औरत मर्द का रिश्ता भी आर्थिक प्रबंध से निर्धारित हो रहा, इस दुश्चक्र को समझना भी जरूरी है और तोड़ना भी

दक्षिणी एशिया की महिलाएं और उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ...चौराहे पर खड़ी दक्षिण एशियाई औरत...युवा आवाज़ : महिलायें आज क्या चाहती हैं और भविष्य का रास्ता...रसोई से नासा तक: महिलाओं का शिकार...

हाइलाइट्स

दक्षिणी एशिया की महिलाएं और उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ

चौराहे पर खड़ी दक्षिण एशियाई औरत

युवा आवाज़ : महिलायें आज क्या चाहती हैं और भविष्य का रास्ता

इस्लाम को मुल्लाह ने हाई जैक कर लिया

रसोई से नासा तक: महिलाओं का शिकार

दूसरी दुनिया बनाना संभव है, इसे हमें खुद ही बनाना होगा - दिशा का दूसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

शमशाद इलाही शम्स

वरिष्ठ सम्मानित साहित्यकार वरयाम सिंह संधू ने अपने जीवन के किस्से को ब्यान करते हुए बताया कि एक बार उन्हें परिजनों मित्रों ने महिला का वेश भरा कर परिवार में घुमा दिया। वह एक सुन्दर स्त्री के वेश में सुन्दर लग रही थी, बड़े बुजुर्गो में कुछ एक ने आशीर्वाद दिया और शगुन भी। एक परिजन ने उन्हें ऐसी लालसा के साथ देखा कि उनके अन्दर की स्त्री, उस हवस की नज़र की तपिश को आज तक महसूस करती है। अगर कुछ ख़त्म होना चाहिए तो यही वह नज़र है जिसे मर्द किसी औरत के प्रति रखता है। हर मर्द के अन्दर एक औरत भी है। उस औरत का आभास अगर मर्द को हो जाये तो स्त्री पर मर्द के ज़ुल्म बंद हो सकते हैं।

वरयाम सिंह संधू दिशा संस्था द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन के अंतिम दिन 18 जून 2017 की शाम ब्राम्पन स्थित वोडन रिक्र्येशन सेंटर के एक हाल में शाम सवा सात बजे जब बोल रहे थे तब 100 से अधिक उपस्थित जनसमूह ने तालियां बजा कर उनके कथन का ऐसे स्वागत किया जैसे उनके ही दिल की बात हो।

16 जून 2014 के बाद दिशा नेत्री प्रोफ़ेसर कँवलजीत ढिल्लो के नेतृत्व में "दक्षिणी एशिया की महिलाएं और उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ" नाम से होने वाले दो दिवसीय सम्मलेन का आगाज 17 जून 2017 की सुबह हुआ था, जिसमें नौ देशों से आये पंजाबी, हिन्दी, अंग्रेजी के लेखक, प्राध्यापक, पत्रकार, राजनीतिज्ञ, दिग्गज कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

पूरे सम्मेलन में दो दिन की लगभग 17 घंटों की कार्रवाई में 32 अकादमिक स्तर के पेपर्स 80 से अधिक वक्ताओं ने पढ़े और अपने तजुर्बे सांझा किये। सम्मेलन के दौरान दो नाटकों, तीन लघु फिल्मों के प्रदर्शन के साथ सैंडी गिल की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी थी तो चित्रकार परवीन ने हाल में ही पेंटिंग्स बना कर सम्मलेन में शिरकत करने आये लगभग 500 लोगों ने बौद्धिक आनंद लिया।

दिशा का दूसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनप्रगतिशील साहित्य की प्रदर्शनी तर्कशील सोसाइटी के कार्यकर्ताओं ने लगा कर माहौल में और चार चाँद लगा दिए।

सम्मेलन के मुशायरा सत्र में एक दर्जन से अधिक कवियों ने अपनी काव्य धारा से लोगों का मनोरंजन भी किया।

कुल मिला कर दो दिनों तक चलने वाले इस सम्मेलन में समाज के चिंतनशील प्रवाह को बनाये रखने वाले तबके ने किसी पर्व की भांति बढ़-चढ़ कर उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। यदि कार्यक्रम का आरंभ सवा दस बजे होना प्रचारित हो और हाल में लोग नौ बजे ही आना शुरू हो जाएँ तब कुछ अधिक कहने लिखने की गुंजाईश नहीं रहती।

