करोड़ों छोटे व्यापारियों पर कॉर्पोरेटीकरण का संकट

सरकार स्थानीय छोटे व्यापारियों को खत्मकर करोड़ों लोगों के हाथो का व्यापार चंद कॉर्पोरेट के हाथों में देना चाहती है। एक तरह से, भारत में भी वैश्य समाज की आखिरी पीढ़ी धंधा कर रही है।...

 

अनुराग मोदी

असल में नोटबंदी और जी एस टी, जिसे कालाधन और टैक्स चोरी रोकने वाला आर्थिक सुधार बताया जा रहा है, वो मोदी सरकार के कॉर्पोरेटीकरण के एजेंडे का हिस्सा है। इसके पहले रिटेल और अनेक क्षेत्रों में 100% एफ डी आई की मंजूरी दी। सरकार स्थानीय छोटे व्यापारियों को खत्मकर करोड़ों लोगों के हाथो का व्यापार चंद कॉर्पोरेट के हाथों में देना चाहती है। एक तरह से, भारत में भी वैश्य समाज की आखिरी पीढ़ी धंदा कर रही है।

टैक्स और व्यापार के कड़े नियम की कानूनी लड़ाई की झंझटो में फंसकर अमेरिका और यूरोप में छोटे व्यापारी कॉर्पोरेट के सामने टिक नहीं पाए; लगता है, अमेरिका में 1950 में 27% लोग अपने धंदे में लगे थे, जो 2013 में मात्र 7% बचे। 2015 के आंकड़ों के अनुसार, वहां हर साल जितने नए व्यापार खुलते हैं, उसकी अपेक्षा 70 हजार ज्यादा बंद होते है। जिस तरह सरकार भारत जैसे देश में डिजिटल पेमेंट की अव्यवहारिकता और जी एस टी की पेचीदगीयों को नजरंदाज कर उसके गुणगान में लगी है, उससे लगता है: भारत में भी छोटे व्यापारी खत्म हो जाएंगे।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 22 जुलाई, शनिवार के दिन दिल्ली इकॉनोमिक कॉन्क्लेव में बोलते हुए कहा: नोटबंदी और जी एस टी के बाद नगद में धंदा करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इन दोनों फैसलों से यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि नगद में व्यापार करने से कालाधन पैदा होता है और अब तक के कर प्रावधानों से कर की चोरी होती थी। मतलब - व्यापारी अब-तक कालाधन पैदा करने और कर चोरी में लगे थे।

लेकिन इस नोटबंदी से देश के व्यापार की हालात अचानक शरीर से सारा खून चूसने वाले मरीज जैसी जरुर हो गई है - स्माल स्केल इंडस्ट्रीज में 15-20% जॉब चले गए। अन्य सेक्टर पर भी इसकी मार पड़ रही है। वहीं जी एस टी से जो एक्सपोर्ट बढ़ने की बात हो रही थी; वो भी अभी तो उसके उल्ट समझ आ रहा है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाईजेशन ने सरकार से कहा कि टैक्स में ६0 दिन की उनकी पूंजी फंसने से भारतीय एक्सपोर्ट 2% महंगा हो गया है, जिससे वो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पाएंगे।वहीं स्माल स्केल मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. ई. रघुनाथन का कहना है कि जी एस टी में टैक्स इनपुट मिलने में 120 से 140 दिन लगेंगे जिससे लागत पूंजी लगभग 18% के आसपास बढ़ने से खर्चे बढ़ेंगे। कपड़ा व्यापारी अलग हड़ताल पर है।

नोटबंदी और जी एस टी जैसे फैसले लागू करने के पहले सरकार ने इस बात का कोई अध्ययन नहीं किया कि इसका करोड़ों स्थानीय व्यापरियों पर क्या विपरीत असर पड़ेगा?

