मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते, यह बात वे कहते हैं जो धर्म की राजनीति का व्यापार करते हैं... शिक्षा का सांप्रदायिक चरित्र नहीं होता

मोहम्मद अली जिन्ना के चित्र पर उठे विवाद के बीच जामिया मिलिया इस्लामिया के संस्कृत विभाग ने पहला शैक्षणिक सत्र पूरा कर लिया है...

मोहम्मद अली जिन्ना के चित्र पर उठे विवाद के बीच जामिया मिलिया इस्लामिया के संस्कृत विभाग ने पहला शैक्षणिक सत्र पूरा कर लिया है

हकीकत में शिक्षा का सांप्रदायिक चरित्र नहीं होता। उसे सांप्रदायिकता के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। हम धर्मनिरपेक्षता का दावा करते हैं तो उस स्थिति में शिक्षा के प्रति भी धर्मनिरपेक्ष दृष्टि होनी चाहिए।

मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते, यह बात वे कहते हैं जो धर्म की राजनीति का व्यापार करते हैं। जबकि पिछले 500 सालों में सैंकड़ों मुस्लिम विद्वानों ने संस्कृत में खूब साहित्य रचा है। अब्दुल रहीम खानखाना समेत अनेक विद्वानों ने संस्कृत में कई ग्रंथ लिखे हैं। 

 - शास्त्री कोसलेन्द्रदास -

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे मोहम्मद अली जिन्ना के चित्र पर उठे विवाद के बीच खबर है कि जामिया मिलिया इस्लामिया के संस्कृत विभाग ने पहला शैक्षणिक सत्र पूरा कर लिया है। जामिया में पहली बार संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन शुरू हुआ। वेद, रामायण, गीता के श्लोक जामिया में पूरे साल पढ़े गए। महाकवि कालिदास और दंडी के काव्यों का मनन और निदिध्यासन हुआ। 11 शोधार्थी विभाग में पीएचडी के लिए पंजीकृत हुए।

जामिया का इतिहास पुराना है। इसकी स्थापना 1920 में अलीगढ़ में हुई। फिर यह दिल्ली में स्थापित हो गई। राजीव गांधी की सरकार ने संसद के विधेयक से 1988 में जामिया को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया। उर्दू भाषा में ‘जामिया’ शब्द का मतलब विश्वविद्यालय है। इसलिए यह सवाल जायज है कि एक विश्वविद्यालय जैसी बड़ी शैक्षणिक संस्था में संस्कृत की पढ़ाई शुरू होने में आखिर 30 साल क्यों लगे? इस कमी को कुलपति प्रो. तलत अहमद ने समझा। उन्होंने जामिया को संस्कृत से जोडऩे की ऐतिहासिक पहल की। जिसके तहत संस्कृत विभाग खोला गया, जिसमें 4 शिक्षकों की नियुक्ति हुई। 

हिंदुओं के आधार ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे वेद हैं, जिन पर उनका अटल विश्वास है। बाइबिल, कुरान, जेंद-आवेस्ता और त्रिपिटक आदि सारे धर्मग्रंथ प्राचीनता में वेदों से बराबरी नहीं करते। इसी से अन्य धर्मावलंबी व इतिहासकार वेदों को बड़े आदर की दृष्टि से देखते हैं। मुसलमान उलेमाओं का मानना था कि ब्रह्मांड का सारा ज्ञान ‘कुरान’ में है। इसलिए लोगों को कल्याण के लिए कुरान को स्वीकार करना चाहिए। प्राचीन बात है कि एक मुस्लिम बादशाह ने अलेग्जेंड्रिया के विश्वविख्यात पुस्तकालय को जला दिया था। उससे लोगों ने उनके पुस्तकालय को छोड़ देने की प्रार्थना की तो उसने कहा कि इस पुस्तकालय के लाखों ग्रंथों में जो ‘ज्ञान’ है, वह अकेली ‘कुरान’ में है। सच्चे ज्ञान की कोई बात कुरान से अलग नहीं है। कोई ऐसी बात जो इन ग्रंथों में हो और कुरान में नहीं हो तो वह सच्चे ज्ञान की बोधक नहीं है। अत एव इन ग्रंथों की कोई आवश्यकता नहीं है। इन सबका काम अकेले कुरान शरीफ से हो जाता है। परिणामत: कई पुस्तकालय जला दिए गए।