भारतीय परम्पराओं के अनुसार समारोह की शुरुआत दीपक जला कर की गयी, इस संयुक्त प्रयास में प्रोफेसर शीला एम्बलेटन, जीन अगस्टीन, भारतीय दूतावास से डिप्टी कौंसल सैफुल्लाह खान, पाकिस्तानी दूतावास से उनके समकक्षी ख़दीजा हयात खान, कँवलजीत ढिल्लो शामिल थे। उसके बाद पहले सेशन का आगाज हुआ जिसकी मंचीय जिम्मेदारी अरूज राजपूत आरूज ने संभाली।

जीन अगस्टीन ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कनाडा की 1960 के दशक की सामाजिक, राजनीतिक स्तिथियाँ विस्तार से बता कर हैरान किया और मौजूदा बदलाव के पीछे चले संघर्षों का हवाला देकर आगाह किया की महिला उत्थान की मंजिल अभी भी दूर है इसलिए संघर्ष जारी रखना है। इस सत्र के अन्य वक्ताओं में नुजहत सईदा सिद्दीकी, प्रोफ़ेसर अरुण प्रभा मुकर्जी, ओंटेरियो सरकार में मंत्री इंदिरा नायडू हैरिस, लिबरल सांसद सोनिया सिधु, कौंसलर गुरप्रीत आदि ने अपने विचार रखे।

दिशा का दूसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनख़दीजा हयात ने कहा कि उनका धर्म औरत को सामान अधिकार देने की वकालत करता है तो सैफुल्लाह खान ने हिदायत दी कि औरत मर्द में समानता का पहला अध्याय खुद अपने घर से शुरू करना होगा। इं

दिरा नायडू हेरिस ने कैथलीन वीन हकुमत द्वारा महिला उत्थान के लिए की जाने वाली कवयादतो को दोहराया और उनका संदेश भी पढ़कर सुनाया।

चौराहे पर खड़ी दक्षिण एशियाई औरत

दूसरा सत्र "चौराहे पर खड़ी दक्षिण एशियाई औरत" में कई महत्वपूर्ण खुलासे हुए। श्रीलंका की डाक्टर पार्वती कन्थासामी ने भारतीय शांति सेना की तमिलों के प्रति की गयी तमाम क्रूरताओं का हवाला दिया और बताया कि उन आठ सालों के गृह युद्ध में महिला ने ही सबसे अधिक ज़ख्म खाए हैं तो बंगला देश की मिनारा बेग़म ने बाग्लादेश की आजादी के उन नौ खूनी महीनों की तफसील दी जिसमे 30 लाख लोग मारे गए और 90,000 बच्चे युद्ध के बाद अनाथ हुए। मीनार बेगम ने मौजूदा बंगलादेश में चल रही कट्टरपंथी मज़हबी जेहादी सियासत को प्रगतिशील शक्तियों का शत्रु बताया।

बांग्लादेश के ही अन्य वक्ता हसन महमूद ने कहा कि धार्मिक समस्याओं का समाधान धर्म से ही लिया जाना चाहिए।

दिशा का दूसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलननेपाल के प्रतिनिधि की हैसियत से रश्मि थापा मोगर ने नेपाली हिन्दू राजशाही के विरुद्ध जनवादी शक्तियों के प्रतिरोध और उसकी सफलता की दास्ताँ सुनाई और कहा कि लड़ाई अभी भी जारी है। राजशाही की विदाई के बाद नेपाली महिला को बहुत कुछ मिला है लेकिन स्थिति अभी भी संतोषप्रद नहीं है।

पाकिस्तानी प्रतिनिधि अरह मालिक ने होनर किलिंग को सामंती मूल्यों का सांस्कृतिक रोग बताया यह रोग प्राचीन इंका सभ्यता से लेकर वर्तमान में भी है।

कुलविंदर खेरा ने भारतीय महिला की दशा दिशा का हवाला देने से पहले कनाडा में महिलाओं की स्थिति और उनके इतिहास को विस्तार से बताया।

युवा आवाज़ : महिलायें आज क्या चाहती हैं और भविष्य का रास्ता

सम्मेलन के पहले दिन की उपलब्धि इसका तीसरा सत्र था युवा आवाज़ : महिलायें आज क्या चाहती हैं और भविष्य का रास्ता।

इस सत्र में युवा महिलाओं ने अपने विचार इतनी मजबूती से रखे कि पूरा सम्मेलन इस बात पर एक मत था कि वर्तमान भले ही कैसा हो लेकिन भविष्य सुरक्षित है।