हम यह नहीं कह रहे कि सरकार नए नियम कानून ना बनाए और टैक्स वसूली ना बढाएं। सरकार व्यापार व्यवस्था में जरुरी सुधार लाएं और देश के विकास के लिए टैक्स वसूली भी बढाए – यह अच्छी बात है। लेकिन, ऐसा था तो 2016-17 के केन्द्रीय बजट में कंपनीयो को 6 लाख 11 हजार करोड़ से ज्यादा की राजस्व कर वसूली में छूट क्यों दी गई? – जो हमारे कुल बजट का एक तिहाई हिस्सा है। दूसरा, एक तरफ बड़े-बड़े व्यापारिक घरानों को छूट और खुदरा व्यापारियों को डंडा यह क्यों हो रहा है? बैंकों का पैसा चुकाए बिना माल्या देश से भाग गए, अडानी ग्रुप पर 72 हजार करोड़ रुपए का ॠण है; कुल 44 कॉर्पोरेट घरानों पर 4 लाख 26 हजार 4 सौ करोड़ का बकाया सरकार बट्टे खाते में डाल चुकी है। वहीं छोटे-छोटे व्यापारियों से लोन वसूली के लिए उनकी निजी सम्पती तक नीलाम कर दी जाती है।

व्यापारी बनाम कॉर्पोरेट

भारत में व्यापार का अपना तरीका लम्बे समय से चला आ रहा है, इसलिए बिना किसी औपचारिक व्यावसायिक शिक्षा के इतने करोड़ों लोग व्यापार में लगे हैं; यहाँ पांचवी पास भी आराम से व्यापार कर लेता है।

भारत सरकार की संस्था, नेशनल सैंपल सर्वे की हालिया रिपोर्ट के अनुसार: भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में 6 करोड़ तीस लाख प्रतिष्ठान हैं; इसमें 84% में परिवार के सदस्य ही काम करते हैं, और जिसमें 11 करोड़ लोग काम में लगे है; यह 11 लाख 50 हजार करोड़ का उत्पादन करते है। इन्हें कॉर्पोरेट के तरह टैक्स में छूट या बैंक लोन जैसी कोई सुविधा भी नहीं मिलती है। इसमें से 3६%, याने दो करोड़ 2६ लाख दुकाने है। स्वभाविक है, यह नगद में काम करते होंगे। इस सारे व्यापार को कॉर्पोरेट कब्जे में करने के लिए जरुरी था कि अब-तक प्रचलित व्यापार के तरीके पर सवालिया निशान लगाया जाए; और कानूनी रोक भी लगाईं जाए। पहले नोटबंदी और अब जी एस टी ने यह काम कर दिया है।

देशी-विदेशी बड़े कॉर्पोरेट यह चाहते हैं कि अमेरिका और यूरोप की तर्ज पर भारत में भी व्यापार हो। अमेरिका और यूरोप में पहले भारत की तरह स्थानीय व्यापारी होते थे, जो व्यापार करते थे और किसान खेती। मगर धीरे-धीरे वहां चंद बड़े कॉर्पोरेट के हाथों में सारा व्यापार चला गया; वहां की जनता की पूरी जिन्दगी वो नियंत्रित करते हैं। वहां जनता वही खाती और पहनती है, जो यह कंपनिया बनाती है। यहाँ तक वहां की खेती भी काफी हद-तक चंद बड़े कारपोरेशन के हाथों में है। यूरोप में भी कमीबेशी यही हाल है।