जयपुर पर मुसलमान बादशाहों की ‘दया’ थी, इसलिए यहां के वेद-भंडार ‘पलीता’ लगने से बच गए

कश्मीर के संस्कृत कवि कल्हण ने 1148 ईस्वी में लिखे ‘राजतरंगिणी’ में ग्रंथालय जलाने का मार्मिक वर्णन किया है। इस प्रकार संस्कृत के ज्ञान स्रोत का बड़ा अंश नष्ट हो गया। वेदों की अनेक शाखाएं लुप्त हो गई। ढाई हजार साल पहले हुए महर्षि पतंजलि के ‘महाभाष्य’ के अनुसार ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1000 तथा अथर्ववेद की 9 शाखाएं उनके वक्त प्रचलित थी। अब इनमें मुश्किल से 10 शाखाएं भी जीवित नहीं है। इन शाखाओं को बचाने के लिए अंग्रेजों ने भरसक कोशिश की थी। अंग्रेजों को जब वेद-ग्रंथों की चाहत हुई तब उन्हें वेदों की प्राचीनतम प्रति जयपुर से मिली। जयपुर पर मुसलमान बादशाहों की ‘दया’ थी, इसलिए यहां के वेद-भंडार ‘पलीता’ लगने से बच गए।

1779 ईस्वी में कर्नल पोलियर ने जयपुर से चारों वेदों की नकल करवाई। एक वर्ष के कठिन परिश्रम से नकल तैयार हुई। पर पोलियर ने समझा कि यह नकल गलत है इस कारण उन्होंने इसे उस समय के प्रसिद्ध पंडित राजा आनंदराम को वह नकल दिखवाई। उन्होंने उस नकल को सही बताया। तब जाकर वह लंदन के ‘ब्रिटिश म्यूजियम’ में रखी गई, जहां वे आज भी सुरक्षित हैं। इस प्रकार वेद-शास्त्र यूरोप तक पहुंचे। इन वेदों को जामिया में पढ़ाने का काम शुरू होना ऐतिहासिक घटना है। शुरूआती साल में ही 48 विद्यार्थियों का दाखिला हुआ। ‘सर्टिफिकेट कोर्स इन संस्कृत’ में 7 छात्र शामिल हुए, जिनमें 5 मुस्लिम हैं।

एक नई चेतना का उदय हुआ जामिया में संस्कृत पढ़ाने से

विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. धनंजयमणि त्रिपाठी का कहना है,

‘जामिया में संस्कृत पढ़ाने से एक नई चेतना का उदय हुआ है। जामिया के वातावरण को लेकर बाहर जो भी माहौल हो, हकीकत में यह एक समृद्ध विरासत है। यहां हिंदू और मुस्लिम जैसा कुछ नहीं है। उत्तम शैक्षणिक वातावरण के साथ ही विभाग को प्रशासनिक सहयोग भरपूर है। बहुत खुशी है कि यहां मुस्लिम विद्यार्थी बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से संस्कृत पढ़ रहे हैं और बेहतर परफॉर्म कर रहे हैं।’

वहीं विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीशचंद्र पंत के निर्देशन में जहांआरा ‘अधुनातन सामाजिक समस्याओं का निदान : महाभारत के परिप्रेक्ष्य में’ विषय पर शोध कर रही हैं। जहांआरा कहती है, ‘संस्कृत की महत्ता से अभिभूत हूं। भारतीय संस्कृति सर्वाधिक उन्नत है। उसमें रामायण और महाभारत का समावेश है। व्यक्ति सत्ता के आधार पर सम्मान है। वेदों की रचना में स्त्रियां भी शरीक थी। संस्कृत के अनुसार स्त्रियों का शिक्षित होना जरूरी है, यह कम गौरव की बात नहीं है।’ वह यह भी बताती है कि उसके परिवार के लोग चाहते हैं कि वह संस्कृत पढ़े और उसमें नाम करे।

