पटना संग्रहालय बंद करने का मामला : महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुत्री ने नीतीश को लिखकर जताया विरोध

पटना संग्रहालय के उत्थान और प्रसिद्धि की बुनियाद में महापंडित ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। ...

हाइलाइट्स

पटना। महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुत्री जया सांकृत्यायन ने बिहार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पटना संग्रहालय बंद करने पर चिंता जताई है।

उस पत्र में उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि राहुल सांकृत्यायन के धरोहर को तितर-बितर होने से रोका जाए। आज तक जिस संग्रहालय को एक साधारण नागरिक जादूघर समझ उसमें प्रवेश कर अपने प्रदेश की गौरवगाथा का अवलोकन करते आ रहे हैं। बिहार के नौजवान अध्ययन करते हैं। इस विद्या मंदिर को निर्जीव और वीरान नहीं किया जाए। पटना म्यूजियम में राहुल सांकृत्यायन की दी हुई थंका, पांडुलिपि और तालपत्रों के अलावा पोशाक, धार्मिक कृयाओं से जुड़ी वस्तुएं, मूर्तियां, आभूषण तथा सिक्के संग्रहित हैं। इसके पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य था कि यह सारी धरोहर समग्र रूप से एक ही छत के नीचे बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों के समक्ष रहे। शोध करने वाले लोगों को अपने इतिहास से जुड़े पहलुओं को समझने के लिए किसी विदेशी संस्था या विश्वविद्यालय नहीं जाना पड़े।

ज्ञात हो कि पटना संग्रहालय के उत्थान और प्रसिद्धि की बुनियाद में महापंडित ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। जया सांकृत्यायन का हस्ताक्षरित पत्र मुख्यमंत्री केनिजी सचिव के पास whatsapp और ईमेल से प्राप्त हो चुका है। मुख्यमंत्री बिहार के नाम जारी पत्र की प्रतिलिपि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश पटना उच्च न्यायालय को भी भेजी गई है।

पत्र का मूलपाठ निम्न है

सेवा में,

श्री नीतीश कुमारजी,

मुख्यमंत्री, बिहार सरकार

पटना।

विषय: पटना म्यूजियम के धरोहर का स्थानान्तरण तथा राहुल सांकृत्यायन कलेक्शन की समग्रता का विभाजन और सुरक्षा के संदर्भ में।

आदरणीय महोदय,

बहुत खेद और विस्मय से यह ज्ञात हुआ है कि पटना के बुद्धमार्ग स्थित पटना संग्रहालय को 9 सितम्बर, 2017 से बन्द कर दिया गया है और इस अन्तराल में उसकी बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहर का स्थानान्तरण किया जायेगा।

यह खबर किसी देश प्रेमी, इतिहासवेत्ता, कलाप्रेमी और आम नागरिक के लिए अत्यन्त सोचनीय है।

अप्रैल, 2017 में पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम में भाग लेने का मुझे भी सौभाग्य मिला था। एक उम्मीद थी कि पराधीन भारत में स्थापित यह विश्व स्तरीय ख्यातिप्राप्त संस्था और भी उर्जा और लगन के साथ अग्रसर होगी। उपस्थित श्रोतागण, जनता तथा विद्यार्थी मंडली का उत्साह देख कर, यह धारणा और भी प्रबल हुई।

बिहार सरकार का यह कदम न केवल आश्चर्यजनक है, बल्कि घोर निन्दा और विरोध के लायक है।

पटना म्यूजियम के साथ राहुल परिवार का एक विशेष सम्बन्ध रहा है। 1928 में जब यह भवन निर्मित हुआ तो राहुलजी भारत से विलुप्त संस्कृत और बुद्ध दर्शन से संबंधित बहुमूल्य ग्रन्थों और पाण्डुलिपियों की खोज में निकल पड़े थे। तिब्बत के दुर्गम पथों की उनकी चार साहसिक यात्रायें अपने आपमें एक अलग इतिहास है। उनको अपने इस अभियान में सफलता मिली और वे वहाँ के मठों में शताब्दियों से बन्द कमरों में रखे पाण्डुलिपियों और थंका चित्रों को पुनः भारत लाने में सफल हुए। उनकी इस सफलता को विश्व विख्यात विद्वानों ने सराहा। उस समय तक यह तिब्बत से बाहर सबसे महत्वपुर्ण संग्रह समझा गया। श्रीलंका, इंग्लैण्ड, फ्रांस और जर्मनी में यह प्रदर्शित हुआ। यदि राहुलजी चाहते तो उसी समय वे इन दस्तावेजों को किसी भी विदेशी संस्था या म्यूजियम को भारी आर्थिक राशि के साथ सुपुर्द कर सकते थे।

