क्या सरकार उत्तराखंड के बाजगियों को राज्य आन्दोलनकारी होने का आधिकारिक दर्जा देगी ?

विकास की ऐसी 'भूख' कि उत्तराखंड की आबो हवा और सांस्कृतिक विरासत खत्म हो जाए, इसकी कोई चिंता नहीं।...

Vidya Bhushan Rawat
क्या सरकार उत्तराखंड के बाजगियों को राज्य आन्दोलनकारी होने का आधिकारिक दर्जा देगी ?

उत्तराखंड का स्थापना दिवस

Establishment day of Uttarakhand

विद्या भूषण रावत

आज उत्तराखंड का 18 वां स्थापना दिवस है। राज्य गठन के इतने वर्षो के बाद भी बदलाव के बावजूद बहुत से सवालों पे उत्तराखंड की तमाम सरकारों का रुख शर्मनाक रहा है।

उत्तराखंड प्रकृति की गोद में बसा राज्य है और यहाँ विकास के नाम पर जो कमाई ठेकेदारों और नेताओं के गठबंधन ने की है वो आपराधिक है। विकास के नाम पर जंगलों का कटान, गंगा और यमुना की निर्मल धारा को नियंत्रित करना और पहाड़ों में सड़क और रेलवे के नाम पर लगातार यहाँ के पर्यावरण के साथ लगातार खिलवाड़  बहुत महत्वपूर्ण है।

जनता विकास नाम की बीमारी से मदहोश

janata vikaas naam kee beemaaree se madahosh

गंगा को बचाने के लिए प्रोफेसर जी डी अग्रवाल Professor GD Agarwal को अंतिम समय तक जनता का सहयोग नहीं मिला, क्योंकि सभी को विकास नाम की बीमारी ने मदहोश किया हुआ है। किसी की ये समझ नहीं आ रहा कि यदि पहाड़ और उसकी गंगा जैसी पवित्र घाटियां ही नहीं रहेंगे तो वहां कौन आएगा और रहने के मायने क्या हैं। जो लोग अपनी संस्कृति और मिट्टी के प्रति सचेत नहीं रहते उनकी जिंदगी भर कोई पहचान नहीं हो सकती।

उत्तराखंड में दलितों के प्रश्न गायब

Questions of Dalits missing in Uttarakhand

उत्तराखंड की विविध सरकारों ने दलितों के प्रश्न को हमेशा हाशिए पर रखा है। दरअसल उत्तराखंड के प्रमुख आन्दोलनों के केंद्र बिंदु से भी दलित प्रश्न गायब रहा है। इस प्रश्न को ऐसे गायब कर दिया जाता है जैसे दलित प्रश्न यहाँ हैं ही नहीं और ये सारी बीमारियां तो देश के दूसरे हिस्सों में हैं।हमारे यहाँ तो सभी भाई बहिन हैं।

Uttaraakhand ka dalit paridrshy

उत्तराखंड के दलित परिदृश्य को समझने के लिए यहाँ की विविध भौगोलिक परिस्थितयो को समझना होगा। उत्तराखंड के पहाड़ों के हालत अलग हैं, तो मैदानी इलाकों या तराई के क्षेत्र के सामाजिक समीकरण बिलकुल भिन्न और जौनसार का क्षेत्र बिलकुल अलग।

उत्तराखंड के पहाड़ो में जनसँख्या का दवाब बिलकुल कम है और स्थितियां कठिन हैं। सामाजिक जीवन में जाति की महत्ता है, लेकिन खेती की भूमि कम होने के कारण अधिकांश लोग सरकारी नौकरियों पर निर्भर हैं, इसलिए शारीरिक हिंसा कम दिखाई देती है लेकिन समाज जाति विहीन है, ये कहना बेहद झूठ होगा।

लेकिन उत्तराखंड में जाति का सबसे भयावह स्वरूप जौनसार क्षेत्र में दिखाई देता है। एक बड़ी साजिश के तहत पूरे क्षेत्र को 'आदिवासी' घोषित करवाकर जौनसार की ताकतवर जातियों ने आदिवासियों के नाम पर सारे नौकरियों में कब्ज़ा कर लिया और क्षेत्र में जातीय प्रभुत्व को कायम रखा। फलस्वरूप दलित कभी भी तरक्की नहीं कर पाए।