हकीकत में शिक्षा का सांप्रदायिक चरित्र नहीं होता। उसे सांप्रदायिकता के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। हम धर्मनिरपेक्षता का दावा करते हैं तो उस स्थिति में शिक्षा के प्रति भी धर्मनिरपेक्ष दृष्टि होनी चाहिए। यह निर्विवाद है कि भारतीय शिक्षा की आत्मा संस्कृत में छुपी है। संस्कृत का स्वरूप स्वयंसिद्ध है। उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं है। उसकी तुलना नहीं हो सकती। वह हिमालय जैसी विराट है। उसका साहित्य ज्ञान और विज्ञान की दुनिया है। यही कारण संस्कृत पूरे संसार में पढ़ी जा रही है। क्या यह सही नहीं कि जिस भाषा की पोथियां नासा के वैज्ञानिक बांच रहे हो, उस भाषा को तमाम भारतीय शिक्षण संस्थानों के आधारभूत ज्ञान के रूप में नहीं होना चाहिए?

सारे भाषाविद मानते हैं कि संस्कृत पुरातन भाषा है, जिसका विकल्प किसी के पास नहीं है। यदि वह भारतीय विद्यार्थियों के ही पढऩे का हिस्सा नहीं बन पाई तो वे उस प्राचीन अध्ययन व्यवस्था से वंचित हो जाएंगे, जिस पर भारतीय होने के नाते उनका जन्मजात अधिकार है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने इस बात को अपनी स्थापना के वक्त ही समझ लिया था, जब वह मोहमडन एंग्लो ऑरियंटल कॉलेज (एमएओ) के रूप में 1875 ईस्वी में था। वहांं स्कूल और कॉलेज दोनों स्तर पर संस्कृत की पढ़ाई शुरू हुई। कालांतर में इसके अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बनने के बाद भी संस्कृत अध्ययन जारी रहा। अनेक संस्कृत विद्वानों का चयन हुआ। पंडित रामस्वरूप शास्त्री अलीगढ़ मुस्लिम विवि में पहले संस्कृत व्याख्याता नियुक्त हुए। यह 1920 की बात है। 

धर्म, जाति, वर्ग तथा संप्रदाय से नहीं बांधा जा सकता संस्कृत को

संस्कृत को धर्म, जाति, वर्ग तथा संप्रदाय से नहीं बांधा जा सकता। उसका किसी से विरोध नहीं है। वह ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भाषा है। जो लोग जामिया में संस्कृत विभाग खोलने को हिंदूवाद के बढ़ते कदम मान रहे हैं, हकीकत में उनकी समस्या संस्कृत नहीं, कुछ और है! वे संस्कृत को हिंदूवाद के चक्र में फंसाकर राजनीति करना चाहते हैं। यह सोचने की बात है कि जब संस्कृत भाषा के विरोध के स्वर क्यों निकलते हैं? याद कीजिए, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में संस्कृत अध्ययन केंद्र शुरू करने पर व्यापक विरोध हुआ था। यह 2001 की बात है। ऐसे ही, 2006 में यूनेस्को ने मानव इतिहास का सबसे पुराना लिखित दस्तावेज ऋग्वेद को माना। लेकिन संस्कृत विरोध की राजनीति करने वालों ने यूनेस्को के इस बयान का भारी विरोध किया था।

मुस्लिम संस्कृत नहीं पढऩा चाहते, यह बात वे कहते हैं जो धर्म की राजनीति का व्यापार करते हैं। जबकि पिछले 500 सालों में सैंकड़ों मुस्लिम विद्वानों ने संस्कृत में खूब साहित्य रचा है। अब्दुल रहीम खानखाना समेत अनेक विद्वानों ने संस्कृत में कई ग्रंथ लिखे हैं। आज भी संस्कृत विभागों और संस्कृत विश्वविद्यालयों में अनेक मुस्लिम विद्यार्थी संस्कृत पढ़-लिख रहे हैं। तभी तो राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता तनवीर अहमद ने जामिया में संस्कृत विभाग खोले जाने पर दिलखुश टिप्पणी की है, ‘संस्कृत एक भाषा के साथ जीवित परंपरा भी है। सुकून है जामिया में संस्कृत विभाग खोला गया है।’ तनवीर अहमद के इस कथन को व्यापकता से समझने पर पता चलता है कि संस्कृत कितनी जरूरी है।

(लेखक राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं) 

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