साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब : मैनेजर पांडेय

कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है। इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब होता है...

हाइलाइट्स

हमारे भीतर बलात्कार के अपराधी के प्रति जो घृणा का भाव रहता है, वहीं घरेलू हिंसा जैसे अपराधों के लिए भी होना चाहिए। शरीर के साथ होने वाले अपराध को तो हम देखते हैं लेकिन मन के साथ होने वाले अपराध को हम नजरअंदाज कर देते हैं। औरत को औरत बनाए रखने के लिए जो किया जाता है, वह अपने आप में भयावह है।

प्रयास संस्थान की ओर से सूचना केंद्र में हुआ पुरस्कार समारोह, पद्मजा शर्मा, गंगासहाय मीणा, दीप्ता भोग व पूर्वा भारद्वाज हुए सम्मानित, शीबा असलम फहमी, डॉ. घासीराम वर्मा ने की समारोह में की शिरकत

चूरू। प्रयास संस्थान की ओर से शनिवार 30 सितंबर को शहर के सूचना केंद्र में हुए पुरस्कार समारोह में जोधपुर की लेखिका पद्मजा शर्मा को उनकी पुस्तक ‘हंसो ना तारा’ के लिए इक्यावन हजार रुपए का घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार एवं गांव सेवा, सवाई माधोपुर के लेखक गंगा सहाय मीणा को उनकी पुस्तक ‘आदिवासी साहित्य की भूमिका’ के लिए ग्यारह हजार रुपए का रूकमणी वर्मा युवा साहित्यकार पुरस्कार प्रदान किया गया। इस दौरान ‘भय नाहीं खेद नाहीं' पुस्तक के लिए नई दिल्ली की दीप्ता भोग व पूर्वा भारद्वाज को संयुक्त रूप से पचास हजार रुपए का विशेष घासीराम वर्मा सम्मान प्रदान किया गया।

देश के प्रख्यात गणितज्ञ डॉ. घासीराम वर्मा की अध्यक्षता में हुए समारोह को संबोधित करते हुए नामचीन आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है। इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब होता है।

पांडेय ने कहा कि मातृभाषा ने ही तुलसी, सूर, मीरा और विद्यापति को महाकवि बनाया। इसलिए मातृभाषाओं के लिए संकट के इस समय में हमें मातृभाषाओं में सृजन करना चाहिए। बेहतर बात है कि राजस्थान में असंख्य लेखक हैं जो हिंदी के साथ-साथ मातृभाषा राजस्थानी में लिख रहे हैं। उन्होंने विजयदान देथा का स्मरण करते हुए कहा कि भाषा को जानना अपने अस्तित्व को जानना है।

उन्होंने कहा कि आज के समय में जबकि दूसरे लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए लड़ रहे हैं, आदिवासी अपने अस्तित्व के लिए, अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने ‘ग्रीन हंट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिटिश भारत में आदिवासियों के साथ जैसा व्यवहार होता था, वैसा ही आजाद भारत में उनके साथ बर्ताव किया जा रहा है। पंडिता रमाबाई को याद करने एक पुराने संघर्ष को याद करना है और यह स्त्री को यह याद दिलाना है कि वह किसी भी संघर्ष में अकेली नहीं है।

उन्होंने कहा कि साहस के साथ अपनी बात कहने से आलोचना में जान आती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य एक भाषिक प्राणी है और भाषा से ही परिवार व समाज की रचना होती है।

मुख्य वक्ता नारीवादी चिंतक शीबा असलम फहमी ने कहा कि कानून ने स्त्री को बराबरी का अधिकार दिया है, लेकिन समाज अपने अंदर से इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हम कितनी भी तरक्की कर जाएं लेकिन यदि उपेक्षितों और वंचितों को बराबरी का अधिकार नहीं दे पाएं और यह तरक्की चंद लोगों तक ही सीमित रहती है तो इसका कोई अर्थ नहीं है।

उन्होंने कहा कि हमारे भीतर बलात्कार के अपराधी के प्रति जो घृणा का भाव रहता है, वहीं घरेलू हिंसा जैसे अपराधों के लिए भी होना चाहिए। शरीर के साथ होने वाले अपराध को तो हम देखते हैं लेकिन मन के साथ होने वाले अपराध को हम नजरअंदाज कर देते हैं। औरत को औरत बनाए रखने के लिए जो किया जाता है, वह अपने आप में भयावह है। हमें अपने घर में एक मजबूत बेटी तैयार करनी चाहिए और उसे संपत्ति का अधिकार आगे बढकर देना चाहिए।

पुरस्कार से अभिभूत साहित्यकार पद्मजा शर्मा, दीप्ता भोग, पूर्वा भारद्वाज और गंगा सहाय मीणा ने अपनी सृजन प्रक्रिया, संघर्ष और अनुभवों को साझा किया। भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आभार उद्बोधन में आयोजकीय पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। संचालन कमल शर्मा ने किया।

इस दौरान मालचंद तिवाड़ी, नरेंद्र सैनी, रियाजत खान, रामेश्वर प्रजापति रामसरा, मीनाक्षी मीणा, दलीप सरावग, रघुनाथ खेमका, जमील चैहान, आरजेएस चंद्रशेखर पारीक, कुमार अजय, विकास मील, हेमंत सिहाग, आशीष दाधीच, राकेश बेनीवाल, अमित सैनी, रामनाथ कस्वां, शिवकुमार मधुप, बाबूलाल शर्मा, हरिसिंह सिरसला, राजकुमार लाटा, डॉ.. मूलचंद, मोहन सोनी चक्र, राजेंद्र मुसाफिर, सुनील शर्मा  सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद थे।

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