सपा में और तेज हुई वर्चस्‍व की लड़ाई : अपमानित शिवपाल फिर गरजे

समाजवादी दंगल जारी है। पार्टी में वर्चस्व को लेकर खिंची तलवारें म्‍यान में जाती दिख नहीं रही हैं। ...

देशबन्धु
हाइलाइट्स
  • विवाद : सपा में और तेज हुई वर्चस्‍व की लड़ाई
  • 'समाजवादी दंगल' में शिवपाल को एक और पटखनी
  • -अपमानित शिवपाल फिर गरजे, नेताजी को अध्‍यक्ष पद की वापसी पर ही अखिलेश से समझौता

रतिभान त्रिपाठी

लखनऊ, 30 जून : समाजवादी दंगल जारी है। पार्टी में वर्चस्व को लेकर खिंची तलवारें म्‍यान में जाती दिख नहीं रही हैं। समाजवादी पार्टी के अध्‍यक्ष अखिलेश यादव के तेवर और तौर-तरीके देखते हुए वे नेता भी उनके चाचा और साल भर पहले तक दूसरे नंबर के ताकतवर नेता रहे शिवपाल सिंह यादव का अपमान करने पर उतारू हो गए हैं, जो चंद दिन पहले तक शिवपाल की परिक्रमा करते थे। इसकी बानगी सैफई के उस समारोह में देखने को मिली जहां सांसद नरेश अग्रवाल को यह कहते सुना गया कि कौन शिवपाल, मैं किसी शिवपाल को नहीं जानता।

सूत्र बताते हैं कि वर्चस्‍व की जंग के बीच पार्टी महासचिव राम गोपाल यादव का जन्‍मदिन समारोह अखिलेश यादव की ही पहल पर बड़े उत्सव के रूप में तब्‍दील किया गया। मकसद यही बताया जाता है कि शिवपाल यादव के मुकाबले राम गोपाल की हैसियत बड़ी साबित की जा सके। पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाई गई थी। समारोह में पार्टी के सिर्फ दो प्रमुख नेता नहीं थे। एक सपा के संस्‍थापक मुलायम सिंह यादव और दूसरे शिवपाल सिंह यादव।

समारोह में हरदोई के नेता नरेश अग्रवाल अपने विधायक बेटे नितिन अग्रवाल के साथ पहुंचे थे। मीडिया ने शिवपाल को लेकर जब उनसे सवाल पूछा तो उनका जवाब हैरान कर देने वाला था। नरेश ने कहा कि वह शिवपाल यादव को नहीं जानते हैं। उन्‍हें सिर्फ मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद है। गौरतलब है कि यह वही नरेश अग्रवाल हैं जो शिवपाल यादव का दर्शन पाने के लिए उनका घंटों इंतजार किया करते थे।

 इस तरह की बयानबाजी से मर्माहत शिवपाल यादव भी अपने को रोक नहीं पाए। बहाने से ही सही, राजधानी लखनऊ में एक कार्यक्रम में उन्‍होंने फिर अखिलेश यादव पर हमला कर दिया। शिवपाल ने कहा कि वह अखिलेश यादव के साथ सिर्फ एक शर्त पर समझौता करने को तैयार हैं और वह शर्त है नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव को अध्‍यक्ष पद लौटाने की। शिवपाल यादव ने कहा कि जिस तरह से नेताजी का अपमान किया गया उसके बाद अखिलेश यादव के तमाम विकास के काम फीके पड़ गए।

उन्होंने कहा कि नेताजी के सम्मान से बड़ी विरासत उनके पास और कुछ भी नहीं है। वह नेताजी के सम्मान की खातिर अपना सब गंवाने तो तैयार हैं। अखिलेश ने कहा था कि तीन महीने बाद नेता जी को अध्यक्ष पद सौंप देंगें। वह अब भी चेत जाएं। इंसान को अपनी जुबान पर भरोसा करना चाहिए। बात विवाद तो परिवार,पार्टी में होता रहता है। आपस मे बैठ कर बात कर लेनी चाहिए। हमने तो सिर्फ यही विरोध किया था कि जो लोग सरकार और पार्टी संगठन में है वह गलत काम न करें, जिससे सरकार और पार्टी की छवि खराब हो। शिवपाल ने कहा कि सबका सम्मान होता तो प्रदेश में सपा की सरकार बनी होती। नेताजी का अपमान करने की वजह से अखिलेश यादव का सारा विकास का काम फीका पड़ गया। इसी वजह से अखिलेश को हार का सामना करना पड़ा। शिवपाल यहीं नहीं रुके। कहा, अखिलेश यादव घमंडी हैं, चापलूसों और कानाफूसी करने वालों की बात में आकर नेताजी का अपमान किया।

इस बयानबाजी के बाद माना यह जा रहा है कि अखिलेश यादव जल्‍द ही कोई पलटवार करेंगे या शिवपाल पर कार्रवाई करेंगे। इस मसले पर मुलायम सिंह यादव ने फिलहाल चुप्‍पी साध रखी है। वैसे राष्‍ट्रपति चुनाव को लेकर पिता-पुत्र की राह सार्वजनिक तौर पर अलग अलग दिख रही है। अखिलेश यादव ने भले ही अपने पिता मुलायम सिंह यादव को पार्टी का संरक्षक बना रखा हो लेकिन वह उनकी बात मानने को तैयार नहीं हैं। अगर ऐसा न होता तो मुलायम सिंह ने जिस तरह से राष्‍ट्रपति पद के उम्‍मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की बात कह दी, उसके बाद अखिलेश यादव ने पार्टी का फैसला विपक्ष की उम्‍मीदवार मीरा कुमार के पक्ष में जाने लिया। यानी पार्टी में वर्चस्‍व की लड़ाई तेज हुई है और अखिलेश यादव अपनी ही राह चल रहे हैं।

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