लंदन से आयी निक्की सिंह ने होरर फिल्मों में महिलाओं की बदली स्थिति पर बहुत ज़बरदस्त आकलन पेश किया तो स्थानीय छात्रा नवनीत औजला ने रोजगार दिलाने वाली संस्थाओं और ऐसी नौकरियों की स्थिति का आर्थिक मूल्यांकन किया,परम सरम ने मानसिक स्वास्थ्य पर अच्छा व्यक्तव्य दिया तो सुमीत सोह्टा ने मानव तस्करी में हो रही शिकार लड़कियों का जिक्र करके सबको हैरान किया।

जूही, अनूप बाबरा, हरजोत कौर ने भी सामाजिक, घरेलू परिशानियों को एक लड़की की नज़र से शानदार जुबान दी लेकिन टोरोंटो से आई युवा एक्टिविस्ट साराह अली ने इस्लामोफोबिया का पोस्टमार्टम करते हुए जिस तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद के परखच्चे उड़ाये उससे स्पष्ट हो गया कि नौजवान तबके में बेहतर राजनीतिक समझ के लोगो की भी कमी नहीं।

सीरियन पनाह्गुजीरों में काम करने वाली रीता चाहल ने कहा कि दुनिया में इस वक्त साढ़े छह करोड़ रिफ्यूजी है जिनमें महिलाओं की स्थिति सबसे बदतर है।

गुरबानी में महिला का स्थान

चौथे सत्र को महिला साहित्य और समाज के नाम समर्पित किया था जिसमे डाक्टर मंजीत सिंह ने गुरबानी में महिला का स्थान विषय पर आख्यान दिया।

जसपाल कौर ने प्रवासी कविता में महिला की छवि पर अपने विचार रखे।

डाक्टर शैलजा सक्सेना ने हिन्दी साहित्य में महिला का स्थान पर अपने ख्यालों से रू-ब-रू कराया।

अमिया कवर परमजीत सिधु ने भी साहित्य संबंधी अपने पेपर पढ़े।

पहले दिन के आख़िरी सत्र में मुशायरा हुआ जिसमें भारत, पकिस्तान मूल के शायरों ने अपने कलाम से नवाज़ा।

दूसरे दिन के प्रथम सत्र की पहली वक्ता डाक्टर बलविंदर कौर ने वर्तमान पंजाबी साहित्य में महिलाओ के साहित्य को वाम विचारधारा के निकट विचरते हुए चिन्हित किया।

हम्बर कालिज की प्रवक्ता जसप्रीत बल ने पंजाबी पॉप म्यूजिक की प्रथम बीस एलबम्स पर अपनी तीखी टिप्पणी प्रस्तुत की जिसे अस्सी लाख से अधिक लोगो ने पंसद किया, ताज्जुब की बात यह नोट की गयी कि इन गानों में सिर्फ एक में महिला का योगदान निर्माण क्षेत्र में था जबकि सभी गानों में प्रमुख उत्पाद सिर्फ और सिर्फ औरत ही दिखाया गया है जिसे पूंजीवादी संस्कृति की विद्रूपता ही कहा जा सकता है।

कहानीकार सुखपाल ने इस मौके पर तीन मार्मिक लघु कथायें सुनाईं जिनमें से एक कहानी का पात्र लाल्ली एक फैक्ट्री में काम करता हुआ बेसमेंट में रहता है। एक के बाद एक नौ कनेडियन पंजाबी लड़कियाँ उससे शादी करने का प्रस्ताव ठुकराती हैं। रिश्ते वाले कहते हैं कि वह ट्रक क्यों नहीं चला कर अपनी आमदनी बढ़ा लेता, आखिर अपना मकान कैसे खरीदेगा। लाल्ली कहता है मुझे ट्रक नहीं चलाना, बेसमेंट में रहने में क्या बुराई है ? शादी के बाद मैं अपना वक्त अपनी बीवी और बच्चो के साथ बिताना चाहता हूँ। आखिरकार वह भारत जाकर 39 वर्ष में 24 साल की लड़की से शादी करता है।

सुखपाल कहते हैं कि औरत मर्द का रिश्ता भी आर्थिक प्रबंध से निर्धारित हो रहा है, इस दुश्चक्र को समझना भी जरूरी है और तोड़ना भी

इस्लाम को मुल्लाह ने हाई जैक कर लिया

समीना तबस्सुम ने अपने खिताब में कहा कि इस्लाम को मुल्लाह ने हाई जैक कर लिया है जिसका असली इस्लाम से कोई नाता नहीं है। पाकिस्तान में मज़हबी कट्टरपंथ के मज़बूत होने के बावजूद असाधारण रूप में कई महिलायें फिल्मों, पत्रकारिता, फैशन आदि क्षेत्रों में मजबूती से आगे बढ़ रही हैं, जिसे आशा की किरण समझा जा सकता है।

