लो बैक पैन का आधुनिक इलाज

लो बैंक पेन की अधिकांश शिकायत एल-4 व एल-5 या एल-5 व एस-1 के लेवल पर होती है. स्पाइन की शल्य चिकित्सा में मैग्नेटिक रेजोन्स इमेजिंग ‘एम.आर.आई.’ की महत्वपूर्ण भूमिका है,...

एजेंसी

आज कल अधिकांश लोगों में लो बैक पैन Low back pan यानी कमर दर्द की शिकायत complaints of back pain बड़ी आम हो चली है. विशेषज्ञ इसके कई कारण बता रहे हैं. लेकिन एक बड़ा कारण आज की आधुनिक जीवन शैली modern lifestyle है. कमर दर्द का पहले दर्दनाशक दवाओं व बेडरेस्ट के अलावा कोई कारगर इलाज नहीं था. लेकिन आज लो बैक पैन प्रबंधन low back pan management की नई चिकित्सा सुविधाएं देश में उपलब्ध हो गयी हैं. आज कल लो बैक पैन की शिकायत इस कदर आम हो गईं हैं कि आप का कोई न कोई परिचित इससे परेशान अवश्य मिल जायेगा. आखिर यह क्या है? और इसके क्या-क्या कारण हैं? रीढ़ की हड्डी backbone में प्रत्येक दो वर्टिब्रा vertebra के बीच में एक डिस्क disc होती है जो कि एक शॉक-अब्जार्बर का कार्य करती है. इसके घिस जाने पर यह डिस्क बड़ी होकर बाहर निकल आती है और इस कारण से कमर के निचले हिस्से में भयंकर दर्द होता है. इसे ही लो बैक पेन कहते हैं. यह दर्द दोनों पैरों में भी जा सकता है.

Modern Treatment of Low Back Pan

आज महानगरों की अरामपसंद जीवनशैली, गलत रहन-सहन, शारीरिक श्रम की कमी, बैठने व सोने के बेतुके ढंग, भीड़ भरी सडकों पर अधिक समय तक गाड़ी चलाने आदि के कारण युवाओं में भी रीढ़ ‘स्पाइन’ संबंधी बीमारी महामारी की तरह फैल रही है. आज 15 से 30 वर्ष के अधिकांश युवा रीढ़ के विकारों से ग्रस्त हैं. रीढ़ की हड्डी में खराबी backbone malfunction के कारण या तो पीठ या कमर में असह्य दर्द होता है या स्थिति बिगडने पर मरीज के पैर बेकार हो सकते हैं. वास्तव में आज जिस तेजी से महानगरों की जीवनशैली बदल रही है. उसमें स्पाइन के मरीजों की तादाद में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है.

गांव की अपेक्षा शहरों में स्पाइन के रोगियों की संख्या अधिक है. स्पाइन जिसका खुद का वजन काफी कम होता है, पूरे स्थल के बीच डिस्क बहुत ही व्यवस्थित ढंग से फिट रहती है और डिस्क बर्टिबा पर अंकुश कायम रखती है. अगर किसी कारण से बर्टिब्रा के आगे की दिशा यानी पेटी की तरफ या पीछे की दिशा ‘पीठ की तरफ’ खिसक सकता है. इसमें जब डिस्क पीठ की तरफ खिसकती है तो वह मरीज के लिए बहुत घातक होता है. इसका कारण है कि स्लिप्ड डिस्क slip disk स्पाइन के पीछे केनाल की भीतरी नसों पर दबाव देने लगता है, इससे मरीजों को असहाय दर्द की पीड़ा महसूस होती है. नसों पर अत्यधिक जोर पडने पर कभी-कभी पैर के बेकार हो जाने की संभावना रहती है. बेड पर पहुंचाने वाला यह दुनिया दूसरा का सबसे बड़ा कारण है. लगभग 80 प्रतिशत लोगों को अपने जीवन काल में कभी न कभी इसका सामना अवश्य करना पड़ता है. लेकिन इनमें से 90 प्रतिशत पहली बार में स्वयं ठीक हो जाते हैं. इनके ठीक होने का समय 2 से 8 सप्ताह तक का हो सकता है. केवल 10 प्रतिशत मामलों में सर्जरी की आवश्यकता होती है.

लो बैंक पेन की अधिकांश शिकायत एल-4 व एल-5 या एल-5 व एस-1 के लेवल पर होती है. स्पाइन की शल्य चिकित्सा में मैग्नेटिक रेजोन्स इमेजिंग ‘एम.आर.आई.’ की महत्वपूर्ण भूमिका है, ऑपरेशन से पूर्व स्लिप्ड डिस्क की स्थिति का पता लगाना आवश्यक होता है. साथ ही यह भी जानना जरूरी होता है कि स्लिप्ड डिस्क किन नसों पर दबाव डाल रही है, एम.आर.आई ही एक ऐसा यंत्र है जो स्पाइन संबंधी गड़बड़ी की सही और कई गुण संबंधित तस्वीर दिखा सकता है. आप इसके इलाज के लिए जो आधुनिक प्रबंध मौजूद है. इनमें इंडोस्कोप प्रमुख है. इसमें इंडोस्कोप की सहायता से ऑपरेशन करते हैं. यहां चिकित्सक की आंखें तो मानीटर पर होती हैं, लेकिन हाथ अपना काम कर रहे होते हैं. आज कई तरह के इंडोस्कोप उपलब्ध हैं और विभिन्न-विभिन्न ऑपरेशनों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं.

स्लिप्ड डिस्क के मरीज जो कमर व पैर की दर्द से पीडित हैं, उसमें तो इंडोस्कोप कारगर हैं ही, साथ ही कई अन्य बीमारियां जैसे टी.बी. ट्यूमर, बीच संक्रमण इत्यादि में भी इंडोस्कोप का इस्तेमाल कर के ‘जिसमें केवल एक छिद्र किया जाता है’ बड़े ऑपरेशन से रोगियों को बचाया जा सकता है. जब कि पहले पूरा पेट या सीना खोलकर ही ऐसे ऑपरेशन संभव हुआ करते थे. इसका फायदा यह होता है कि एक 4 एम.एम. के टेलीस्कोप को हम अंदर डालकर टेलीविजन पर अंदर कर दृश्य 20 गुना बड़ा करके देख सकते हैं जिसमें कि गलती होने की संभावना नहीं होती है. यह पूरी सर्जरी मरीज खुद भी अपनी आंखों से देख सकता .इसमें खून कम से कम बहता है और पहले की तरह टांका-पट्टी करने की जरूरी नहीं और परिणाम काफी बेहतर आता है. केवल लोकल एनेथेस्यिा देकर भी यह ऑपरेशन किया जा सकता है और मरीज अगले दिन ही वापस लौट जाता है. सर्जरी का कोई निशान भी नहीं आता है. वैसे तो स्पाइन का रोग किसी को भी हो सकता है. लेकिन आरामतलबियों, शरीरिक श्रम या व्यायाम से मुंह चुराने वालों, गलत तरीके से बैठने-सोने वालों और अत्याधिक गाड़ी चलाने वालों को यह बीमारी होने की संभावना अधिक रहती है.

डा.सतनाम सिंह छाबड़ा,

डायरेक्टर,

न्यूरो एंड स्पाइन डिपाटमेंट,

सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली.

(सम्प्रेषण)

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