जब भाजपा देश की सबसे अमीर पार्टी बन रही थी तब संतोषी भात माँगते हुए भूख से मर गई

अमीर राजा की गरीब प्रजा ... ये वही समय था, जब आधे हिंदुस्तान में देवी पूजा का उत्साह था और देश के नीति-नियंता भी इस उत्सव में सराबोर थे। ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट से मोदी सरकार का सिर शर्म से झुक...

हाइलाइट्स

ताजमहल हमारे संस्कृति पर धब्बा है या गौरव, अकबर महान थे या महाराणा प्रताप, पद्मावती पर फिल्म बनाकर सही हुआ या गलत, ऐसे कई सवालों पर घंटों बहस देश के राजनेता कर सकते हैं। बहस इस बात पर भी हो सकती है कि संतोषी की मौत भूख से हुई या मलेरिया से। लेकिन नेता इस बात पर चर्चा नहीं करेंगे कि एक मासूम अकाल मौत का शिकार क्यों हुआ? उसे भूख लगने पर भरपेट भोजन नहीं मिला या बीमारी होने पर समय से इलाज नहीं मिला तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

#HamariRai | अमीर राजा की गरीब प्रजा

राजीव रंजन श्रीवास्तव

विज्ञापनों में अक्सर दिखाते हैं कि नन्हे बच्चे के पेट में दर्द उठता है, तो दादी-नानी कोई आयुर्वेदिक दवा पिला देती हैं या डाक्टर मां को सलाह देते हैं कि कीटाणु दूर करने के लिए फलां-फलां साबुन इस्तेमाल करें, बाबानुमा व्यापारी की नसीहत मिलती है हमारे बनाए तेल का उपयोग करें तो बीमारियां दूर होंगी। लेकिन झारखंड के सिमडेगा के कारीमाटी गांव की नन्ही संतोषी के पेट में 28 सितंबर को दर्द उठा तो गांव के वैद्य ने कहा कि इसको भूख लगी है, खाना खिला दो, ठीक हो जाएगी।

#जीडीपी और #विकास की बातें करने वालों, शेयर बाजार में उछाल देखकर मुदित होने वालों, #धनतेरस और पुष्य नक्षत्र में शुभ मुहूर्त देखकर खरीदारी करने वालों को यह नसीहत अटपटी लग सकती है। किसी बच्ची के पेट में इसलिए भी दर्द हो सकता है कि वह भूखी थी? लेकिन सच यही है और कड़वा होने के बावजूद इसे हलक से उतारना ही होगा।

#संतोषी के घर में कई दिनों से अनाज नहीं था। उसके परिवार का राशन कार्ड बना था, लेकिन #डिजिटल_इंडिया वाले भारत में #राशन_कार्ड #आधार से लिंक्ड नहीं था, तो डीलर ने उसकी मां को अनाज नहीं दिया। भूख बर्दाश्त करते-करते संतोषी के पेट ने जवाब दे दिया और रात तक उसकी सांसों ने भी। उसकी मां ने उसे नमक वाली चाय पिलाने की कोशिश की थी, ताकि उसकी भूख थोड़ी शांत हो, लेकिन भात-भात कहकर रोकी संतोषी के हाथ-पैर अकड़ रहे थे और आखिरकार उसने दम तोड़ दिया।

ये वही समय था, जब आधे हिंदुस्तान में देवी पूजा का उत्साह था और देश के नीति-नियंता भी इस उत्सव में सराबोर थे।

ये वाकया दिल्ली-मुंबई का होता तो खबर तुरंत ब्रेक हो जाती, लेकिन #झारखंड के गांव से मुख्य भारत तक पहुंचने में इसे वक्त लग गया। #भूख_से_मौत की खबर थी, आखिर उसे दौड़ा कर भी क्या मिलता? कुछ दिनों पहले ही तो ग्लोबल हंगर इंडेक्स की भी रिपोर्ट आई है कि वैश्विक भूख सूचकांक में भारत शतकवीर बन गया है। 119 देशों की सूची में उसका स्थान सौवां है। देश में 93 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, यह बात तो केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने इसी साल अप्रैल में संसद में बताई है। इस तरह की बातों पर प्रधानसेवक के आंसू नहीं निकलते, न अपनी जाति पर गर्व का आह्वान करने वालों की भुजाएं फड़कती हैं।

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ताजमहल हमारे संस्कृति पर धब्बा है या गौरव, अकबर महान थे या महाराणा प्रताप, पद्मावती पर फिल्म बनाकर सही हुआ या गलत, ऐसे कई सवालों पर घंटों बहस देश के राजनेता कर सकते हैं। बहस इस बात पर भी हो सकती है कि संतोषी की मौत भूख से हुई या मलेरिया से। लेकिन नेता इस बात पर चर्चा नहीं करेंगे कि एक मासूम अकाल मौत का शिकार क्यों हुआ? उसे भूख लगने पर भरपेट भोजन नहीं मिला या बीमारी होने पर समय से इलाज नहीं मिला तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? कब तक राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाकर देश का ध्यान असल मुद्दों से भटकाते रहेंगे?

ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट से मोदी सरकार का सिर शर्म से झुकना चाहिए था, लेकिन सरकार की गर्दन में इतना लोच ही नहीं है। बल्कि अब तो भाजपा इस बात पर अपनी गर्दन और ऐंठ सकती है कि वह देश की सबसे मालदार पार्टी बन गई है।

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नोटबंदी के बाद आम जनता का धन तो बैंकों के पास चला गया और अब अपना ही पैसा निकालने के लिए उसे कई परेशानियां उठानी पड़ रही हैं। लेकिन राजनीतिक दलों की संपत्ति शुक्ल पक्ष के चांद की तरह बढ़ती जा रही है और जो रवैया है, उसमें तय है कि इनके लिए कृष्ण पक्ष कभी आएगा ही नहीं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की नई रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक दशक में राजनीतिक दलों की संपत्ति में भारी इजाफा हुआ है। सात राष्ट्रीय दलों की कुल औसत संपत्ति 2004-05 में 61.62 करोड़ रुपये थी, जो वित्त वर्ष 2015-16 में बढ़ कर 388.45 करोड़ रुपये हो गयी है। भाजपा खुश हो सकती है कि उसके पास बहुमत ही नहीं, सबसे ज्यादा धन भी है।

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2004-05 में भाजपा की संपत्ति 122.93 करोड़ रुपये थी, जो 2015-16 में बढ़कर 893.88 करोड़ रुपये हो गयी है। कांग्रेस उससे थोड़ा पीछे है, उसके पास 758.79 करोड़ रुपये हैं। अन्य दल भी ऐसे ही अमीर हैं। इतना धन इस पार्टियों के पास कहां से आता है? इन्हें चंदा देने वाले भी तो इंसान ही होंगे, आसमान से तो धनवर्षा होती नहीं होगी? क्या इन पर नोटबंदी, जीएसटी आदि का कोई असर नहीं पड़ता? या ऐसे चंदा देने वालों की मर्जी से ही सरकार फैसले लेती है और जनता को मानने के लिए मजबूर करती है? इतने धन का आखिर ये राजनीतिक दल करते क्या हैं? चुनाव में तो खर्च की सीमा तय होती है, फिर रोड शो से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक करोड़ों रुपए कहां से बंटते हैं? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं। कम से कम एक सवाल का जवाब तो देश को मांगना ही चाहिए कि भूख से तड़पती संतोषी को भात क्यों नहीं मिला?

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