असल में डिजिटल पेमेंट और जी एस टी यह दोनों ही मल्टीनेशनल कंपनी के व्यापार को आसान बनाएंगे; वो इसी का इन्तजार कर रहे थे। इसलिए, 1 जुलाई को जी एस टी लागू होते ही, 9 जुलाई को केंद्र सरकार ने अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी अमेज़ान को फ़ूड रिटेल में 100% विदेशी पूंजी लगाने 3200 करोड़ के प्रस्ताव को मंजूरी दी; और महाराष्ट्र सरकार ने अमेरिकी वाल्ल्मार्ट को 15 होलसेल स्टोर खोलने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इतना ही नहीं, 14 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अध्यक्षता में हुई बैठक में एफ डी आई नीति की समीक्षा की गई, जिसमें: मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफ डी आई 51% से बढ़ाकर 100% करने की बात है; वहीं, सिंगल ब्रांड में इसके 100% को आटोमेटिक रूट में डालने के बात है, अभी 49% से उपर सरकार की मंजूरी लगती है। निर्माण के क्षेत्र में अविकसित प्लाट में भी 100% एफ डी आई को अनुमति देने और प्रिंट मीडिया में इसे और उदार बनाने के प्रस्ताव जल्द पारित करने की बात भी इस मीटिंग में हुई है।

मोदी सरकार पहले ही खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के फैसले ले लिए थे: ‘ई कॉमर्स’ में और फ़ूड प्रोसेसिंग के व्यापार में 100% सीधे विदेशी निवेश की छूट। वही बिहार चुनाव के परिणामों के शोरगुल के बीच, 12 नवम्बर 15 को: सैन्य समान, भवन निर्माण जैसे 15 क्षेत्रों में 49% सीधे विदेशी निवेश की छूट के साथ- साथ, निजी बैंकों के लिए इस छूट को 75% कर दिया गया। इन फैसलों से खुदरा व्यापार के साथ-साथ बैंको की पूंजी पर भी विदेशी पूंजी का कब्जा हो जाएगा।   

फ़ूड प्रोसेसिंग का धंधा लगभग 7 से 8 लाख करोड़ का है। वहीं, ई-कॉमर्स का धंधा, जो 2009 में 23 हजार करोड़ रुपए का था, वो 2016 में 2 लाख 35 हजार करोड़ रुपए तक जा पहुंचा है – 2020 तक, इसके 6 लाख करोड़ रुपए से उपर पहुचने की उम्मीद है। सोने के आभूषणों के कुल 2.5 लाख करोड़ रुपए के धंदे में से अभी 36 हजार करोड़ ई-कॉमर्स के जरिए होता है – जो कुछ सालों में 1.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच जाएगा।वैसे भी, 2008 में, देश में खुदरा ज्वैलरी का 10% व्यापार संगठित क्षेत्र में था; जो पहले ही सरकार की नीतियों के चलते 2014 में बढ़कर 22% हो गया है।

चीन की अलीबाबा अमेरिका की अमेज़ान यह कुछ नहीं बनाती, लेकिन यह सबसे बड़ी खुदरा व्यापार करने वाली कंपनियां हैं। अकेले अलीबाबा ई-कॉमर्स कंपनी की वेबसाइट पर 12 लाख विक्रेता रजिस्टर्ड हैं। वही वालमार्ट दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल स्टोर की श्रंखला है – अकेले अमेरिका में 21.5% खुदरा व्यापार पर उसका कब्जा है। खुदरा व्यापरियों पर शिंकजा और विदेशी पूंजी को 100% छूट से देश में हर तरह के खुदरा व्यापार पर एक बड़ा संकट आ जाएगा।

कालाधन और कर चोरी

नोटबंदी के दौरान किए गए सारे दावे खोकले साबित हुए; इस सारी कयावाद के बाद कितना धन बैंकों में आया यह रिज़र्व बैंक के गवर्नर संसदीय समीति को अभी-तक नहीं बता पाए। इसमें कालाधन कितना है, यह बताना तो दूर की बात है।

