निजी घरानों को लाभ पहुंचाने में जुटी मोदी सरकार, संसद पर प्रदर्शन करेंगे बिजली कर्मचारी

राज्य सरकारों, बिजली उपभोक्ताओं, बिजली कर्मचारियों और बिजली इंजीनियरों के विरोध के बावजूद केंद्र सरकार इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2014 को बजट सत्र में पारितकराने पर आमादा...

बिजली (संशोधन) बिल 2014 के विरोध में संसद पर प्रदर्शन करेंगे बिजली कर्मचारी

कमेटी का कहना है कि निजी घरानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से राज्य सरकारों, बिजली उपभोक्ताओं, बिजली कर्मचारियों और बिजली इंजीनियरों के विरोध के बावजूद केंद्र सरकार इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2014 को बजट सत्र में पारित कराने पर आमादा है

बिजली(संशोधन) बिल 2014 के विरोध में संसद के बजट सत्र के दौरान बिजली कर्मचारियों और अभियन्ताओं का संसद पर विशाल प्रदर्शन

बिल पेश हुआ तो देशव्यापी हड़ताल होगी

बिजली(संशोधन) बिल 2014 के विरोध में संसद के बजट सत्र के दौरान नेशनल कोआर्डिनेशन कमेटी आफ इलेक्ट्रिसिटी एंप्लाइज एंड इंजीनियर्स (एनसीसीओईईई) के बैनर तले बिजली कर्मचारी और इन्जीनियर राजधानी दिल्ली में विशाल रैली और प्रदर्शन करेंगे।

नेशनल कोआर्डिनेशन कमेटी आफ इलेक्ट्रिसिटी एंप्लाइज एंड इंजीनियर्स (एनसीसीओईईई) द्वारा लिए गए निर्णय की जानकारी देते हुए ऑल इण्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि यह भी निर्णय लिया गया है कि यदि केन्द्र सरकार ने बजट सत्र के दौरान इलेक्ट्रिसिटी (अमेण्डमेंट ) बिल 2014 को पारित कराने की एकतरफा कोशिश की तो विरोध स्वरुप देश के तमाम 25 लाख बिजली कर्मचारी और इन्जीनियर बिल पेश होने के साथ ही पूरे देश में एक दिन की हड़ताल / कार्य बहिष्कार करेंगे। उन्होंने बताया कि नेशनल कोआर्डिनेशन कमेटी  ने प्रदर्शन और एक दिन की हड़ताल की नोटिस केन्द्र सरकार को दे दी है।

नेशनल कोआर्डिनेशन कमेटी की मुख्य माँगे हैं –

इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 के दुष्प्रभावों पर पुनर्विचार कर बिजली निगमों का एकीकरण किया जाये और तत्काल प्रभाव से निजीकरण , फ्रेंचायसी पर रोक लगाईं जाये, जन विरोधी और कामगार विरोधी इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट ) बिल 2014 को संसद से पारित कराने की प्रक्रिया पूरी तरह रोक दी जाये , इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट ) बिल 2014 के कर्मचारी विरोधी एवं उपभोक्ता विरोधी प्राविधानों पर नेशनल कोआर्डिनेशन कमीटी ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज एण्ड इंजीनियर्स (एन सी सी ओ ई ई ई ) से विस्तृत वार्ता की जाये ,सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार " सामान कार्य के लिए सामान वेतन " की नीति लागू की जाये तथा नियमित प्रकृति के कार्यों हेतु नियमित भर्ती की जाये, विद्युत् परिषदों के विघटन के बाद या 2005 के बाद भर्ती हुए सभी कार्मिकों के लिए पुरानी पेंशन प्रणाली लागू की जाये , बिजली के क्षेत्र में कार्य कर रहे कामगारों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा मापदण्डों का कड़ाई से पालन किया जाये, ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधनों को निजी घरानों को सौपने की प्रक्रिया बंद की जाये , बिजली के क्षेत्र में निजीकरण / विनिवेश पूरी तरह बंद किया जाये तथा बिजली के अधिकार को मानवीय अधिकार बनाया जाये।

कमेटी का कहना है कि निजी घरानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से राज्य सरकारों, बिजली उपभोक्ताओं, बिजली कर्मचारियों और बिजली इंजीनियरों के विरोध के बावजूद केंद्र सरकार इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2014 को बजट सत्र में पारित कराने पर आमादा है। इसके खिलाफ संघर्ष को विशाल रूप देने के लिए सभी प्रदेशों में सम्मेलन करके जनजागृति अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने 20 सालों से तथाकथित सुधारों के नाम पर चल रहे प्रयोगों की कड़ी निंदा करते हुए अफसोस जताया कि केंद्र और प्रदेश सरकारों की निजी घरानों पर अति निर्भरता की ऊर्जा नीति के चलते आम लोगों के लिए बिजली महंगी होती जा रही है जबकि नए बिल के पारित होने के बाद जनता के पैसे से बने बिजली नेटवर्क के सहारे ही निजी घराने अरबों खरबों रुपए का मुनाफा कमायेंगे ।