रसोई से नासा तक: महिलाओं का शिकार

दूसरे दिन के दूसरे सत्र में रसोई से नासा तक: महिलाओं का शिकार नामक सत्र में इंग्लैंड से आयी डाक्टर अमर ज्योति ने प्रवासी भारतीय समुदाय में समलैंगिकों की स्तिथि पर गहरी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय समुदाय इस प्रश्न पर दकियानूसी रवैय्या ही अपनाता है चाहे वह भारत में हो या इंग्लैंड या अमेरिका में।

अमर ज्योति ने समलैंगिको के अधिकारों को स्वीकार करने की पुरजोर वकालत की।

इरानी एक्टिविस्ट और भारत में यूनिसेफ के तहत लंबे समय तक काम करने वाली नीलोफ़र पौर्जंद ने उत्तर प्रदेश में लड़कियों के हवाले से महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए कहा कि भारतीय समाज में जाति भी एक प्रमुख समस्या है, दलित वर्ग की लड़कियाँ दूसरे वर्ग के अपेक्षाकृत अधिक असुरक्षित हैं, उनके प्रति हिंसा और बलात्कार के मामले अधिक होते हैं।

न्यूयार्क से आयी प्रोफ़ेसर किरण माथुर ने इस अवसर पर न्यूयार्क में दक्षिण एशियाई समुदाय के लिए बनी संस्था सखी के प्रयोग और उससे जुड़े अपने तजुर्बों को साझा करते हुए कहा कि भारतीय समुदाय डिनायल की स्थिति में है वह धरेलू हिंसा, लड़कियों के प्रति अपने दकियानूसी ख्यालात , लड़कियों की जबरन अरेंज मैरिज जैसी समस्याओ पर बात करना ही नहीं चाहता।

घरेलू हिंसा के प्रति सबसे शक्तिशाली ढंग से अरुणा पेप ने रखा। लड़की के प्रति भारतीय समाज के नज़रिए की तीव्र शब्दों में भर्त्सना करते हुए उन्होंने कहा कि वक्त आ गया है कि लड़की को लड़के के बराबर ही समझा जाए और घरेलू हिंसा क्योकि सबसे पहले बाप से शुरू होती है इसलिए इसका विरोध भी सबसे पहले वही से किया जाना चाहिए न कि सुसराल या पति से। अरुणा पेप ने दिशा का आह्वान किया कि वह कनाडा में बसे दक्षिणी एशियाई समाज में बढ़ रही आत्महत्याओं और घरेलू हिंसा पर मजबूती से काम करे।

इसी सत्र में लेखिका फरजाना हसन ने इस्लामी समाज में महिलाओ के हकूक, तलाक और जायदाद में हिस्सेदारी जैसे प्रश्नों पर अपनी खामोशी तोड़ कर सवाल करने की पुरजोर वकालत की। इस सत्र के बाद हिन्दी राइटर्स गिल्ड के सदस्यों द्वारा भीष्म साहनी के नाटक ' चीफ की दावत' और परमिंदर स्वाच द्वारा लिखित अभिनीत नाटक 'वोटो दा तैय्या ' भी खेला गया। हेलेन मिरेन की तीन लघु चल चित्रों को भी दिखाया गया जिसमें समान वेतन, बाल विवाह और गर्भ संबंधी समस्याओं को दिखाया गया है।

चौथे सत्र में टोरोंटो से आयी जीन मैक गुएयर ने दिशा के उत्साहित और प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए रूस की क्रांति के 100वे वर्ष पर सभी को बधाई दी। उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि दुनिया में पहली बार महिला मुक्ति के बीज लेनिन ने बोये थे, उन्हें पुरुषों के समान वेतन, वोट का अधिकार, मातृत्व अवकाश, काम के घंटों में रियायत जैसी सुविधाएँ पहली बार सोवियत रूस में दी गयीं, ऐसे अधिकार पश्चिमी देश फ़्रांस में 1942 में दिए गए। रूसी क्रांति के फलस्वरूप पूरी दुनिया में मजदूरों को पूंजीपति वर्ग ने सुविधाएं दी। 1991 में सोवियत संघ के विलुप्त हो जाने के बाद शासक वर्ग ने मजदूर वर्ग को दी जाने वाली सुविधाओं को अब सिकोड़ना शुरू कर दिया है जिसका जवाब सिर्फ एक है कि वापस मजदूर शक्ति को संगठित होकर राजनीतिक शक्ति प्राप्त करनी होगी जैसे रूसी क्रांति के बाद 1917 में हुआ था।

