टोंटी विवाद के बीच : वो भी दिन थे जब अब्दुल गफूर रिक्शा पर बैठकर सीएम आवास खाली कर गए थे

भारतीय राजनीति का एक रूप यह भी है, जिसमें ईमानदारी, सादापन, बेबाकी का समावेश था। आज के राजनेताओं और राजनीति में इनकी बड़ी कमी लगती है।...

जयप्रकाश मिश्र : कितनी बदल गई सियासत

अखिलेश चंद्र

करीब तीन महीने पहले की बात है। आम के पेड़ों पर मंजर आने लगे थे। जंगल और पहाड़ के बीच से गाड़ी सरपट भाग रही थी। मैं नींद के झोंकों से जूझता हुआ एक-एक चीज को मन-मस्तिष्क में कैद कर लेना चाहता था। झारखंड के देवघर से निकलने के करीब दो घंटे बाद मैं बिहार के बांका जिले के गांव भितिया पहुंच चुका था। यहीं मुलाकात हुई एक पुराने राजनीतिज्ञ से। मेरे मित्र के परिचय कराने के बाद बातों का सिलसिला चल निकला। उनका शरीर भले ही कमजोर हो गया था, लेकिन याददाश्त की चमक ऐसी कि उसका कोई असर नहीं था। बिहार की राजनीति की 60-80 के दशक की कई बातें वह ऐसे बताते चले गए मानो वे आज या कल में हुई हों।

70 के दशक में कटोरिया विधानसभा से चुने गए जयप्रकाश मिश्र करीब 90 साल के हो चुके हैं। मेरी जब उनसे मुलाकात हुई थी तब कई राज्यों में राज्यसभा चुनावों को लेकर काफी गहमागहमी थी। बातों-बातों में राजनीति पर चर्चा होने लगी। अपने राजनीतिक जीवन को याद करते हुए उन्होंने कई किस्से सुनाए।

बात तब की है जब अब्दुल गफूर बिहार के मुख्यमंत्री थे। राज्यसभा के चुनाव होने वाले थे। उन्होंने बताया, ‘मेरे घर पर फोन आया कि फलां कैंडिडेट के पक्ष में आपको मतदान करना है। फोन बिहार कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सत्येंद्र नारायण सिन्हा (छोटे साहब) ने किया था, इसलिए मैं मना नहीं कर पाया। दूसरी बात यह भी थी कि मेरी उनसे खूब बनती थी। इसके एक-दो दिन बाद मेरे घर राज्यसभा के वही उम्मीदवार आए, जिन्हें वोट देने के लिए मुझे फोन किया गया था। थोड़ी देर इधर-उधर की बात हुई। उन्हें मैंने आश्वस्त किया कि मेरा वोट आपको ही जाएगा, निश्चिंत रहिए। इसके बाद वह जाने लगे। उससे पहले मेरे सामने टेबल पर एक अखबार के टुकड़े में लपेटी हुई कोई चीज उन्होंने रख दी। मैंने उनसे पूछा कि यह क्या है। उन्होंने थोड़ा सकुचाते हुए कहा कि इसमें 10 हजार रुपये हैं। उस वक्त 10 हजार बड़ी रकम थी। वह जाने के लिए खड़े हो गए थे। मैंने उन्हें बैठने के लिए कहा और सीधे छोटे साहब को फोन लगा दिया और कहा, देखिए अब मैं आपके कैंडिडेट को वोट नहीं दूंगा और उन्हें सारा वाकया बता दिया। राज्यसभा के उम्मीदवार अवाक मेरा मुंह ताकते रह गए। इसके बाद मैंने उन्हें जाने के लिए कह दिया।’

यह किस्सा बताते हुए उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।

एक दूसरा किस्सा उन्होंने अब्दुल गफूर के बारे में बताया। उस दिन जगन्नाथ मिश्र को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी। उधर जगन्नाथ मिश्र ने शपथ ली, इधर अब्दुल गफूर समारोह से निकल पड़े और रिक्शा लेकर अपने आवास के गेट पर पहुंच गए। उनका ड्राइवर देखता ही रह गया। आवास के अंदर भी वह नहीं गए और किसी को भेजकर अपना ब्रीफकेस मंगवाया और चल पड़े।

जयप्रकाश मिश्र की बताई एक और बात बड़ी ही रोचक है। वह उन दिनों अखबार में छपे दिग्विजय सिंह के लेखों से बड़े प्रभावित थे। उन्होंने बड़ी मुश्किल से पता लगाया कि यह दिग्विजय सिंह हैं कौन। पता चला कि दिग्विजय सिंह पटना के एक होटल में हैं। वह पहुंच गए मिलने। मुलाकात अच्छी रही। उन्होंने दिग्विजय सिंह को बांका से लोकसभा चुनाव लड़ने का न्योता दिया। इसके कुछ साल बाद दिग्विजय सिंह ने चुनाव लड़ा। इस बातचीत का जिक्र स्वर्गीय दिग्विजय सिंह ने बांका-भितिया रेल परियोजना के तहत भितिया में जंक्शन के शिलान्यास कार्यक्रम में हजारों लोगों के बीच मंच से किया था ।

भारतीय राजनीति का एक रूप यह भी है, जिसमें ईमानदारी, सादापन, बेबाकी का समावेश था। आज के राजनेताओं और राजनीति में इनकी बड़ी कमी लगती है।

-अखिलेश चंद्र

संप्रति-नवभारत टाइम्स

 

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