शैलेंद्र दुबे ने कहा कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 बनाते समय बिजली बोर्डों का कुल घाटा जो 30000 करोड़ रुपए था, वह अब बढ़कर 04.14 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गया है जबकि देनदारियां (कर्ज) बढ़कर 5 .22 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गयी है। उन्होंने कहा कि देश में बिजली की कुल उत्पादन क्षमता 338000 मेगावॉट है जबकि बिजली की अधिकतम माँग इसकी आधी 158000 मेगावॉट है फिर भी देश के 05 करोड़ घरों में रहने वाले 30 करोड़ लोगों के पास बिजली नहीं है , गलत ऊर्जा नीति का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। उन्होंने कहा कि सरकार को यह भी समझना चाहिए कि 05 करोड़ घरों तक बिजली पहुंचाने की सौभाग्य योजना केवल सरकारी बिजली कम्पनियाँ ही पूरी कर सकती हैं इस मामले में मुनाफे के लिए काम करने वाले निजी घरानों की कोई रूचि नहीं है।

उन्होंने कहा कि इन विफलताओं से सबक लेने की बजाए केंद्र सरकार इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2014 को आगामी बजट सत्र में पारित कराने पर आमादा हैै। यदि यह बिल पारित हो गया तो बिजली आपूर्ति करने वाली निजी कम्पनियां मुनाफे वाले बड़े उपभोक्ताओं को बिजली देकर भारी मुनाफा कमाएंगी जबकि सरकारी क्षेत्र की बिजली आपूर्ति कंपनी ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों, गरीबों और आम उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति कर केवल घाटे में रहेगी। इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2014 के विरोध में देश के लगभग 20 प्रदेश अपनी राय दे चुके हैं किंतु केंद्र सरकार राज्यों की राय को भी अनदेखा कर रही है।

उन्होंने कहा कि बिजली बोर्डों का विघटन घाटे के नाम पर किया गया था किंतु विघटन के बाद लगातार बढ़ रहे घाटे से स्पष्ट हो जाता है कि सुधारों के नाम पर चल रही ऊर्जा नीति पूरी तरह विफल साबित हुई है। उन्होंने कहा कि रिलायंस ने मुंबई में बिजली के वितरण का अपना पूरा नेटवर्क अदानी पॉवर को 18800 करोड़ रु में सौंप दिया है जबकि रिलायंस ने 1452 करोड़ रु की इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी महाराष्ट्र राज्य को नहीं दी है। निजीकरण के नाम पर औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के अधिक राजस्व वाले शहरों के विद्युत वितरण को निजी फ्रेंचाइजी को सौंपा गया किंतु निजी घरानों की लूट की नीति के चलते यह प्रयोग भी असफल हो गया। औरंगाबाद, जलगांव, उज्जैन, ग्वालियर, सागर और भागलपुर के फ्रेंचाइजी समझौते रद्द किए जा चुके हैं।

नेशनल कोआर्डिनेशन कमीटी ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज एण्ड इंजीनियर्स (एन सी सी ओ ई ई ई ) की पूर्व विद्युत् मंत्री श्री पीयूष गोयल से इस बारे में वर्ष 2015 और 2016 में कई बार बात हुई। पूर्व विद्युत् मंत्री वार्ता में उठाये गए कई बिंदुओं से सहमत हुए थे और इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट ) बिल 2014 में तदनुरूप संशोधन करने की सहमति भी दी थी किन्तु केंद्र सरकार की ओर से आज तक कोई संशोधित प्रस्ताव नहीं आया है। अब ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य सरकारों , बिजली उपभोक्ताओं , बिजली कामगारों और बिजली इंजीनियरों के विरोध के बावजूद निजी घरानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार  इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट ) बिल 2014 को बजट सत्र में पारित कराने पर आमादा है , नेशनल कोआर्डिनेशन कमीटी ने ऐसे किसी भी जनविरोधी कदम का पुरजोर विरोध करने का निर्णय लिया है।

हाल ही में केंद्र सरकार की तरफ से जानकारी आई थी कि वह ​मौजूदा बिजली वितरण प्रणाली में व्यापक बदलाव करने जा रही है. इसके तहत बिजली आपूर्ति और वितरण नेटवर्क के कारोबार को अलग-अलग कर दिया जाएगा. इससे टेलीकॉम सेक्टर की तर्ज पर किसी एक इलाके में बिजली आपूर्ति की व्यवस्था के लिए एक से ज्यादा बिजली कंपनियां मौजूद रहेंगी. सरकार के अनुसार इससे उपभोक्ताओं के पास एक से ज्यादा विकल्प उपलब्ध होंगे और वे अपनी मर्जी से किसी भी कंपनी से बिजली खरीद सकेंगे. मोदी सरकार का दावा है कि इससे कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने से उपभोक्ताओं को सस्ती दर पर बेहतर सेवा मिलेगी. हालांकि एनसीसीओईईई ने केंद्रीय विद्युत् मंत्री को प्रेषित पात्र में सरकार के इन दावों को खारिज कर दिया है.

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