आईएस की कथित ‘किल लिस्ट’ कैसे हुई मीडिया में लीक, जवाब दे एनआईए- रिहाई मंच

एनआईए बन गई है हिंदुत्ववादी आरोपियों को बचाने वाली एजेंसी आतंक के मुस्लिम आरोपियों को जज छोड़ते हैं, हिंदुत्ववादी आरोपियों को एनआईए छुड़वाती है...

हाइलाइट्स
  • एनआईए बन गई है हिंदुत्ववादी आरोपियों को बचाने वाली एजेंसी
  • आतंक के मुस्लिम आरोपियों को जज छोड़ते हैं, हिंदुत्ववादी आरोपियों को एनआईए छुड़वाती है

 

लखनऊ 9 फरवरी 2017। रिहाई मंच ने एनआईए द्वारा आतंकी संगठन आईएस के कथित ‘किल लिस्ट’ के मीडिया में आने पर सवाल उठाया है।

मंच ने कहा कि खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के साथ काम करने वाले हैकरों की कथित हत्या वाली लिस्ट का मीडिया में आना साबित करता है कि एजेंसियां आतंकवाद से लड़ने से ज्यादा उसका प्रोपागंडा करने में दिलचस्पी रखती हैं।

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि आईएस की कथित ‘किल लिस्ट’ का मीडिया में आने पर एनआईए खुद कटघरे में खड़ी हो जाती है। क्योंकि ऐसी लिस्ट में जिन लोगों के नाम शामिल बताए जा रहे हैं, उनकी सुरक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए थी न कि उस लिस्ट से जुड़ी अपुष्ट खबर को चुनिंदा अखबार के माध्यम से प्रसारित कर एक पूरे समुदाय को बदनाम करना होना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि खबर को जिस तरह कथित सूत्रों के हवाले से प्रसारित करवाया गया, उससे यह संदेह मजबूत होता है कि एजेंसी ने आतंकवाद का हौव्वा खड़ा करने के राजनीतिक उद्देश्य से खबर चलवाई है जिसके कारण खबर की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठ जाते हैं।

शाहनवाज आलम ने कहा कि खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यपद्धति रही है कि वो आतंकवाद के नाम पर पहले एक जनमत मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मीडिया की अपुष्ट खबरों द्वारा बनाती हैं। मडिया में आई इस कथित ‘किल लिस्ट’ से यह साबित होता है कि एनआईए को लेकर जो एक आम धारणा बन चुकी है कि वह आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह पढ़े लिखे खास तौर पर तकनीकी तौर पर दक्ष मुस्लिम नौजवानों को फंसाती है, को बदलने की रणनीति के तहत तकनीकी तौर पर दक्ष बहुसंख्यक समुदाय के युवकों को आईएस की हिट लिस्ट में दिखाना चाहती है। ताकि वह समाज में इस भ्रम को फैला सके कि आईएस के नाम मुस्लिम समुदाय हिंदू समाज पर हमलावर है।

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने सुनील जोशी हत्या कांड के आरोप से बरी की गईं साध्वी प्रज्ञा के मामले में फैसले के खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा अपील करने से पीछे हटने को कानून का मजाक कहा है।

उन्होंने कहा कि जब खुद फैसले में इस बात को कहा गया है कि जांच एजेंसियों ने जानबूझकर कमजोर और अन्र्तविरोधी सुबूत रखे ताकि मुकदमा कमजोर हो जाए तब कानून का तकाजा यही था कि इस पूरे मामले की दोबारा जांच कराई जाती।

उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करते हैं बल्कि जांच एजेंसियों के सांप्रदायिक चरित्र को उजागर करते हैं जिसके खिलाफ खुद सुप्रिम कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि एक तरफ एनआईए आतंक के आरोपों में मुस्लिम बेगुनाहों को फंसाने के लिए काल्पनिक तथ्य गढ़कर उनका जीवन नष्ट कर देती है जो अंत में अदालतों द्वारा बरी किए जाते हैं। लेकिन संघ परिवार से जुड़े हिन्दुत्वादी आतंकियों के मामले में एनआईए अधिकारी कभी लोक अभियोजक रोहनी सैलियन पर खुद केस कमजोर करने का दबाव डालते हैं तो कभी सारे गवाहों को खुद होस्टाइल करवा देते हैं और खुद इतनी कमजोर पैरवी करती हैं कि जज को भी अपने फैसले में इस पर टिप्पड़ी करना पड़ जाता है। राजीव यादव ने आरोप लगाया कि एक तरफ तो अशफाक मजीद जैसे मुस्लिम युवक को रेडिकलाइज करने के आरोप में तीन मुस्लिम युवकों रिजवान खान, मोहम्मद हनीफ और अरशी कुरैशी पर मुकदमा इस आधार पर लाद दिया है कि वो लोग उसे आईएस से जुड़ी वीडियो दिखाते थे। तो दूसरी तरफ साध्वी प्रज्ञा से जुड़ा मामला है जिनकी तस्वीर खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ है लेकिन एनआईए ने इन दोनों नेताओं से आज तक कोई पूछ-ताछ तक नहीं की है उन्हें आरोपी बनाना तो दूर।

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