीक्षा थी...

यही संघर्ष और एकजुटता बनाये रखनी होगी...

यकीनन गुजरात में हम आ रहे हैं...

सत्यमेव जयते!!!”

तो मोहित खान ने कमेंट किया –

काँग्रेस का पहला तमाचा वो भी फासिस्टों के गढ़ में मुबारक हो

इतिहासकार आलोक बाजपेई ने लिखा –

“गुजरात राज्य सभा पर मची अफरातफरी से एक बात तो साफ है।

कांग्रेस आज भी अपनी पे उतर आए तो दिन में तारे दिख जाएं साहब मंडली को।“

पत्रकार महेंद्र मिश्र ने लिखा –

“दोनों वोट रद्द.आयोग ने सुनी अंतरात्मा की आवाज. मंत्रियों का दबाव काम नहीं आया.”

तो लगे हाथ वरिष्ठ साहित्यकार अरुण माहेश्वरी ने कमेंट किया –

“अंतरात्मा की नहीं, संविधान की। वह धन्यवाद का पात्र है।“

रंगकर्मी दिनेश चौधरी ने लिखा –

“कौन हारा या जीता, मुझे नहीं मालूम। मैंने तो सिर्फ इतना देखा कि एक आपराधिक चरित्र वाले औसत दर्जे के नेता ने अपनी दबंगई से घण्टों लोकतन्त्र को बंधुआ बनाकर रख दिया और किसी की हिम्मत नहीं थी कि वह चूँ तक कर सके। फैसला ऐसा आया तो मेहरबानी! वैसा आता तो क्या कर लेते? महामहिम से लेकर मी-लार्ड तक अब कोई इस देश में किसी भी बात का संज्ञान नहीं लेता। ख़ास अपनी खाल बचाने में लगे है और कि आम की खाल बड़ी बेदर्दी से उतारी जा रही है। उनके जूते अब अपनी ही खाल से बनेंगे क्योंकि गोमाता की तो रक्षा करनी है। पिटारे में रखे मुर्गों की तरह टुकुर-टुकुर दूसरे को कटते देखें और अपनी बारी का इंतज़ार करें। आपको ज्यादा से ज्यादा झटका या हलाल होने का ऑप्शन दिया जाएगा। इतनी रियायत तो वे करेंगे ही!”

मानवाधिकार कार्यकर्ता फर्राह शकेब ने लिखा –

“गुजरात के राज्यसभा चुनाव में सबसे ज़ियादा फ़ज़ीहत नीतीश कुमार की हुई है,

इस फ़ज़ीहत को मीडिया में स्पेस नही मिलेगा न कोई डिबेट होगी इस पर ..

क्योंकि मीडिया को नीतीश की इमेज ब्रांडिंग का काम मिला है, और पिछले 20 22 सालों में मीडिया केवल 4 साल नीतीश के विरुद्ध रहा है जिस दौरान नीतीश की अंतरात्मा मर गयी थी और वो लालू के साथ आ गए थे।

नीतीश जी बिहार में नैतिकता, भ्रष्टाचार के विरुद्ध ज़ीरो टॉलरेन्स, और सिध्दांतवाद समझाते हुए आकंठ तक अपराध,और भ्रष्टाचार में डूबी हुई पार्टी के लिए वोट देने का आदेश देते हैं और उनकी पार्टी का एक विधायक अपने हिसाब से नैतिकता का मापदण्ड तय करता है और जनादेश का सम्मान करते हुए जिसके विरुद्ध जीत कर विधानसभा में पहुंचा है उसके विरुद्ध ही राज्यसभा में वोट करता है ..”

वरिष्ठ साहित्यकार वीरेंद्र यादव ने लिखा –

“जिस देश का कानून मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री अपनी ही संवैधानिक संस्था के समक्ष झूठी पैरवी करे उसे दुर्दिन से कौन, कब तक बचा सकता है!

काश उन्हें अहसास होता कि वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं!”

वरिष्ठ पत्रकार चंचल जी ने लिखा –

शुक्रिया शक्ति सिंह गोहिल। जनतंत्र जिंदा रहेगा, उम्मीद है।

8 अगस्त 2017 गांधी नगर

8 अगस्त 1942 बम्बई। मिलान करिये, 9 अगस्त 42 की भोर कांग्रेस विस्तार दे देती है। समूचा देश उठ कर खड़ा हो जाता है। इतिहास बदल जाता है। अंग्रेजी साम्राज्यवाद को एक बूढ़े फकीर ने चुनौती दी। गांधी जी बोले थे, शायद कल हममें से कोई भी नेतृत्व देने के लिए मौजूद न रहे अब यह लड़ाई जनता को सौंप कर जा रहा हूँ। 8 अगस्त की रात सारे नेता गिरफ्तार कर लिए गए। 9 अगस्त को कांग्रेस का झंडा फहराया एक बहादुर लड़की ने और देश तनकर खड़ा हो गया। उस लड़की ने अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम कर दिया। बड़ा लंबा इतिहास है। वे रहीं अरुणा आसफ अली।

आज कांग्रेस नहीं पूरा देश अगस्त क्रांति दिवस मना रहा है। गुजरात का फैसला नई रोशनी लेकर आया है।

 

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