साथियों की हुई फांसी की सजा के विरोध में माओवादियों का दो दिवसीय बिहार-झारखंड बंद

16-17 अक्टूबर की घोषित बंदी के बाद माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में किसी भावी आशंका से लोग दहशत में हैं, जबकि इस बंदी में बिहार के 7 और झारखंड के 6 जिले बंद रहेंगे।...

अतिथि लेखक
साथियों की हुई फांसी की सजा के विरोध में माओवादियों का दो दिवसीय बिहार-झारखंड बंद

विशद कुमार

रांची, 15 अक्तूबर। प्रतिबंधित संगठन भाकपा माओवादी पार्टी ने दुमका की निचली अदालत द्वारा दो साथियों की सुनाई गई फांसी की सजा के विरोध में 16-17 अक्टूबर को बिहार-झारखंड बंद बुलाया है। इसकी जनकारी भाकपा माओवादी के पूर्वोत्तर झारखंड स्पेशल एरिया कमिटी के प्रवक्ता प्रतीक ने प्रेस विज्ञाप्ति जारी कर दी है, जिसको लेकर दोनों राज्य के प्रभावित जिलों में जहां दहशत का माहौल है, वहीं प्रशासन अपनी मुस्तैदी दिखाकर यह विश्वास दिलाने की कोशिश में है कि बंद सफल नहीं होने दिया जाएगा।

बताते चलें कि पाकुड़ के तत्कालीन एसपी अमरजीत बलिहार और उनके साथ पांच अन्य जवानों की हत्या के मामले में दुमका के चतुर्थ जिला एवं सत्र न्यायाधीश मो0 तौफीकुल हसन ने 27 सितंबर को प्रवीर दा और सनातन बास्की को फांसी की सजा सुनायी थी।

अमरजीत बलिहार की 2 जुलाई, 2013 को दुमका जिले के काठीकुंड थाना क्षेत्र के आमतल्ला में उस वक्त हत्या कर दी गयी थी, जब वे डीआइजी के साथ मीटिंग करके लौट रहे थे।

मामले पर चार साल तक चली बहस में एसपी अमरजीत बलिहार की हत्या के मुख्य आरोपी प्रवीर दा उर्फ सुखलाल मुर्मू के वकील ने कोर्ट से अपील की थी कि उनके मुवक्किल को मृत्युदंड न दिया जाय, इसके समर्थन में वकील ने कई दलीलें भी रखीं थी।

बचाव पक्ष के वकील मो राजा खान ने कोर्ट से कहा था कि उनके मुवक्किल की उम्र अभी मात्र 38 वर्ष है। वह 4 साल से जेल में है। इसलिए उसे एक मौका मिलना चाहिए।

बहस के दौरान वकील ने यह भी कहा था कि एसपी की हत्या किस हथियार से हुई, इसका अब तक खुलासा नहीं हो पाया है। हत्या में प्रयुक्त हथियार भी अब तक बरामद नहीं हुआ। ऐसे में उनके मुव्वकिल को मृत्युदंड की सजा नहीं दी जानी चाहिए।

बचाव पक्ष के वकील ने कोर्ट से कहा था कि एक जिंदगी पहले ही खत्म हो गयी है। दूसरी जिंदगी सामने है। कोर्ट को इस पर विचार करना चाहिए। कई दलीलों के क्रम में मो राजा खान ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने संतोष कुमार सिंह के मामले में कहा था कि जहां आजीवन कारावास और मृत्युदंड का प्रावधान है, वहां कोर्ट को आजीवन कारावास ही चुनना चाहिए।

तब अपर लोक अभियोजक सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा ने अभियोजन पक्ष की ओर से बहस में कहा था कि उम्र का बचाव सही नहीं है, क्योंकि कम उम्र में ही लोग ज्यादा अपराध करते हैं। एसपी ने कोई सर्च ऑपरेशन नहीं किया था, बल्कि दुमका से मीटिंग करके जा रहे थे। इसलिए इन दोनों को मृत्युदंड देना चाहिए। इस पर कोर्ट ने कहा कि प्रवीर न तो जवान है, न ही बूढ़ा। पहले आइपीएस को मार डाला। कल वकील को मारेगा, फिर परसों जज को मारेगा।

इतना ही नहीं चतुर्थ जिला एवं सत्र न्यायाधीश तौफिकुल हसन ने फैसला सुनाते हुये कहा था कि इन्हें फंदे से तबतक लटकाया जाये, जबतक उनकी मृत्यु न हो जाये। जिसे सुनकर पूरी अदालत में पूरा सन्नाटा छा गया था।

बता दें कि प्रवीर दा और सनातन बास्की को फांसी की सजा सुनाये जाने बाद भाकपा माओवादी पार्टी ने दुमका जिला के शिकारीपाड़ा में पोस्टर साटकर दोनों साथियों की रिहाई की मांग की थी और 5 सितंबर को झारखंड बंद भी बुलाया था।

सरसडंगाल में नक्सलियों ने ट्रक, बिजली के पोल और कुछ मकान की दीवारों पर पोस्टर साट कर झारखंड को लालखंड में तब्दील कर देने की घोषणा भी की थी। जिसके कारण माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सन्नाटा पसरा रहा था।

बंदी की पोस्टरबाजी के बाद से शिकारीपाड़ा के पत्थर औद्योगिक क्षेत्र में बंद का व्यापक असर  रहा। इलाके में पुलिस गश्ती के बावजूद क्रशर और पत्थर खदान में उत्पादन और ढुलाई का काम ठप रहा। सभी पोस्टर को पुलिस ने जब्त कर लिया है।

वैसे ही 16-17 अक्टूबर की घोषित बंदी के बाद माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में किसी भावी आशंका से लोग दहशत में हैं, जबकि इस बंदी में बिहार के 7 और झारखंड के 6 जिले बंद रहेंगे। इसकी घोषणा माओवादियों ने की है।

भाकपा माओवादी के पूर्वोत्तर झारखंड स्पेशल एरिया कमिटी के प्रवक्ता प्रतीक ने अपने प्रेस रिलीज में बताया है कि बंद का प्रभाव बिहार के जमुई, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, नवादा, बांका, भागलपुर में रहेगा तो झारखंड़ के गिरिडीह, दुमका, देवघर, कोडरमा और पाकुड़ में रहेगा।

बता दें कि बंद का प्रभाव पहले से ही गिरिडीह के पारसनाथ पहाड़ के मधुवन में दिखने लगा है। पहले ही इस क्षेत्र में सन्नाटा पसरा हुआ है।

बैसे तो बोकारो जिला बंद से मुक्त है, बावजूद जिला प्रशासन काफी चुस्त दिख रहा है। पुलिस के एक आला अधिकारी की मानें तो जिला प्रशासन कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं है, क्योंकि बोकारो जिले का शहरी भाग को छोड़कर सारे क्षेत्र माओवाद प्रभावित हैं तथा इसे बंद से मुक्त करने के पीछे प्रशासन को माओवादियों की कोई चाल लगती है।

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