अलविदा भाई वैद्य  : संघर्ष जारी रहेगा

भाई बहुमुखी प्रतिभा के धनी और अध्ययनशील व्यक्ति थे. लेकिन उनकी शख्सियत मूलत: राजनीतिक थी. समाजवादी आंदोलन की कोख में पले भाई पर गाँधी के साथ फुले और आम्बेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव था....

प्रेम सिंह

       उनका पूरा नाम भालचंद्र भाई वैद्य था. लोग उन्हें भाई वैद्य के नाम से जानते और पुकारते थे. मैंने हमेशा उन्हें भाई कहा. हमारे गाँव में पिता को ज्यादातर भाई कह कर बुलाया जाता था. हम सब भाई-बहन भी अपने पिता को भाई कह कर बुलाते थे. पिता के निधन के बाद मैं भाई के व्यक्तिगत संपर्क में आया. सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना के पहले वे मुझे प्रोफेसर कह कर बुलाते थे और मैं उन्हें भाई. संबंध का एक अदृश्य सूत्र हम दोनों के बीच पहली बार मिलने पर ही जुड़ गया था!

      सोशलिस्ट पार्टी में सात साल साथ काम करने के दौरान पार्टी के नीतिगत मामलों में उन्होंने मेरी प्राय: हर बात का सम्मान किया. वे सभी नीतिगत फैसलों, प्रस्तावों, ज्ञापनों, प्रेस विज्ञप्तियों के विषय में राय पूछने पर सूत्र में संकेत कर देते थे. सरकार के किसी फैसले या किसी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटना-विशेष पर पार्टी का वक्तव्य भेजना हो या धरना-प्रदर्शन करना हो, वे पूना से फोन से एक निर्देशात्मक एसएमएस कर देते थे. भाई के पार्टी का अध्यक्ष रहते मैंने उनके साथ पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता की जिम्मेदारी निभाई थी. 

      इंडिया अगेंस्ट करप्सन (आईएसी) और आम आदमी पार्टी (आप) के खिलाफ मैंने भारत के संविधान और समाजवादी विचारधारा के आधार पर स्टैंड लिया तो भाई ने हमेशा कहा कि पार्टी मेरे पीछे मजबूती से खड़ी है. नवउदारवाद के निर्णायक बचाव में उठी उस आंधी में सोशलिस्ट पार्टी के एक भी सदस्य का विचलन नहीं हुआ, इसके पीछे भाई के व्यक्तित्व, समझदारी और वैचारिक दृढ़ता का बड़ा योगदान था.

      2 अप्रैल 2018 को भाई का निधन अग्नाशय के कैंसर से हो गया. उन्हें 26 मार्च को पूना हस्पताल में भर्ती कराया गया था. उसके करीब 20 दिन पहले ही उनकी बीमारी का पता चला था. हालाँकि मुझे इस बाबत उन्हें हस्पताल में भर्ती कराये जाने के बाद मालूम पड़ा. डॉ. अभिजीत वैद्य ने फोन पर बताया कि इस उम्र में ऑपरेशन या कीमोथेरेपी करना मुनासिब नहीं है. उन्होंने यह भी बताया कि भाई हस्पताल से घर आना चाहते हैं. लेकिन यह संभव नहीं हुआ और उन्होंने अंतिम सांस हस्पताल में ही ली. पूना और महारष्ट्र के साथी उनसे मिलने हस्पताल जाते रहे. हम बाहर के साथियों के लिए भाई की मृत्यु एक अचानक लगने वाला अघात था.