जौनसार : दलितों को अभी भी मंदिरों में प्रवेश नहीं

jaunasaar : daliton ko abhee bhee mandiron mein pravesh nahin

जौनसार का क्षेत्र उत्तराखंड में अकेला ऐसा है जहां दलितों को अभी भी मंदिरों में प्रवेश पर लोगो पर हिंसा होती है। पूरे क्षेत्र को कुछ राजनैतिक परिवारों ने अपनी सल्तनत के तौर पर तैयार कर लिया। उत्तराखंड की दोनों मुख्य दलों ने इस प्रकार की राजनीती को जगह दी।

जौनसार के मसले को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि वाकई में इस क्षेत्र में दलित आदिवासी जातियों की संख्या अधिक थी लेकिन यहाँ पर तथाकथित ब्राह्मण, राजपूत भी बहुत थे। उत्तर प्रदेश राज्य में आदिवासियों और दलितों  के लिए जब आरक्षण का प्रश्न आया तो सूची में आने वाले समुदायों को लिस्ट से हटाकर जौनसार के मामले में 'जौनसारी' जाति को रखा दिया गया, जो संविधान के साथ किया गया फ्रॉड है।

जौनसारी कोई जाति नहीं होती, यह एक क्षेत्र है जिसमें विविध जातियां रहती हैं। इसलिए पूरे जौनसार को जौनसारी जाति का क्षेत्र कह कर यहाँ की दबंग जातियों ने न केवल राजनीति पर कब्ज़ा किया अपितु दलित और आदिवासियों के लिए बने आरक्षण को भी लूट लिया।

यदि पूरा क्षेत्र जौनसारी है तो इस क्षेत्र में दलितों पे हिंसा Violence against Dalits क्यों होती है। इस क्षेत्र में सर्वाधिक बंधुआ मजदूर हुआ करते थे, वो क्यों था। उत्तर प्रदेश में गोविन्द बल्लभ पन्त के मुख्यमंत्री रहते ये कारनामे हुए हैं।

जौनसार में कोल्टा जाति और बाजगी जातियों की हालात बहुत ख़राब है। वे छुआछूत का शिकार भी हैं, लेकिन अभी तक उन्हें न तो आरक्षण का कभी लाभ मिला ना ही उनके पास थोडा भी कृषि भूमि है।

सरकार और नीति निर्माताओं को समझना चाहिए कि कोई भी भूभाग जरूर भौगोलिक तौर पर समान हो सकता है, लेकिन उसमें रहने वाले लोगों के सामाजिक और आर्थिक हालत एक से होंगे, ये बहुत बड़ा झूठ है। लेकिन उत्तराखंड के ताकतवर लोगों ने बहुत से इलाको में ऐसा कमाल कर संविधान के सामाजिक न्याय के सिद्धांत की धज्जियां उखाड़ दी हैं और संविधान के साथ ऐसी धोखाधड़ी का पर्दाफाश होना चाहिए।

चमोली, उत्तरकाशी और जौनसार से आरक्षण की व्यवस्था क्षेत्रीय आधार पर हटाकर जातीय आधार पर होनी चाहिए।

उत्तराखंड में सरकारी आंकड़े ही कहते हैं कि दलितों के पास भूमि 13.46% है और आदिवासियों के लिए ये आंकड़ा 3.22%। 28% दलित परिवार अभी भी बीपीएल की श्रेणी में आते हैं, वहीं आदिवासियों के लिए ये संख्या 9.34% है।

जहाँ तक सत्ता में भागीदारी का प्रश्न है उत्तराखंड में श्रेणी क में अनुसूचित जाति के अधिकारियों का प्रतिशत 11.64% जबकि अनुसूचित जनजाति का 2.98%। श्रेणी ख में अनुसूचित जाति के लोगो की संख्या 12.18% और जनजाति के 2.17% है। श्रेणी ग में 13.91% दलित और 1.66% आदिवासी हैं।

वैसे सीलिंग भूमि के जिस संघर्ष को लड़ते मुझे बीस वर्ष से ऊपर हुए, उसने मुझे उत्तराखंड में व्याप्त जातीय पूर्वाग्रहों को बेहद अच्छे से महसूस करायास विशेषकर राज्य के राजनैतिक नेतृत्व में तो दलित आदिवासी प्रश्न गौण हैं या वो हैं ही नहीं। अधिकारियों में तो होड़ है कि जमीन ढूंढ-ढूंढ कर निकाली जाए और कैसे वो बड़े-बड़े होटलों और रिजॉर्ट्स के लिए आवंटित कर दी जाए।