कम्युनिस्ट पार्टी आफ कनेडा की नेत्री लिज़ रोले ने इस अवसर पर कहा कि कनेडा की सरकार जिस रास्ते पर चल रही है वह महिलाओं, बच्चों और मेहनतकश आवाम के लिए खतरनाक है। लिबरल ट्रूडो सरकार ने रक्षा बजट में 70 फीसदी वृद्धि कर कनेडा को युद्धोन्मादी देश बनाने पर कदम बढ़ा लिए हैं। कनेडा की फौजें पहले ही सीरिया, ईराक, लीबिया, अफ़ग़ानिस्तान, लात्विया जैसे मुल्को में मौजूद हैं। कनेडा अमेरिका के रास्ते पर चल रहा है, यह काम हार्पर सरकार ने शुरू किया था जिस पर अब ट्रूडो सरकार भी अमल कर रही है। हार्पर सरकार द्वारा प्रस्तावित विवादस्पद बिल सी -51 लाया गया था जिसे ट्रूडो सरकार अब कानून बनाना चाहती है। इस कानून के बनने के बाद पुलिस किसी भी शख्स को सिर्फ शक की बिना पर मनचाही मुद्दत के लिए जेल में डाल सकती है। हम चाहते हैं कि मजदूर विरोधी एजेंडे को सरकार वापस ले और आवाम की दुःख तकलीफे दूर करने वाली नीतियाँ शुरू करे ताकि लोगों का जीवन सुखी हो, वेतन में असमानता दूर हो, न्यूनतम मजदूरी की दरे बढे, कोरपोरेट ताकतों का वर्चस्व सरकार से ख़त्म हो। सभी को स्वास्थ्य सेवाएं मिले, सस्ते मकान मुहैय्या हो लेकिन यह हकुमत युद्ध में पैसा लगा कर हम सभी की तकलीफे और बढाने का काम कर रही है। जनता की एकता और उसका संघर्ष ही यह काम कर सकता है। उन्होंने कहा दूसरी दुनिया बनाना संभव है, इसे हमें खुद ही बनानी होगी।

इस अवसर पर इस सम्मेलन को सपोर्ट करने वाले जी टी ए वेस्ट कल्ब कम्युनिस्ट पार्टी आफ कनाडा, इंडो कनेडियन वर्कर्स ऐसोसिएशन, कलमा दा काफिला, हिन्दी लेखक संघ, तर्कशील सोसाइटी, सीनियर्स कल्ब, पंजाबी साहित्य सभा आदि जन संगठनो के कारकून भी उपस्थित थे। दिशा के अन्य कार्यकर्ताओं ने भी अपने विचार साझा किये, जिनमें प्रमुख नाम सुरजीत कौर, कमलजीत नट , बलजीत, परमजीत दियोल, डाक्टर विनीता, गुरमीत कौर है। संदली, मंजीत कौर ने मंच सज्जा , व्यवस्था में मुख्य भूमिका निभाई।   

सम्मेलन के अंत में दिशा ने अपना मांग पत्र भी जनता के सामने रख कर उसका अनुमोदन प्राप्त किया जिनमे प्रमुख मांगे निम्न हैं:

1. समग्र, संतुलित विकास का रास्ता सरकार अपनाए।

2. कोई प्रवासी गैर कानूनी नहीं है।

3. मिनिमम वेज़ 15 डालर तुरंत लागू की जाए

4. युद्ध के बजाए सरकार अस्पताल, सड़कों, भवनों, स्कूलों का निर्माण करे।

5. विदेशी छात्रों को प्रवास संबंधी कानूनों में रियायत हो।

6. सभी स्कूलों में एक प्रकार की धर्म निरपेक्ष शिक्षा दी जाये, धर्म आधारित स्कूलों को सरकारी मदद न दी जाये।

7. सरकारी पदों पर महिलाओं को 50% सीटे आरक्षित की जाएँ।

8. सरकार किसी भी धर्म विशेष को उसकी पहचान के आधार पर प्रश्रय देना बंद करे।

9. मूल निवासियों की समस्याओं का तत्काल निवारण हो, गुमशुदा मूलनिवासी महिलाओ के मामले में जांच तेज हो और दोषियों को सख्त सजा मिले। मूल निवासियों को मुख्यधारा में लाने संबंधी कार्यक्रम तेजी से व्यवहार में लाये जाए आदि।

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