      भाई को अंतिम अलविदा कहने मैं 3 अप्रैल को पूना पहुंचा. उनका पार्थिव शरीर राष्ट्र सेवा दल (आरएसडी) के मुख्यालय साने गुरूजी स्मारक में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था. सुबह से दोपहर ढलने तक उन्हें अंतिम प्रणाम करने वालों का तांता लगा रहा. श्रद्धांजलि देने वालों में महिलाओं की बड़ी संख्या थी. राष्ट्र सेवा दल के सैनिक और सैनिकाएं पूरा दिन मुस्तैदी से सभी की सहायता और सहूलियत का काम करते रहे. 4 बजे पुलिस प्रशासन के लोग आ गए और भाई के पार्थिव शरीर को राष्ट्रीय ध्वज में लपेट दिया. शमशान स्थल पहुँचने पर पुलिस टीम ने बैंड-धुन बजाई और बंदूकों से फायर किये. तत्पश्चात पार्थिव शरीर को विद्युत् शवदाह गृह में ले जाया गया और अंत्येष्टि की गई. यह राजकीय सम्मान उन्हें महारष्ट्र का पूर्व गृह राज्यमंत्री (1978 -1980) और पूना का पूर्व महापौर (1974-75) होने के नाते दिया गया.

      मेरे लिए आश्चर्य यही था कि पिछले तीन दशक से सत्ता के गलियारों से दूर नवसाम्राज्यवादी गुलामी लाने वाली सरकारों के खिलाफ शहरों-देहातों में अनाम संघर्ष करने वाले नेता की अंतिम यात्रा में हज़ारों की संख्या लोग शामिल हुए! शवयात्रा में शामिल लोग करीब अढ़ाई किलोमीटर दूर स्थित शमशान स्थल तक पैदल चले. उनमें 'भाई वैद्य अमर रहें' 'भाई तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचाएंगे', 'लोकशाही समाजवाद - जिंदाबाद जिंदाबाद', 'भाई वैद्य को लाल सलाम' 'लड़ेंगे जीतेंगे', 'समाजवाद लाना है - भूलो मत भूलो मत' जैसे क्रान्तिकारी नारे लगाने वाले सोशलिस्ट पार्टी/सोशलिस्ट युवजन सभा के कार्यकर्ता मुठ्ठी भर ही थे. ज्यादातर लोग सामान्य नागरिक समाज से थे. ज़ाहिर है, वे प्रेम, सेवा और करुणा के अद्भुत मेल से बने भाई के विरल व्यक्तित्व से प्रभावित रहे थे. मराठी और अंग्रेजी के लगभग सभी अखबारों ने उनके निधन पर स्टोरी छापी. एक अखबार ने लिखा कि उनकी ईमानदारी दंतकथा बन गई थी. नेताओं में मैंने किशन जी के बाद भाई में ही पाया कि उनमें किसी के प्रति कटुता और द्वेष का भाव नहीं था. मध्यकालीन संतों ने सहजता को विरल गुण माना है. लेकिन साथ ही स्वीकार किया है कि सहज होना बड़ी कठिन तपस्या से हासिल होता है. भाई ने जीवन की साधना में सहजता हासिल कर ली थी.     

      भाई ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया. जब कुछ लोग साम्राज्यवादियों की मुखबरी कर रहे थे, तब 14 साल की उम्र में भाई स्वतंत्रता आंदोलन की निर्णायक लड़ाई में हिस्सा ले रहे थे. भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान गाँधी ने किया था, लेकिन उसका नेतृत्व युवा समाजवादी नेताओं ने किया. यह स्वाभाविक है कि 1946 में भाई 18 साल की उम्र में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) के सदस्य हो गए और फिर 1948 में सोशलिस्ट पार्टी की मार्फ़त अपना लम्बा राजनीतिक संघर्ष करते रहे, जिसमें गोवा मुक्ति संघर्ष (1955-1961), जेपी आंदोलन (1974-74) प्रमुखता से शामिल हैं. 1975 से 1977 तक वे मीसा में जेल में बंद रहे. राष्ट्र सेवा दल में भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी जिसके वे 2001 में अध्यक्ष बने. भाई की इच्छा थी कि राष्ट्र सेवा दल सोशलिस्ट पार्टी के लिए काडर निर्माण का काम करे ताकि युवाओं को साम्प्रदायिक राजनीति की चपेट से बचाया जा सके.     

