वसंत विहार की झुग्गी बस्ती : हिन्दी मीडियम

‘हिन्दी मीडियम' एक ऐसी जरूरी फिल्‍म है, जिसे अवश्य देखा जाना चाहिए। यह अपने तरह की खास ही फिल्म है जो दर्शकों को गुदगुदाने, उनका मनोरंजन करने के साथ ही अपना संदेश देने में पूरी तरह सफल रही है।     ...

फिल्म रिव्यू

वसंत विहार की झुग्गी बस्ती : हिन्दी मीडियम

वीणा भाटिया

बॉलीवुड में कभी-कभी ही कोई ऐसी फिल्म बनती है जो किसी ज्वलंत समस्या पर विचार करने को मजबूर कर देती है। हिन्दी मीडियम एक ऐसी ही फिल्म है।

साकेत चौधरी निर्देशित यह फिल्म भारतीय मध्य वर्ग के जीवन की ऐसी विसंगति को उजागर करती है, जिस पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो।

दरअसल, आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी अंग्रेज़ी एक भाषा से ज्यादा स्टेटस सिंबल ही है। इंग्लिश मीडियम स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना हर व्यक्ति की चाहत होती है। इसी को देखते हुए आज बड़े शहर हों या छोटे कस्बे, हर जगह इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल गए हैं। दरअसल, यह औपनिवेशिक गुलामी वाली मानसिकता का परिणाम है।

आज अंग्रेजी पढ़ना-लिखना और बोलना ही शिक्षित होने का पर्याय बन गया है। उच्च शिक्षा संस्थानों में अंग्रेजी पूरी तरह हावी है। प्रशासन, न्यायपालिका, संसद हर जगह अंग्रेजी का ही सिक्का चलता है। सामान्य परिवारों के बच्चे प्रतिभाशाली होते हुए भी सिर्फ अंग्रेजी की अच्छी जानकारी नहीं होने के कारण पिछड़ जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिए जाने का विरोध किया था, पर आजादी के बाद भी अंग्रेजी का प्रभाव हर क्षेत्र में बना रहा। कहा जा सकता है कि अंग्रेजी के प्रति आकर्षण उस मानसिक गुलामी को दर्शाता है जो दो सौ वर्षों के औपनिवेशिक शासन का परिणाम है। यह एक ऐसी सच्चाई है जिससे आंखें नहीं चुराई जा सकती। इससे कई तरह की विडंबनाएं पैदा हुई हैं, जो कई बार बहुत ही त्रासद तो हास्यास्पद भी हो जाती हैं।

इसी विडंबना को दिखाने की कोशिश ‘हिन्दी मीडियम’ में की गई है।

कहा जा सकता है कि यह अपने तरह की खास ही फिल्म है जो दर्शकों को गुदगुदाने, उनका मनोरंजन करने के साथ ही अपना संदेश देने में पूरी तरह सफल रही है।      

फिल्म की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाले कपड़ों के विक्रेता राज बत्रा (इरफान खान) की है जिसने हिन्दी मीडियम से पढ़ाई  की और उसे टूटी-फूटी अंग्रेजी भी आती है। लेकिन उसकी पत्नी मीता (सबा कमर) को अच्छी अंग्रेजी आती है और वह चाहती है कि उसकी बच्ची पिया टॉप के अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई करे। उसके एडमिशन के लिए राज और मीता बहुत कोशिश करते हैं और एडमिशन से पहले माता-पिता के इंटरव्यू के दौरान उन्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। इस सबके बावजूद जब पिया का नाम किसी कॉन्वेंट स्कूल की लिस्ट में नहीं आता तो राज फर्जी डॉक्युमेंट के सहारे बीपीएल कोटे से पिया का एडमिशन कराने की कोशिश शुरू करता है और वसंत विहार जैसे पॉश जगह से एक झुग्गी बस्ती में शिफ्ट हो जाता है। मीता वहां गरीबों की तरह रहती है और राज फैक्ट्री में काम करने के लिए जाने लगता है।

ये सब कुछ केवल इंग्लिश मीडियम में बच्चे की पढ़ाई के लिए। जाहिर है, यह अतिरंजना भी विडंबना को सामने लाने के लिए ही दिखाई गई है।

झुग्गी बस्ती में दीपक डोबरियाल सामने आते हैं। वे भी बीपीएल कोटे से अपने बेटे का एडमिशन उसी स्कूल में कराना चाह रहे हैं जिसमें राज की बेटी ने फॉर्म भर रखा है। फिल्म में फैक्ट्री वर्कर श्याम के तौर पर उनकी भूमिका कमाल की है।

इरफान और दीपक डोबरियाल का अभिनय बहुत ही सधा हुआ है। सहज और स्वाभाविक अभिनय के साथ वे जो हास्य पैदा करते हैं, वह दर्शकों को बांध लेने वाला है।

अभिनय में पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर जरा भी उनसे पीछे नहीं हैं। भारतीय परिवेश में अपने किरदार को सबा कमर ने बहुत अच्‍छी तरह निभाया है।

यह फिल्‍म इरफान की अदाकारी, कॉमिक और संवाद अदायगी के लिए यादगार रहेगी। साधारण संवादों में सिर्फ अपने खास अंदाज से वे हास्‍य और व्‍यंग्‍य पैदा करते हैं। उनका हास्य और व्यंग्य बेध कर रख देने वाला है। वे हर उस पिता का प्रतिनिधित्व करते लगते हैं जो अपने बच्चे को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाने का दबाव झेल रहा है।

कहा जा सकता है कि ‘हिन्दी मीडियम' एक ऐसी जरूरी फिल्‍म है, जिसे अवश्य देखा जाना चाहिए। फिल्म में व्यंग्य के छींटे किस कदर पड़ते हैं, उसकी एक बानगी देखें। राज बत्रा कहता है – “इंग्लिश इज इंडिया एंड इंडिया इज इंग्लिश। ह्वेन फ्रांस बंदा, जर्मन बंदा स्‍पीक रौंग इंग्लिश, वी नो प्राब्‍लम। एक इंडियन बंदा से रौंग इंग्लिश, तो बंदा ही बेकार हो जाता है जी।“

कहा जा सकता है कि अंग्रेजी के अनपेक्षित प्रभाव के मुद्दे को उठा कर इस फिल्म ने एक बड़ी ऐतिहासिक-सामाजिक विसंगति को जाहिर तो किया ही है, एक बड़ा सवाल भी दर्शकों के सामने रखा है। जाहिर है, इस सवाल से संवेदनशील दर्शकों को ही जूझना है।

कलाकार : इरफान खान, सबा कमर, स्वाति दास, दिशिता और दीपक डोबरियाल

निर्देशक : साकेत चौधरी

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