प्रभाष जोशी को भी भगवा रंग में रंगने का अभियान, होने लगा विरोध

प्रभाष जोशी की याद में कार्यक्रम में मुरली मनोहर जोशी देंगे व्याख्यान, उठे विरोध के स्वर ...

प्रभाष जोशी की याद में कार्यक्रम में मुरली मनोहर जोशी देंगे व्याख्यान, उठे विरोध के स्वर  

नई दिल्ली। सर्वोदयी कार्यकर्ता और जनसत्ता के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी जिन्होंने 90 के दशक में भारतीय जनता पार्टी के बाबरी मस्जिद विध्वंस कार्यक्रम के विरोध में जमकर लिखा, अब उन प्रभाष जोशी की याद में होने वाले कार्यक्रम नौवें प्रभाष प्रसंग में पूर्व भाजपा अध्यक्ष डा. मुरली मनोहर जोशी 'तकनीक और जनतंत्र' विषय पर स्मारक व्याख्यान देंगे, जबकि अध्यक्षता पूर्व सीएजी और पूर्व भाजपा सांसद टी.एन. चतुर्वेदी करेंगे। कार्यक्रम रविवार, 15 जुलाई शाम 4 बजे, नई दिल्ली में सत्याग्रह मंडप राजघाट के सामने होगा।

मुरली मनोहर जोशी और टी.एन. चतुर्वेदी को प्रभाष प्रसंग में बुलाए जाने का वरिष्ठ पत्रकार देवप्रिय अवस्थी ने विरोध किया है।

देवप्रिय अवस्थी ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखकर विरोध जताया है। उनकी टिप्पणी निम्नवत् है -

“प्रभाष जोशी आज बहुत शिद्दत से याद आ रहे हैं। तीन दिन बाद उनका 81 वां जन्मदिन जो है।

अपने अंतिम दिनों में वे दो बडे़ कामों में जुटे थे। पहला, नए संदर्भों में गांधीजी के हिंद स्वराज की व्याख्या और दूसरा, पेड मीडिया के खिलाफ हल्ला-बोल। आज ये दोनों काम पहले से ज्यादा प्रासंगिक हैं, लेकिन अब यह काम कौन करे और क्यों करे? अब तो प्रभाष जोशी को भी भगवा रंग में रंगने का अभियान परवान चढ़ रहा है।

क्या आप जानते हैं कि इस बार प्रभाषजी के जन्मदिन पर होने वाले सालाना आयोजन में मुख्य वक्ता और अध्यक्ष के रूप में किन्हें न्योता गया है? न जानते हों तो जान लीजिए। ये शख्सियत हैं- मुरली मनोहर जोशी और त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी। पहले, भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य और दूसरे भाजपा के पूर्व सांसद। याद करें कि बाबरी ढांचा ढहाए जाने के दौर में प्रभाष जोशी ने मुरली मनोहर जोशी और उनकी मंडली के बारे में क्या-क्या लिखा था। समय निकाल कर उनकी -हिंदू होने का अर्थ- पुस्तक के कुछ अंश भी बांच लें। भाजपा के बारे में प्रभाष जी के विचार समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है।

कहते हैं ना- समरथ को नहि दोष गोसाईं। भाजपा और संघ से जुड़े लोगों के लिए आज वह हर शख्स वंदनीय-पूजनीय और भगवाकरण के योग्य है जिसने अपने जीवन में उनके संकुचित नजरिए से न केवल दूरी बनाए रखी बल्कि उस नजरिये का जमकर विरोध भी किया। हां, कुछ वामपंथी लोग जरूर अपवाद हैं। इसलिए इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि प्रभाषजी का भगवाकरण करना भाजपा-संघ के एजेंडे में है।

मैं तो विरोध स्वरूप इस बार प्रभाष जी के स्मृति समारोह में नहीं जा रहा हूं। ऐसा करके मैं प्रभाष जोशी के वृहत परिवार से मिलने-जुलने का मौका भी गंवा रहा हूं। आप भी सोचें कि ऐसे कार्यक्रम में जाना ठीक है या नहीं।

याद दिला दूं कि प्रभाष जी के 60वें जन्मदिन पर प्रभाष प्रसंग के आयोजन में मेरी प्रमुख भूमिका रही थी। 21 वर्ष पहले इंदौर में हुआ वह आयोजन अपने आप में अनूठा था। उस कार्यक्रम के लिए कोई चंदा भी नहीं किया गया था। विभिन्न संस्थाओं और व्यक्तियों ने सभी जिम्मेदारियां आपस में बांट ली थीं।“

कुछ अन्य लेख भी पढ़ें

नवारुणदा के बहाने- फिलवक्त प्रभाष जोशी से बड़े पत्रकार हैं ओम थानवी !

बुरी से बुरी खबरों के लिए अच्छे, बेहद अच्छे दिन हैं

हिंदी पत्रकारिता या हिंदू पत्रकारिता?

प्रभाष जोशी भाषायी पत्रकारिता में धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक पुरुष बन जाते हैं !!!

ओम थानवी की भूमिका को किंतु-परंतु से कम नहीं किया जा सकता

एक ख़ास तरह के अंधराष्ट्रवाद के शिकार थे राजेन्द्र माथुर

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।