अन्तर्राष्ट्रीय संस्था, ग्लोबल फाइनेंसियल इंट्रीगिटी की 2008 की भारत के कालेधन पर एक रिपोर्ट के अनुसार 72% कालाधन विदेश में है; सिर्फ 28% भारत में है, इसमें भी कितना नगदी यह एक बड़ा सवाल है। संस्था का कहना है: यह जो कालाधन विदेश जाता है, उसका एक सीधा तरीका है - वहां से आयात किए जाने वाली वस्तु की ओवर इन्वोसिंग। इस बारे में सरकार ने अभी-तक कुछ नहीं किया है। उल्टा डायरेक्टर ऑफ रेवन्यू इंटेलीजेन्स देश की पॉवर कंपनी पर कोयले के आयात में ओवर इन्वोसिंग के जरिए जो 29 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाया है उसमें कुछ नहीं किया। इसके आलावा सरकार ने वित्त मंत्रालय की 2013 की एक रिपोर्ट में यह बताया है कि कैसे डायमंड के धंदे में काले पैसे को सफ़ेद बनाने और आतंकवाद को फंड करने का काम हो रहा है; इस रिपोर्ट पर भी कोई कार्यवाही नहीं की।

नगदी भुगतान से कालाधन पैदा होता है और ऑनलाइन या बैंकिंग भुगतान से नहीं, ऐसा कोई ठोस प्रमाण ना तो अब-तक भारत में मिला है, और ना ही दुनिया की किसी और अर्थव्यवस्था में। अगर हम अमेरिका के हालात देखे, तो वहां हाल ही मैं राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रम्प पर 1995 में गलत तरीके से 6 हजार करोड़ का घाटा दिखा पिछले 20 सालों से कोई टैक्स नहीं भरने का आरोप है। अमेरिका के आन्तरिक राजस्व विभाग की रिपोर्ट के अनुसार वहां हर साल 30 लाख करोड़ रुपए की कर चोरी होती है। अमेरिका और यूरोपियन युनियन में कर चोरी का आरोप एप्पल से रूपए लेकर गूगल तक सभी बड़े कॉर्पोरेट पर है। वालमार्ट का मालिक - दुनिया का तीसरा सबसे धनी व्यक्ति, बारेन बफेट सालाना सिर्फ 12 करोड़ रुपए व्यक्तिगत कर भरता है।

वहीं जी एस टी में भी सवाल टैक्स की दर बढ़ने या घटने का का नहीं है। वो तो होता रहता है और कर तो जनता को देना है; चाहे जो दर हो। लेकिन, इसमें एक तो छोटे व्यापरियों को माल महंगा मिलेगा। दूसरा, व्यापार उलझन भरा बन जाएगा: जी एस टी में हर बात के लिए बड़ी लम्बी  कागजी कार्यवाही और वो भी ऑनलाइन करना है; इससे ओवरहेड बढ़ जाएंगे, गलती होने पर जुर्माने और सजा का डर अलग। सरकार भले ही कहे कि वो इंस्पेक्टर राज खत्म कर रही है; लेकिन ऑनलाइन निगरानी के आलावा, आने वाले समय में केंद्र सरकार जो 2 लाख लोगों की भर्ती करने वाली है, उसमें 75 हजार की भर्ती टेक्स विभाग में होगी।। इस सबके चलते धीरे-धीरे आम-व्यापारी के लिए व्यापार घाटे का सौदा बन जाएगा।

आगे का रास्ता

इस बात में कोई शक नहीं है कि भारत में आर्थिक सुधार अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के इशारे पर लाए जा रहे है। आज हम चाइना के माल का रोना रो रहे है, लेकिन जब 25 से 30 दिसम्बर 1999 के दरम्यान पूरे देश का ध्यान कंधार हवाई-जहाज आपरहण में उलझा था, तब अटल बिहारी बाजपेयीजी की सरकार ने अमेरिका के दबाव में 28 दिसम्बर 1999 को एक समझौता किया था। जिसके अनुसार: भारत को 1 अप्रैल 2000 तक 714 वस्तुओं और 1 अप्रेल 2001 तक 2015 तक 715 वस्तुओं से ‘मात्रात्मक’ प्रतिबन्ध हटाना था; इस निर्णय के बाद से, लिस्ट में दिए गए 1429 उत्पाद आसानी से कितनी भी मात्रा में भारत में आयात किया जा सकता था। इस फैसले से देश के छोटे-छोटे उत्पादक खत्म हो गए – देश चीन के माल से पट गया। खुदरा व्यापारियों को इससे फर्क नहीं पड़ा- उन्होंने देशी की जगह चाईना का माल बेचा। लेकिन, अब मार खुदरा व्यापारियों पर पड़ने वाली है।

