पहाड़ों पर बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था

पहले कांग्रेस और उसके हरीश रावत हों या अभी भाजपा के त्रिवेन्द्र सिंह रावत कोई भी इस हालत को सुधारने में बहुत प्रतिबद्ध नहीं दिखते हैं। और फिर इस बात पर दुखड़ा रोते हैं कि पलायन क्यों हो रहा है? ...

हाइलाइट्स

यू एन डी पी की 2016 की स्वास्थ्य रिपोर्ट में भारत का हाल देखिए ज़रा। ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में हम 131 नम्बर पर हैं। छोटे-छोटे देश भी कई हमसे आगे हैं। स्वास्थ्य में 2014-16 के बीच देश के जीडीपी का मात्र 1.4 प्रतिशत खर्च हुआ है करीब 10000 लोगों पर सिर्फ 7.0 डॉक्टर हैं तो शिशु मृत्यु दर या इन्फेंट मोर्टेलिटी रेट के मामले में भी हम बहुत पीछे हैं यानि 37.9 प्रति हज़ार जन्मे बच्चों पर और जिनमें पाँच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 47.7 प्रति हज़ार जन्में बच्चों पर है।

मोहम्मद ज़फ़र

अगर आप उत्तरकाशी के बारे में नहीं जानते हैं तो बताना चाहता हूँ कि गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे धार्मिक तीर्थ स्थलों के लिए उत्तराखंड का यह ज़िला मशहूर है और यहाँ ट्रेकिंग और पर्यटन सम्बन्धी भी कई स्थल हैं। लोगों में ठीक ठाक खाने कमाने की सम्पन्नता है और खेती बागवानी भी ठीक ठाक है जिससे एकदम भुखमरी जैसी स्थिति आपको कहीं देखने को शायद ही मिले। ज़िला गंगा, यमुना व टोंस घाटियों में बंटा है जिसमें शहर उत्तरकाशी गंगा यानि भागीरथी के निकट बसा है जो कि भटवारी नामक ब्लॉक में आता है और डुंडा व चिन्याली गंगा घाटी के दो अन्य ब्लॉक हैं। वहीं यमुना के किनारे बसा क्षेत्र यमुना घाटी कहलाता है। जिसमें नौगाँव व पुरोला दो ब्लॉक हैं और टोंस नदी की घाटी में है मोरी ब्लॉक। सभी जगह पर स्वास्थ्य के मामले में बड़ी दिक्कते हैं।  

पहाड़ों की इस नगरी के दूरस्थ ब्लॉक को छोड़ उत्तरकाशी में भी अगर स्वास्थ्य के हाल को देखें तो यहाँ एक ज़िला अस्पताल है जहाँ दूर-दूर से लोग इलाज के लिए आते हैं। वहीं मोरी पुरोला में प्राथमिक अस्पतालों के हाल भी बुरे हैं और वहाँ से भी लोगों को थक हार कर देहरादून इलाज के लिए जाना पड़ता है। आपको जान कर हैरानी होगी कि देहरादून जाने में पूरे साढ़े पाँच से छः घंटे लगते हैं। चाहे आप उत्तरकाशी से जाएँ या पुरोला से। और मोरी के दूरस्थ क्षेत्रों जैसे सांखरी, जखोल आदि से तो दस ग्यारह घंटे लग जाते हैं। उन क्षेत्रों के लिए उत्तरकाशी और देहरादून की दूरी लगभग बराबर है और उत्तरकाशी के ज़िला अस्पताल में वहाँ से आकर दिखाने का कोई अर्थ नहीं क्योंकि यहाँ खाँसी, बुख़ार ठीक करने और प्रसूति के अलावा कोई बड़ी बीमारी या दुर्घटना में गंभीर ज़ख्म हों तो यहाँ बचा सकने लायक ना संसाधन हैं ना सामग्री। कहने को कुछ मशीने हैं मगर हालत गंभीर होने पर देहरादून रेफर कर देना आसान काम है फिर चाहे मरीज की रास्ते में ही मौत हो जाए।

यह सब लिखने का कारण यह है कि एक बच्ची का कल उत्तरकाशी के कस्बे मातली में एक्सीडेंट हुआ और उसके हाथ पैर में फ्रैक्चर के साथ गंभीर चोटें आई थीं। किशोर बच्ची को ज़िला अस्पताल में भर्ती किया गया मगर हुआ वही जो दुखद था। देहरादून रेफर करने के बाद आधे रास्ते में बच्ची ने दम तोड़ दिया। शायद अगर यह मामला देहरादून में होता तो उसे बचाया जा सकता था। लोग इसे भाग्य और उस नशे में धुत ड्राईवर की गैर ज़िम्मेदार ड्राइविंग तक सीमित कर के भूल जाएँगे। जबकि उस बच्ची और ऐसी तमाम मौतों के लिए पहाड़ों का बदहाल स्वास्थ्य सिस्टम भी ज़िम्मेदार है। लोग फिर चुपचाप उत्सवों त्योहारों में लग जाएँगे। और फिर किसी बच्ची के दम तोड़ने का इंतज़ार करेंगे। ना कोई आवाज़ उठाता है कि पहाड़ों में जब शहर दूर हैं तो स्वास्थ्य सुविधाएँ एकदम सटीक और अच्छी क्यों नहीं हैं? कठिन और दूर रास्तों पर देहरादून के सहारे बैठे रहना कब तक ठीक है? प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की हालत बिन दवाओं और डॉक्टरों के अभाव में क्यों है? क्यों लोगों को झोला छाप लोगों और एक आध प्राइवेट डॉक्टरों के सहारे छोड़ दिया गया है? सरकारें स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च क्यों नहीं कर रही हैं?