मगर राहुलजी ने ऐसा न कर, अपने अनन्य मित्रों और विद्वान बैरिस्टर डॉ. के.पी. जायसवाल के साथ सलाह कर यह धरोहर पटना म्यूजियम में रखना तय किया। पटना म्यूजियम के एक्शेसन रजिस्टर में दर्ज 08.03.1933 में सब वस्तुओं का ब्यौरा है, जो क्रम 08.01.1956 तक चलता रहा। इसकी प्रतिलिपि राहुलजी के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में भी है। उनका यह उद्देश्य था कि यह सारी धरोहर समग्र रूप से एक ही छत के नीचे बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों के समक्ष रहे और शोध करने वाले मामूली से मामूली व्यक्ति को अपने इतिहास से जुड़े पहलूओं को समझने के लिए किसी विदेशी संस्था या विश्वविद्यालय के द्वार न खटखटाने पड़े। इस क्लेक्शन में थंका, पाण्डुलिपि और तालपत्रों के अलावा पोशाक, धार्मिक कृयाओं से जुड़ी वस्तुएँ, मुर्तियाँ, आभूषण तथा सिक्के संग्रहित हैं। आज तक म्यूजियम परिसर में स्थित के.पी. जायसवाल इन्स्टीच्यूटर और बिहार रिसर्च सोसाईटी संग्रहालय ने मिलकर अनेक ग्रन्थों पर काम किया है, प्रकाशित किया है। विदेशी विद्वानों के स्मरण में भी पटना म्यूजियम का खास महत्व रहा है। राहुलजी ने खुद इस भवन के कक्षों में बैठ कई महत्वपूर्ण ग्रन्थों का उद्धार किया।

राहुलजी का बिहार से, उसकी गरीब से गरीबी जनता से लेकर उच्च कोटि के विद्वानों के साथ संबंध रहा। बिहार के पौराणिक से पौराणिक स्थलों को उनके कदमों ने नापा है, उनकी विद्या के आलोक में मूक पत्थर भी बोल पड़े। एक क्रान्तिकारी, किसान नेता, समाजवादी और देशभक्त के रूप में वे दृढ़ रहे। पराधीन भारत में उन्होंने लाठी भी खाई, कई बार जेल यात्रा भी की।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर के विद्वानों में उनकी गिनती है। आज के स्वाधीन भारत में, उनकी प्रिय कर्मभूमि बिहार में उनकी देन, उनकी सोच का मान न रखना उनके प्रति निरादर है। इसके प्रति आवाज उठाना मेरा दायित्व है।

राहुलजी की बेटी होते हुए मैं आपसे आग्रह करती हूँ कि आप इस निश्चय पर पुनः विचार करें और बिहार के वासियों की इस धरोहर को तितर-बितर होने से रोकें। आज तक जिस संग्रहालय को एक साधारण नागरिक भी जादू घर समझ, उसमें प्रवेश कर अपने प्रदेश की गौरवगाथा का अवलोकन कर सकता है, जहां बिहार का नौजवान एक अपनत्व के साथ अध्ययन कर सकता है, इस विद्या के मन्दिर को निर्जीव और वीरान न किया जाय।

आशा करती हूँ कि आप इस पत्रा पर और इसमें उद्धृत प्रसंगों पर गौर करेंगे।

सादर नमस्कार,

 

(जया सांकृत्यायन पड़हाक)

राहुल भवन

ग्राम एवं पोस्ट-भगवंतपुर

देहरादून-248003 (उत्तराखण्ड)

प्रतिलिपि:

1.         महामहीम राष्ट्रपति, भारत सरकार, नई दिल्ली।

2.         माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली।

3.         माननीय मुख्य न्यायधीश, पटना उच्च न्यायालय, पटना।

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