विकास की ऐसी 'भूख' कि उत्तराखंड की आबो हवा और सांस्कृतिक विरासत खत्म हो जाए, इसकी कोई चिंता नहीं। उत्तराखंड सरकार ने आधिकारिक तौर पर एक शपथपत्र में कहा कि राज्य गठन के बाद से अभी तक उसने किसी भी आदिवासी को भूमि का आवंटन नहीं किया। उसी अदालत में जब जस्टिस के एम जोसफ ने प्रश्न किया कि ये कैसे संभव है तो सरकारी वकील ने कहा कि प्रदेश में कोई भी आदिवासी भूमिहीन नहीं है।

सीलिंग की भूमि दलितों में न जा सके इसके लिए उत्तराखंड के अधिकारियों, नेताओं और पंजाब से आये जाट सिखों के बड़े रसूखदार लोगो की साँठ-गाँठ से तराई क्षेत्र में सीलिंग कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यही लोग थे जो उत्तराखंड राज्य गठन में शहीद उधम सिंह नगर को अलग रखना चाहते थे, ताकि रुद्रपुर, किच्छा, खटीमा से लेकर पीलीभीत तक उनका साम्राज्य बदस्तूर बिना किसी रोक टोक के चलता रहे। नेताओं को चंदा चाहिए इसलिए उन्होंने दलित प्रश्नों को तो बिलकुल हाशिए पे फेंक दिया।

हाई कोर्ट में उत्तराखंड सरकार ने कहा कि सीलिंग की जमीन को वो जैसा चाहे इस्तेमाल कर सकती है जबकि हमारा कहना था कि उसे सीलिंग कानून Sealing law की सेक्शन 27 और ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम Zamindari Elimination Act की 198 के तहत प्रथिमकता की सूचि के आधार पर बांटा जाना चाहिए।

सरकार ने धारा 25 का इस्तेमाल कर जमीन का उपयोग 'जनहित' में कर दिया। इस जनहित में सिडकुल को जमीन दी गई हालाँकि कार्य अभी कुछ नहीं दिखाई देता है। एक बहुत बड़ी संख्या में जमीन पंजाब से आये उन सिखों को दी गई, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के अपने निर्णय में अवैध एन्क्रोचर बोला था। इस जमीन को लेकर लोकायुक्त ने भी उसे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना बताया था और सरकार ने पूरे मुक़दमे झूठ का सहारा लेकर उस जमीन को किसी भी प्रकार से दलित आदिवासियों को वितरित होने से रोका।

आज भी तराई क्षेत्र में बस रहे थारू और बोक्सा जनजातियों की भूमि मुख्यतः पंजाब से आये बड़े धनाढ्य लोगों के कब्जे में चली गई है और इस सभी में प्रशासन और राजनैतिक नेतृत्व की बड़ी भूमिका है। सरकार यदि चाहे तो चकबंदी की प्रक्रिया शुरू कर सकती है लेकिन तराई के बाहर से आयातित नव-सामंत ऐसा नहीं होने देंगे और प्रक्रिया को शुरू होने से पहले ही फ़ेल करा देंगे।

उत्तराखंड गठन के करीब एक डेढ़ हफ्ते पहले शहीद ऊधम सिंह नगर के भूमिहीन दलितों में कुछ उत्साही राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने सेंध लगा दी। जब उत्तर प्रदेश सरकार में शामिल विधायक और मंत्री वहा से इस्तीफ़ा देने के बाद काशीपुर पहुंचे। सभी दलितों को बताया गया था कि भाजपा के ये लोग दलितों के लिए कुछ घोषणा करने वाले हैं लेकिन हुआ क्या। सभी ने वादा किया कि ऊधम सिंह नगर का और औद्योकीकरण होगा और दलितों को अपनी जुमलेबाजी में लुभाया। जिस जमीन की लड़ाई के लिए हम लड़ रहे थे, उसके बारे में एक शब्द ही इन नेताओं की जुबान पर नहीं था। शाम तक आन्दोलन के नेता बेहद खफा और नाराज़ थे हालाँकि मैंने उन्हें पहले ही समझा दिया था कि आप नेताओं से उम्मीद न करें।

उत्तराखंड राज्य में आज भी दलित आदिवासियों के स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान पूरा खर्च नहीं होता। वैसे दूसरे राज्यों में भी स्थितियां ख़राब हैं लेकिन आंध्र और कर्नाटक से सीखना होगा, जहाँ क़ानून के तहत दलित आदिवासियों के लिए प्रावधान बजट को खर्च करना ही होगा नहीं तो अधिकारियों पर मुकद्दमे दर्ज होंगे।

