राजा भैया के लिए कुंडा से लखनऊ दूर है...

राजा भैया भाजपा से कोई गेम खेलने की तैयारी कर रहे हैं। अंततः यह सब भाजपा में समाहित हो जाएंगे। यह सौदेबाजी की फ्रेंडली फाइट है।...

राजा भैया के लिए कुंडा से लखनऊ दूर है...

हरे राम मिश्र

एक खबर के मुताबिक उत्तर प्रदेश के कुंडा विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ #राजा_भइया ने नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया है।

हिन्दुस्तान अखबार लिखता है कि राजा भइया की पार्टी का मुख्य एजेंडा प्रमोशन में आरक्षण (Reservation in promotion) के वर्तमान स्वरूप का विरोध और एससी/एसटी एक्ट में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फ़ैसले के बाद मोदी सरकार द्वारा संसद से उस फैसले को निष्प्रभावी किए जाने का विरोध है।

अख़बार के मुताबिक फ़िलहाल राजा भैया की पार्टी इन्हीं दो मुद्दों पर फोकस करेगी।

राजा भइया के इस वक्तव्य के बाद, जहां तक मैं समझ पा रहा हूं- उनकी पार्टी भारत में आर्थिक नीतियों, संकटग्रस्त खेती, सांप्रदायिक फासीवाद, बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण और कई ऐसे मुद्दों पर अभी कोई ठोस राय नहीं रखती है। या फिर वह इन मुद्दों पर कुछ बोलना नहीं चाहते।

उपरोक्त दो मुद्दे, जिन पर अमूमन सवर्ण ही सवाल उठाते हैं। राजा भइया की पार्टी भी उन्हीं पर फ़ोकस कर रही है। हालांकि व्यावहारिक स्तर पर इन दो मुद्दों पर कोई निर्णायक जनमत नहीं बनता।

दरअसल यह भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश भर है। क्योंकि इन दो मुद्दों पर केवल और केवल सवर्ण समुदाय ही हंगामा करता रहता है। यह भाजपा से असंतुष्ट सवर्णों को अपनी ओर खींचने की एक कोशिश भर है।

राजा भैया की पूरी कोशिश है कि इन दो सवालों पर वह भाजपा से सवर्ण समुदाय को बाहर कर पाएं, ताकि इस समुदाय का रहनुमा होने के नाम पर भाजपा से सौदेबाजी की जा सके।

लेकिन राजा भैया की समस्या यह है कि उनकी छवि बहुत सीमित दायरे में है। वह प्रदेश स्तर पर कोई बहुत गहरा नुकसान कर पाएंगे बहुत मुश्किल है। इस संदेह की सबसे बड़ी वजह यह है कि सवर्णों के कई क्षत्रप, जो विभिन्न पार्टियों में थे, आज भाजपा में ही डेरा डाले हुए हैं। इनका अपने इलाके में बहुत प्रभाव है और वहां नए सिरे से जमीन तैयार करना राजा भइया के लिए बहुत मुश्किल काम है।

भाजपा यह जानती है कि उसके लिए ब्राह्मण कभी किंग नहीं हो सकता, वह किंग मेकिंग में मददगार हो सकता है। आज भाजपा के पास ठोस वोटर के रूप में यूपी के पिछड़े और दलित सबसे मजबूत स्तंभ हैं।

और जैसा मैं समझ पा रहा हूं कि इन मुद्दों के साथ राजा भैया भाजपा से कोई गेम खेलने की तैयारी कर रहे हैं।

लगता है, अंततः यह सब भाजपा में समाहित हो जाएंगे। यह सौदेबाजी की फ्रेंडली फाइट है

(हरे राम मिश्रा, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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