 एफ डी. आई, डिजीटल पेमेंट और जी एस टी उसी सुधार का हिस्सा है। नोटबंदी और जी एस टी से जहाँ भारतीय व्यापार के चलते चक्के को अचानक जाम कर दिया है; वहीं, देशी कॉर्पोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के व्यापार को सुगम और भारतीय व्यापरियों की तुलना में प्रतिस्पर्धा में बेहतर बनाया है। और आर्थिक सुधार की जोर मार अभी-तक किसान झेल रहे थे, उसकी मार अब व्यापरियों पर पड़ने वाली है; व्यापार कॉर्पोरेट हाथों में जाने का खतरा पैदा हो गया है।

अगर हमें व्यापार में आ रहे इन आर्थिक सुधारों के प्रभाव को समझना है तो किसानों के हालात पर नजर डालें। हमें समझ आएगा कि 1990 के दशक में आर्थिक सुधार के नाम पर जो नीतिगत बदलाव किए गए उसके बाद से अब-तक तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुए है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह हो सकता है , यह कल्पना किस ने की थी। इन आर्थिक सुधारों के 20 साल बाद, आज पूरे देश में किसानों का गुस्सा फूटा हुआ है। फसल की कीमतों और लोन माफी के लिए आन्दोलन हो रहे है – किसान गहरे कर्जे में है। उसकी खेती कॉर्पोरेट हाथों में जाने का खतरा पैदा हो गया है।

व्यापारी अभी-तक इस मुगालते में रहा कि भाजपा उसकी अपनी पार्टी है। और इस बात में कोई दो राय नहीं है कि देश का वैश्य समाज गौ-रक्षा से लेकर विश्व हिन्दू परिषद, संघ परिवार तथा भाजप के हिन्दू धर्म को बढ़ावा देने के कार्यक्रम की आर्थिक रीढ़ की हड्डी रहा है। वो इस भ्रम में रहा कि वो धर्म की रक्षा में साथ है। लेकिन, हिन्दू धर्म को बढाने और उसके प्रचार प्रसार का यह कार्यक्रम धीरे-धीरे राजनीति का खेल बन गया और इस पर साम्प्रदायिक का रंग चढ़ गया; धीरे-धीरे गौ रक्षा, मानव हत्या में बदल गई। वहीं, साम्प्रदायिकता की इस धुंध के पीछे देश के करोड़ों व्यापारियों को मिटाकर देश की अर्थ-व्यवस्था के कॉर्पोरेटीकरण की वैसी साजिश चल पड़ी; जैसे कृत्रिम धुंए की दीवार खडी कर उसके पीछे से दुश्मन सेना हमला करती है।

मैं पैदाईश से वैश्य हूँ, मगर कर्म से समाजवादी सोच का राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्त्ता होने के नाते पिछले 30 सालों से पूंजीवाद के खिलाफ मेहनतकशो की लड़ाई का सक्रिय हिस्सा रहा हूँ। और देश में समाजवाद आए इसका घोर पक्षधर हूँ। लेकिन, आज जब देश पर कॉर्पोरेटीकरण का संकट अपने चरम पर है और वो अलग-अलग सबको निगल रहा है। तब मुझे लगता है कि वैश्य समाज और मेंहनतकशों -किसानो, मजदूरों को साथ आना होगा। और अपनी-अपनी पार्टी पर दबाव बनाना होगा, जिससे से इन आर्थिक सुधारों को और तेजी से लागू करने की बजाए, उसपर पुनर्विचार हो। और आर्थिक सुधार का एजेंडा जनता तय करे। वर्ना कॉर्पोरेटीकरण का यह दैत्य सबको नील जाएगा।

अनुराग मोदी , समाजवादी जन परिषद 

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