      भाई समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र में एमए थे. वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी और अध्ययनशील व्यक्ति थे. लेकिन उनकी शख्सियत मूलत: राजनीतिक थी. समाजवादी आंदोलन की कोख में पले भाई पर गाँधी के साथ फुले और आम्बेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव था.  उनका वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद और साम्यवाद की विचारधाराओं/व्यवस्थाओं का अच्छा अध्ययन था. वे सभी विषयों पर प्रकाशित अद्यतन लेख और पुस्तकें पढ़ते रहते थे.  

      मेरी राय में भाई की 1991 के बाद शुरु होने वाली राजनीतिक पारी ज्यादा महत्वपूर्ण है. इस साल संविधानिक मूल्यों और प्रावधानों के बरखिलाफ कांग्रेस ने नई आर्थिक नीतियों को देश पर थोप दिया. उस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि 'अब कांग्रेस ने उनका (भाजपा का) का काम हाथ में ले लिया है'. इस अवैध फैसले के समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए आपदायी नतीजे निकालने ही थे, जिन्हें यह समाज और राष्ट्र झेल रहा है. यह सही है कि समाजवादियों ने उस नवसाम्राज्यवादी हमले का राजनीतिक मुकाबला करने बजाय सत्ता को ही राजनीति का ध्येय बना लिया. ऐसा करते हुए उन्होंने पूरे आंदोलन को न केवल तहस-नहस, बल्कि बदनाम भी कर दिया. लेकिन यह भी सही है कि नवसाम्राज्यवाद को मुकम्मल और निर्णायक विचारधारात्मक चुनौती भी समाजवादियों की ओर से ही मिली. किशन पटनायक, सच्चिदानंद सिन्हा, विनोदप्रसाद सिंह, सुरेंद्र मोहन, भाई वैद्य, जस्टिस राजिंदर सच्चर, पन्नालाल सुराणा, डॉ. जीजी पारिख, सुनील सरीखे समाजवादी नेताओं/विचारकों ने नवसाम्राज्यवाद के मुकम्मल विकल्प में एक लघु किन्तु नवीन राजनीतिक धारा पैदा करने का बड़ा उद्यम किया. यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्यधारा राजनीति में समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने नई आर्थिक नीतियों का शुरु से सतत विरोध किया.  

      भाई 1995 में गठित समाजवादी जन परिषद के महामंत्री बने. 2011 में सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना होने पर उन्हें उसका अध्यक्ष बनाया गया. उस समय उनकी उम्र अस्सी के पार थी. वे यह जिम्मेदारी लेना नहीं चाहते थे. लेकिन जस्टिस सच्चर और युवा समाजवादियों की जिद पर उन्होंने अध्यक्ष बनना मंज़ूर किया. पूरी सक्रियता के साथ उन्होंने उस जिम्मेदारी का निर्वाह किया. 1991 के बाद भाई का जीवन नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष करने में बीता. उन्होंने खास तौर पर शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ लम्बा संघर्ष किया.

      ऐसा नहीं है कि नवसाम्राज्यवाद के विरोध में अन्य नेता अथवा राजनीतिक संगठन सक्रिय नहीं रहे हैं. लेकिन वे सब विकास की अवधारणा को लेकर या तो भ्रमित हैं या विकास का रास्ता साम्राज्यवाद के हमजाद पूंजीवाद को ही स्वीकार करते हैं. भाई ने सोशलिस्ट पार्टी के नीतिपत्र और अपने वक्तव्यों में यह स्पष्ट तौर पर कहा है कि कम्युनिस्ट विकास के पूंजीवादी विचार और मॉडल को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. वे उद्योगवाद को ही विकास का पैमाना मानते हैं. भाई लोकशाही समाजवादी विचारधारा को पूंजीवाद का विकल्प मानते थे. पूंजीवाद की आसन्न पराजय में उनका दृढ़ विश्वास था. इसी विश्वास की ज़मीन से वे सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं को निरंतर प्रेरणा देते थे. वह प्रेरणा भाई के बाद भी जीवित है. 

      अलविदा भाई! आपको शांतिमय रहीं. नवसाम्राज्यवादी मंसूबों के खिलाफ समता और स्वतंत्रता का संघर्ष जारी रहेगा!

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