क्या मोदी जनकपुर में संघ परिवार के “'जय श्रीराम” में पलीता लगा आए ?

​​​​​​​क्या जनकपुर में 'जय सियाराम' लिखकर नरेंद्र मोदी छह दिसंबर की घटना के पच्चीस साल बाद अपने इस ऐतिहासिक दायित्व को समझ रहे हैं?...

क्या जनकपुर में 'जय सियाराम' लिखकर नरेंद्र मोदी छह दिसंबर की घटना के पच्चीस साल बाद अपने इस ऐतिहासिक दायित्व को समझ रहे हैं?

नए राजनैतिक परिदृश्य में 'जय सियाराम बनाम जय श्रीराम' का द्वंद्व है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद के आम अभिवादन में 'जय श्रीराम' है, फिर मोदी द्वारा 'जय सियाराम' लिखा जाना क्या सारी भक्ति परम्पराओं को ईर्ष्या और द्वेष छोड़कर एकसाथ बिठाने का प्रयास है?

शास्त्री कोसलेन्द्रदास

  नेपाल दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनकपुर के ऐतिहासिक जानकी मंदिर में पूजा की। माता सीता की पूजा करने के बाद मोदी ने कहा, 'मेरा सौभाग्य है कि मैं एकादशी के दिन माता जानकी के चरणों में आया और उनके दर्शन किए।' प्रधानमंत्री ने मंदिर की स्मृति पुस्तिका में अपनी यात्रा को यादगार बताते हुए 'जय सीयाराम' लिखा। प्राकृत भाषा में सीता शब्द का अपभ्रंश रूप 'सिया' है। 

क्या नरेंद्र मोदी जनकपुर में 'जय सियाराम' लिखकर इस द्वंद्व को पाटना चाह रहे है? यदि वे अयोध्या में हुई छह दिसंबर की घटना के लगभग पच्चीस साल बाद अपने इस ऐतिहासिक दायित्व को समझ रहे हैं तो इसे उनके द्वारा तौलकर लिखा 'सांस्कृतिक सचेत भाव' मानना चाहिए।

हम सभी जानते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद के आम अभिवादन में 'जय श्रीराम' है, फिर मोदी द्वारा 'जय सियाराम' लिखा जाना क्या सारी भक्ति परम्पराओं को ईर्ष्या और द्वेष छोड़कर एकसाथ बिठाने का प्रयास है? वैष्णव संप्रदाय, खासकर रामभक्ति के रामानंद संप्रदाय में कभी भी 'जय श्रीराम' का चलन नहीं रहा है।

रामानंद संप्रदाय के प्रधान स्वामी रामनरेशाचार्य का कहना है कि 'साधु-संतों ने बहुत सोच-विचारकर जय सियाराम कहने का क्रम स्थापित किया था। इसे बदलना या बिगाड़ना, दोनों ही परंपरा के लिए ठीक नहीं है। साधु समाज में सदा से जय सियाराम ही चलता है। अच्छी बात है कि मोदी ने जनकपुर में परंपरा का ध्यान रखते हुए जय सियाराम लिखा है।'

जब आज के दौर में युवा पीढ़ियां धर्म के नाम पर उन्माद प्रदर्शित करती नज़र आ रही हैं, तो उन्हें रामभक्ति परंपरा का सरसतापूर्ण सूत्र 'जय सियाराम' देने का मोदी का मकसद क्या राम के नाम वाले हिंसक प्रतीकों के बजाय आध्यात्मिक राम की ओर ले जाना है, जो सत्य, शील, परोपकार और मानवता के सबसे बड़े पोषक थे? जरूरी है कि नई पीढ़ियां जय सियाराम के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक अर्थों और संदर्भों को समझे। वस्तुतः राम के नाम पर राजनीति करते रहने के बजाय सांस्कृतिक पक्ष को उठाते हुए मोदी ने जय सियाराम लिखकर नए और पुराने के बीच सामंजस्य और अविरोध दिखाया है। 

जय सियाराम, जय रामजी की तथा राम राम अभिवादन करने के शब्द हैं। ये सब प्रकार की धारणाओं से ऊपर हैं। व्यापक हैं, निर्गुण और सगुण का समावेश हैं। इनका इतिहास पुराना है। इनमें राम की जय का भाव है। राम परमात्मा का गौण नहीं बल्कि सारे नामों से बढ़कर प्रमुख नाम है। रामवह प्यारा नाम है जिसे महादेव सतत जपते हैं। राम नाम वेदान्तियों का ब्रह्म है। दार्शनिकों का कर्ता है। कर्मवादियों का कर्म है। निर्गुणी संतों का आत्माराम है। ईश्वरवादियों का ईश्वर है। अवतारवादियों का अवतार है। इस नाम के वाहक पुरुषोत्तम राम महर्षि वाल्मीकि की ‘रामायण’ के धीरोदात्त नायक हैं तो तुलसीदास की रामचरितमानस में सामाजिक महानायक हैं। वे एक साथ राजा भी हैं और संत भी। वे हर कसौटी पर खरे हैं। वाल्मीकि उन्हें 'रामो विग्रहवान्धर्म:' कहकर मूर्तिमान धर्म बताते हैं।