उत्तराखंड राज्य का आन्दोलन Uttarakhand state movement जब अपने चरम पे था तो वह मंडल कमीशन के विरुद्ध था। धीरे-धीरे उसने जातीय रूप धारण कर लिया। उत्तराखंड पहला राज्य है जहाँ राज्य आन्दोलन में भाग लेने वाले लोगों के लिए 'पेंशन' का प्रावधान है और उन्हें अन्य सुविधाओं की भी बात है। वैसे महत्वपूर्ण ये है हम कोई आन्दोलन सरकार से अपने लिए सुविधाओं के लिए नहीं लेते अपितु अपने समाज और क्षेत्र को बेहतर बनाने के लिए करते हैं लेकिन हाँ बहुत लोग उस दौर में अपने काम काज को छोड़कर काम किये इसलिए सरकार अगर कुछ करती है तो कोई हर्जा नहीं है। लेकिन उस दौर में मैंने उत्तराखंड के आंदोलनात्मक स्वरूप को ब्राह्मणवादी कहा था क्योंकि इसमें दलित पिछडों आदिवासियों की भूमिका नगण्य थी या ये कहिये के वे हाशिये पे थे। मंडल विरोधी आन्दोलन में दलितों, पिछडों या आदिवासियों के बारे में बात करने पर आप पीछे धकेल दिए जाते।

आज जब उत्तराखंड के आंदोलनकारियों को सरकार ने आधिकारिक दर्जा दिया है तो मैं एक प्रश्न उठाना चाहता हूँ जिस विषय को उत्तराखंड से सबसे ईमानदार अधिकारियों में एक श्री चन्द्र सिंह, सेवानिवृत आई ए एस ने उठाया था। जब भी उत्तराखंड आन्दोलनकारी जुलूस निकालते उस पर सबसे आगे ढोल डमाग बजाकर चलने वाले लोग बाजगी या दास जातियों के होते थे। उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से बाजगी, दास, औजी, जैसी जातीय संगीत और मनोरंजन करती थीं। ये सभी लोग सारे आन्दोलन में पूर्णतः शामिल थे और इन्होंने आन्दोलनकारियों के हौसलाफजाई के लिए ढोल बजाये। सभी बिना संकोच और बिना पैसे के ये काम किये। कई बार तो अपने घरों के बुरे हालात के बावजूद भी वे इस कार्य में लगे रहे।

श्री चन्द्र सिंह कहते हैं कि उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान कोई गाँव और क़स्बा ऐसा नहीं था जहाँ बाजगी, औजी, दासों ने ढोल न बजाया हो, लेकिन जब उत्तराखंड राज्य बन गया तो उत्तराखंड की परम्परा को ले जा रहे इन लोगों को सरकार और आंदोलनकारियो ने पूर्णतः भुला दिया। आखिर राज्य आन्दोलनकारी का दर्जा उन सभी को दिया गया है जिन्होंने आन्दोलन में भाग लिया। फिर बाजगियो और अन्य दलित जातियों को ये दर्जा क्यों नहीं।

क्या ढोल डमाऊ नगाड़े बजाने वाले लोग राज्य आन्दोलनकारी नहीं हो सकते। ये जातिया पूर्णतः भूमिहीन हैं और दलितों में हाशिए पर। दलित आन्दोलन भी इन लोगो तक नहीं पहुंचा है। इन जातियों के कोई लोग भी सरकारी नौकरियों में दूर-दूर तक नहीं हैं।

जौनसार, टिहरी, उत्तरकाशी आदि जिलों में तो बाजियों के हालत गुलामी वाले हैं। किसी भी विवाह में वे ढोल बजाने से जाने से इनकार नहीं कर सकते। कई लोग परंपरा के नाम पर उन्हें बुलाते हैं लेकिन उनके सम्मानजनक जीवन के लिए उत्तराखंड की सरकारों ने आज तक कुछ नहीं किया है।

अगर उत्तराखंड अपने 18 वें स्थापना दिवस पर उत्तराखंड के दलित आदिवासियों के विकास और राज्य निर्माण में उनकी भूमिका को स्वीकार करते हुए उनका सम्मान करता है और उनको उनकी संख्या आधार हर स्टार पर प्रतिनिधत्व देता है, तो इस राज्य को सही दृष्टि में एक समाजवादी राज्य कहने में मुझे कोई संकोच नहीं होगा। उत्तराखंड की प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी सौन्दर्यपूर्ण हो जाएगा और ये देश के सभी राज्यों के लिए एक आदर्श बन सकता है।

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