पहले कांग्रेस और उसके हरीश रावत हों या अभी भाजपा के त्रिवेन्द्र सिंह रावत कोई भी इस हालत को सुधारने में बहुत प्रतिबद्ध नहीं दिखते हैं। और फिर इस बात पर दुखड़ा रोते हैं कि पलायन क्यों हो रहा है? हम पलायन से बड़े चिंतित हैं। माननीयों आप स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार के अच्छे अवसर दो और सुविधाएँ शुरू करो तो लोग क्यों अस्पताल के लिए, इंजीनियरिंग, मेडिकल पढ़ने के लिए और रोज़गार के लिए पहाड़ छोड़ेंगे। मगर असल बात ये है कि आप में से किसी का भी मुख्य मुद्दा ही नहीं है स्वास्थ्य और शिक्षा। आपको तो बस अपनी राजनीति और प्राइवेट बिज़नेस वालों के साथ बड़े बड़े बांधों वाला विकास ही दिखाई देता है बाकी सरकारी सुविधाएँ बर्बाद होती जाएँ।

हालाँकि शिक्षा हो या स्वास्थ्य यह किसी एक राज्य की बात नहीं है यह पूरे देश का हाल है।

यू एन डी पी की 2016 की स्वास्थ्य रिपोर्ट में भारत का हाल देखिए ज़रा। ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में हम 131 नम्बर पर हैं। छोटे-छोटे देश भी कई हमसे आगे हैं। स्वास्थ्य में 2014-16 के बीच देश के जीडीपी का मात्र 1.4 प्रतिशत खर्च हुआ है करीब 10000 लोगों पर सिर्फ 7.0 डॉक्टर हैं तो शिशु मृत्यु दर या इन्फेंट मोर्टेलिटी रेट के मामले में भी हम बहुत पीछे हैं यानि 37.9 प्रति हज़ार जन्मे बच्चों पर और जिनमें पाँच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 47.7 प्रति हज़ार जन्में बच्चों पर है। ऐसे में भी सरकारों को स्वास्थ्य और शिक्षा में खर्च बढ़ाने का विकल्प नहीं दिखाई दे रहा और ना ही कोई जवाबदेही हो रही है। बजाय इसके यू पी के सी एम साहब गोरखपुर और फरुक्खाबाद में ऑक्सीजन के अभाव या लापरवाही, व अन्य क्षेत्रों में मरते बच्चों पर जनता पर ही जवाब मारते हैं कि कुछ दिन बाद सरकार को ही बच्चे पालने की ज़िम्मेदारी ना दे दी जाए। ऐसे दृष्टिकोण में आप निराशा के अलावा और क्या उम्मीद कर सकते हैं।

सरकार कोई भी हो स्वास्थ्य और शिक्षा के हाल बुरे हैं। पहाड़ों पर तो इसका उदाहरण आपको आने पर ही मिल जाएगा। अभी गाँधी जयंती आ रही है फिर से बड़े-बड़े कसीदे कढ़े जाएँगे मगर एक भी सरकार इस तरफ नहीं सोचेगी कि गाँधी जी के स्वराज का मतलब क्या था? वो गाँवों को विकसित और समृद्ध करने के पक्षधर थे वे लोगों को सक्षम करने के पक्षधर थे। वे स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतों को सुदृढ़ बनाने के पक्षधर थे और इस तरह से वे पलायन को रोकने के पक्षधर थे ना कि सिर्फ भाषण देने में।

आप गाँधी के हिन्द स्वराज से ना सही अर्थशास्त्र की नज़र से अमर्त्य सेन के शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वतंत्रता के बिंदु से ही देखें तो भी आपको समझ में आ जाएगा कि असली विकास नीचे से हर गाँव, हर व्यक्ति से ऊपर की ओर जाएगा ना कि महज़ बड़े उद्योगों और बंधों से होगा। और जनता यानि लोगों के क्या कहने! वे सोशल मीडिया पर नेताओं के लिए एक दूसरे को गरियाने में लगे हैं। तो कुछ लोग ख़ामोशी से जिए जा रहे हैं क्योंकि उन्हें आदत हो गई है ऐसे ही जीने की। कल किसी और के घर की बच्ची ख़त्म हुई है शायद लोग इंतज़ार में रह रहे हैं कि उनके साथ तो अभी नहीं हुआ है यह। ऐसी सूरत में पाश की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं-  

“सबसे खतरनाक होता है

मुर्दा शान्ति से भर जाना

ना होना तड़प का

सब कुछ सहन कर जाना,

घर से निकलना काम पर

और काम से लौट कर घर आना

सबसे खतरनाक होता है    

हमारे सपनों का मर जाना”

उम्मीद है कि लोग जागेंगे और अपनी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए नेताओं से मांग करेंगे। अपनी आवाज़ को साथ मिलकर उठाएँगे। क्योंकि यहाँ बिना लड़े कुछ नहीं मिलता। 

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