एक राम कबीर के हैं, जिनकी वे प्रिया हैं। एक राम अवध के हैं, जिनसे भारत की माटी बनती है। उसकी खुशबू बनती है। वे संस्कृति पुरुष हैं। इसलिए हिन्दू और मुसलमान दोनों के आपस में मिलने का प्यारा सम्बोधन 'राम-राम' है। शताब्दियों से 'जय सियाराम' और 'राम-राम' हमारे मन की आवाज को, भाव को और प्रेम को एक-दूजे तक पहुँचाने वाले शब्द हैं। 'जय सियाराम' बोलने वालों में सब शामिल हैं, रोजा रखने वाले भी तो मंदिर जाने वाले भी।

सात शताब्दियों पहले मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी रामानंद ने राम नाम का आश्रय लेकर निर्गुण और सगुण रामभक्ति के आध्यात्मिक लोकतंत्र की भावभूमि खड़ी की। भक्ति परंपरा में भक्तों ने भगवान के दो रूप स्वीकार किए हैं। एक तो गुणातीत और समस्त शक्तियों के उत्स तथा दूसरी ओर नवधा भक्ति में बंटे अवतारी परमात्मा जो भक्तों की भक्ति भावना के अनुरूप ह्रदय में आविर्भूत होते हैं। पर दोनों ही भक्ति धाराओं का आधार नाम जप और नाम सेवा है। इसी नाते कबीर, रैदास और नानक जैसे निर्गुणी संतों की वाणी में निर्गुण ‘राम’ के दर्शन होते हैं तो गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की शुरुआत में 'बंदउँ नाम राम रघुबर को' लिखकर राम नाम के उदात्त महत्व को प्रतिपादित किया है। कबीर ने राम नाम को अलग ही ऊंचाई दी। ‘दसरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना’ कहने वाले कबीर राम को आत्मा का पर्याय बना देते हैं। शवयात्रा में बोले जाने वाला 'राम नाम सत्य है' का आशय कबीर की दृष्टि में यही है कि इस मिथ्या देह से परे आत्मा सत्य है। कबीर पंथ के 'राम' 'आत्मा' के वाचक हैं, अमर, शाश्वत और पुरातन हैं, जो शरीर के मरने पर नहीं मरते हैं।

समर्थ गुरु रामदास का कीर्तन मंत्र 'श्रीराम जय राम जय जय राम' था तो नमस्कार का संबोधन 'श्री रघुवीर समर्थ'। संत दादू के यहाँ अभिवादन 'दादू राम, सत्य राम' हैं, वहीं रामस्नेही संप्रदाय में 'राम जी राम, राम महाराज' है। रामानंद संप्रदाय के नित्यार्चन में 'राम नाम महाराज की जय' बोला जाता है। नित नए रूपों में नाम निरूपण का सिलसिला सैकड़ों सालों का है। पिछली शताब्दी में ही शिरडी के साईं बाबा ने उन्हें अपनी और से 'साईं राम' नाम दिया। आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने भी ‘रघुपति राघव राजा राम’ नाम की डोर पकड़ी क्योंकि उनकी कल्पना में ही राम राज्य था। राममनोहर लोहिया तो नास्तिक होते हुए भी 'रामायण मेला' लगवाते थे।

लेकिन इस बीच इन सबसे अलग पिछले करीब तीन दशकों से जय सियाराम के सामने सुनिश्चित योजना से एक नया नारा 'जय श्रीराम'  आया है। आश्चर्य है कि जिस राम को हम जानते हैं, वे इतने विनम्र हैं कि शिव धनुष तोड़ने पर क्रुद्ध परशुराम से कहते हैं, 'नाथ संभु धनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।' हे नाथ, शिव का धनुष तोड़ने वाला आपका कोई दास हो होगा। ठीक ऐसे ही वे लंका जाने के लिए रास्ता मांगते हुए समुद्र से प्रार्थना करते है। पर इस नारे ने उन्हें आक्रामक बना दिया है। वे भगवा पहनकर हाथ में धनुष लिए क्रोधित अवस्था के चित्रों में कैद हो गए। लोकमानस में उनकी जो तस्वीरें हैं वे 'जय सियाराम' की न होकर 'जय श्रीराम' की उभरने लगी हैं, जैसे कोई आक्रामक योद्धा, जो माथे पर भगवा पट्टी बांधे लोगों की भीड़ के नारों का नायक हो। यह भीड़ 'जय श्रीराम' लिखे ध्वजा-पताकाओं से घिरकर उनकी सेना होने का दावा कर रही है। सत्य, शील और त्याग की मूर्ति राम की बहुत ही चतुराई से गढ़ी गई एक ऐसी छवि उभरती है, जिसमें वे भगवा वस्त्र में धनुष चलाते हुए एक मजबूत शरीर वाले योद्धा के रूप में चित्रांकित हैं। इनका नारा सनातन 'जय सियाराम' नहीं बल्कि 'जय श्रीराम' है। इस नए उभरे राजनैतिक परिदृश्य में 'जय सियाराम बनाम जय श्रीराम' का द्वंद्व है।

नब्बे के दशक में आए 'जय श्रीराम' के नारे ने राम मंदिर आंदोलन को बल दिया। घर-घर में यह नारा रामभक्ति का आधार बन गया। हालाँकि उस वक़्त के इस नारे ने 'जय सियाराम' और 'राम राम' के अभिवादन में प्रयुक्त सम्बोधन को बदल दिया। तब से संघ, वीएचपी और भाजपा में नमस्कार का आम सम्बोधन 'जय श्रीराम' बना हुआ है। मोदी ने इसकी जगह 'जय सियाराम' लिखकर ऐतिहासिक दायित्व बोध का काम किया है, जिसके दूरगामी परिणाम सुखद हो सकते हैं।

शास्त्री कोसलेन्द्रदास

(लेखक राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं।)

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