दीपावली पर प्रदूषण : एक सामाजिक कुरीति है आतिशबाजी

दुर्भाग्य से जिसके घर एक बच्चा सांस की बीमारी से ग्रस्त हो जाता है वह खुद ही प्रदूषण और पटाखों के प्रति जागरूक हो जाता है, अपने घर में यह हालात न आने दें और समय से पहले कानून सम्मत बनें।...

 दीपावली पर प्रदूषण : एक सामाजिक कुरीति है आतिशबाजी

नई दिल्ली, 27 अक्तूबर। दीपों का पर्व दीपावली आने वाला है। इसके आगमन की खुशियों के बीच ही दीपावली पर पटाखों से से होने वाले प्रदूषण पर चिंता व्यक्त की जाने लगी है।

पटाखे जलाने से निकले धुएं में सल्फर डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सीसा, आर्सेनिक, बेंजीन, अमोनिया जैसे कई ज़हर सांस के जरिये शरीर में घुलते हैं। इनका कुप्रभाव परिवेश में मौजूद पशु-पक्षियों पर भी होता है। यही नहीं इससे उपजा करोड़ों टन कचरे का निबटान भी बड़ी समस्या है। यदि इसे जलाया जाए तो भयानक वायु प्रदूषण होता है। यदि इसके कागज वाले हिस्से को रिसाइकल किया जाए तो भी जहर प्रकृति में समाता है और यदि इसे डंपिंग में यूं ही पड़ा रहने दिया जाए तो इसके विषैले कण जमीन में जज्ब होकर भूजल और जमीन को स्थाई और लाइलाज स्तर पर जहरीला कर देते हैं।

प्रदूषण पर नियंत्रण से नाराज़ केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को भी अब सख्त लहजे में कहना पड़ा है कि सरकारी विभाग प्रदूषण कम करने के लिए ठोस काम नहीं कर रहे हैं, अब आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा।

याद हो श्री हर्षवर्धन ने पहले भी कहा था कि प्रदूषण से सबसे ज़्यादा बच्चे प्रभावित होते हैं इसलिए वैज्ञानिकों से प्रदूषण रहित पटाखे विकसित करने को कहा गया है।

एक सामाजिक कुरीति है आतिशबाजी

वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद् पंकज चतुर्वेदी ने कहा है कि आतिशबाजी एक सामाजिक कुरीति है।

कानून बेअसर

पंकज चतुर्वेदी ने कहा है कि आतिशबाजी से उपजे शोर के घातक परिणाम तो हर साल बच्चे, बूढ़े और बीमार लोग भुगतते ही हैं। इस पर गौर करें कि रात 10 बजे के बाद वैसे भी पटाखे चलाना अपराध है। कार्रवाई होने पर छह माह की सजा भी हो सकती है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में दिया था जो अब कानून की शक्ल ले चुका है, फिर भी दीवाली पर रातभर पटाखे चलते हैं।

विस्फोटक नियमावली 1983

पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि देखा जाए तो आतिशबाजी को नियंत्रित करने की शुरुआत ही लापरवाही से है। विस्फोटक नियमावली 1983 और विस्फोटक अधिनियम के परिपालन में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि 145 डेसीबल से अधिक ध्वनि तीव्रता के पटाखों का निर्माण, उपयोग और विक्रय गैरकानूनी है। प्रत्येक पटाखे पर केमिकल एक्सपायरी और एमआरपी के साथ-साथ उसकी तीव्रता भी अंकित होनी चाहिए, लेकिन बाजार में बिकने वाले पटाखों पर उसकी ध्वनि तीव्रता अंकित नहीं होती। बाजार में 500 डेसीबल की तीव्रता के पटाखे भी उपलब्ध हैं। यही नहीं चीन से आए पटाखों में ज़हर की मात्र असीम है और इस पर कहीं कोई रोक टोक नहीं है।

एक सामाजिक कुरीति है आतिशबाजी

पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि वैसे तो ढेर सारी कानून पहले से मौजूद हैं लेकिन आतिशबाजी एक सामाजिक कुरीति है और इसका हल समाज के पास ही है। दुर्भाग्य से जिसके घर एक बच्चा सांस की बीमारी से ग्रस्त हो जाता है वह खुद ही प्रदूषण और पटाखों के प्रति जागरूक हो जाता है, अपने घर में यह हालात न आने दें और समय से पहले कानून सम्मत बनें।

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