ओशो से अमरीकी जीवनशैली और ईसाइयत को खतरा नज़र आने लगा था

आधुनिक भगवानों में रजनीश को जैसी सफलता मिली, वह किसी और को नसीब नहीं हुई. दुनिया भर में ख़ुद को रजनीशी कहने वाले लाखों लोग आज भी हैं....

अतिथि लेखक
ओशो से अमरीकी जीवनशैली और ईसाइयत को खतरा नज़र आने लगा था

आशुतोष कुमार

वाइल्ड वाइल्ड कंट्री एक दिलचस्प द्स्तामाला मने डौक्यूसीरीज़ है. यह श्री रजनीश के भगवान और फिर ओशो बनने की कहानी तो है ही, अमरीका के ओरगन में रजनीशपुरम के बनने और उजड़ने की त्रासद कहानी भी है.

नेटफ्लिक्स पर इसे देखकर आप रजनीश के प्रति पहले से अधिक उदार और सहानुभूतिशील भी हो सकते हैं. मां आनंद शीला आप को रजनीश से भी अधिक प्रभावित करेंगी. भले ही अपने ख्यालों के लिए नहीं, अपनी शख्सियत के लिए .

अमरीका की आधुनिकता, लोकतंत्र और संविधानवाद के कारण श्री रजनीश ने वहाँ अपना सिंहलद्वीप बनाने की कोशिश की और क़ामयाब भी हुए. उजाड़ को ज़न्नत में बदलने का यह प्रयोग मनुष्यता के इतिहास में अनोखा है.

लेकिन रजनीश की असली दिक्कत वही थी, जो सभी भाववादी स्वप्नदर्शियों की होती है. वे दुनिया के नरक के बीचोबीच अपना एक छोटा-सा प्राइवेट स्वर्ग बना लेने के सपने देखते हैं. वे सभी यही उपदेश देते हैं कि अपने आप को बदलो, जागृत करो. दुनिया को बदलना होगा तो इसी से बदलेगी. दुनिया को बदलने चलोगे तो कहीं के नहीं रहोगे.

लेकिन आप भले ही दुनिया को उसके हाल पे छोड़ दें, दुनिया तो नहीं छोड़ेगी. रजनीशपुरम के साथ भी वही हुआ.

और उठ खड़ी हुईं  हिंसा की 'दैवी' शक्तियां

ओरगन के पुराने वासियों और समूचे अमरीकी भद्रलोक को रजनीशियों का उन्मुक्त, अनुरागमय , आनन्दमय जीवन बर्दाश्त नहीं हुआ. उन्हें लगा कि केवल ओरगन की पुरानी रूढ़िवादी संस्कृति ही नहीं, समूची अमरीकी जीवनशैली और ईसाइयत खतरे में है. यानी अमरीका हरियाने के किसी खाप से बेहतर साबित नहीं हुआ.

वे निहायत कानूनी तरीके से अपने ही संविधान की हत्या करने में जुट गए. रजनीशपुरम का आनन्दलोक खंडित हो गया. लालच, सत्ता, अहंकार , भय, षड्यंत्र और हिंसा की 'दैवी' शक्तियां उठ खडी हुई. वे अंततः श्री रजनीश की जान लेने में सफल हो गयीं.

कबीर और ओशो की समाधि का अंतर

'सम्भोग से समाधि तक' मैंने तब पढी थी, जब मैं 'ग्यारहवीं ए' का लडका हुआ करता था. बेशक इसके कई हिस्सों से प्रभावित हुआ था.

ख़ास तौर पर सेक्स को वर्चस्वी नैतिकता के जंजाल से मुक्त करने और शुद्ध जैविक-आस्तित्विक-मनोवैज्ञानिक ऊर्जा के रूप में उसका जश्न मनाने की दृष्टि के कारण.

लेकिन फिर उसे समाधि के चक्कर में लपेटने वाला टोटका मुझे तब भी समझ नहीं आया था, आज भी नहीं आता.

समाधि के लिए तरह तरह की क्रियाएं, साधनाएं और पद्धतियाँ सभ्यता के बीमारों की थेरेपी तो हो सकती है, उसका सत्य या अध्यात्म से क्या सम्बन्ध ? कबीर जिस सहज समाधि की बात करते थे, वह तो घर बैठे चरखा चलाते भी मुमकिन है और प्रणय करते भी.

लेकिन यह भी सच है कि इस घालमेल के बावजूद रजनीश के प्रवचनों में कई बार बहुत काम की चीजें और अंतरदृष्टियाँ मिल जाती हैं. बशर्ते आपको घास से फूस को अलग करने की कला आती हो.

आधुनिक भगवानों में रजनीश को जैसी सफलता मिली, वह किसी और को नसीब नहीं हुई. दुनिया भर में ख़ुद को रजनीशी कहने वाले लाखों लोग आज भी हैं.

(आशुतोष कुमार, लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। वे जन संस्कृति मंच से जुड़े हुए हैं।)

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