राष्ट्र की संकल्पना भौगोलिक सीमाओं से परे – कैलाशचंद्र पंत

मैथिलीशरण गुप्‍त की 132 वीं जयंती पर विचार गोष्‍ठी और संगीत संध्‍या कार्यक्रम...

राष्ट्र की संकल्पना भौगोलिक सीमाओं से परे – कैलाशचंद्र पंत

Nation's concept beyond geographical boundaries - Kailash Chandra Pant

मैथिलीशरण गुप्‍त की 132 वीं जयंती पर विचार गोष्‍ठी और संगीत संध्‍या कार्यक्रम

वर्धा, 08 अगस्‍त, 2018; भारतीय साहित्य-संस्कृति में जहां वेदकाल से ही ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की संकल्पना रही है वहीं पाश्चात्य राजनीति ने राष्ट्र-राज्य का संकीर्ण विचार दिया और जिसने नेपोलियन व हिटलर जैसे तानाशाहों को जन्म दिया। राष्ट्र की संकल्पना जब अध्यात्म से जुड़ती है तो वह भौगोलिक सीमाओं में बंधी नहीं रहती और मात्र भौतिक समृद्धि तक ही सीमित नहीं होती।

उक्‍त उद्बोधन भोपाल के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और ‘अक्षरा’ पत्रिका के संपादक कैलाश चंद्र पंत ने व्‍यक्‍त किए। वे युगदृष्टा, राष्ट्रकवि, पद्मभूषण मैथिलीशरण गुप्त की 132 वीं जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम (वर्धा) के छात्र परिषद तथा राष्ट्रकवि स्मृति समिति के संयुक्त तत्‍वावधान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान बोल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के पूर्व प्रधान मंत्री प्रा. अनन्तराम त्रिपाठी ने की।

‘वर्तमान परिदृश्य और गुप्तजी का राष्ट्रवाद’ विषय पर कैलाशचंद्र पंत ने कहा कि भूमि, जन और जनसंस्कृति ये तीनों मिलकर ही राष्ट्र की रचना करते हैं। समूचे भारतीय साहित्य और विशेषकर गुप्तजी की रचनाओं में इसी रूप में राष्ट्र की कल्पना की गई है। इसकी झलक उनकी भारतमाता रचना में मिलती है। राष्ट्रवाद तो यूरोप कि देन है जिसका इतिहास खूनी संघर्ष से रंगा हुआ है। भारत के लिए तो करोड़ो एककों द्वारा प्रदत्त सांस्कृतिक, समन्वित शक्ति ही राष्ट्र का परिचायक है।

इस दौरान महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कार्यकारी कुलसचिव एवं हिंदी एवं तुलनात्‍मक साहित्य विभाग के अध्यक्ष डॉ. के. के. सिंह ने गुप्‍तजी के रचना संसार पर टिप्‍पणी करते हुए कहा कि उनके काव्य में राष्ट्रीयता और गांधीवाद की प्रधानता है। इसमें भारत के गौरवमय अतीत के इतिहास और भारतीय संस्कृति की महत्ता का ओजपूर्ण प्रतिपादन है। जब उस समय के जन और जमीन से जुड़े किसी कवि का नाम लिया जाता है तो सबसे पहले गुप्तजी का नाम ही आता है।

प्रास्‍ताविक वक्‍तव्‍य में डॉ. ओमप्रकाश गुप्ता ने सेवाग्राम परिसर में इस बीसवें जयंती आयोजन पर अतिथियों का स्वागत करते हुए हिंदी के कुछ वरिष्ठ विद्वानों से मिले सुझावों का उल्लेख किया और कहा कि गुप्तजी के साहित्य के कई ऐसे पहलू हैं जिनपर आज तक चर्चा नहीं हो पाई है, इसलिए एक नवीन संचयिता की योजना बनाई जानी चाहिए।

गुप्‍तजी की कविताओं का संगीतबद्ध प्रस्तुतीकरण वर्धा की प्रसिद्ध संगीतज्ञ एवं गायक सुश्री संध्या देशमुख द्वारा किया गया। संगीत रचना भी उन्होने स्वयं की। ये कविताएं यशोधरा, साकेत, पंचवटी, हिन्दू, स्वस्ति और संकेत काव्य रचनाओं से ली गईं। कार्यक्रम में इस वर्ष दिवंगत हुए साहित्य विभूतियों बाल कवि बैरागी व गोपाल दास ‘नीरज’ को श्रद्धांजलि भी अर्पित की गई। डॉ. अनुपमा गुप्ता और डॉ. अनवर सिद्दीकी ने संचालन और डॉ. दिलीप गुप्ता ने आभार व्‍यक्‍त किया। कार्यक्रम में मेडिकल छात्रों की राष्ट्रकवि स्मृति काव्य प्रतियोगिता के विजेताओं विदित पांचाल और डॉ. संतोष वर्मा को पुरस्‍कृत किया गया

इस अवसर पर कस्तूरबा हेल्थ सोसाइटी के सचिव डॉ. बीएस गर्ग, महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के अधिष्ठाता डॉ. एनएम गंगने, डॉ. एसपी कलंत्री, डॉ. उल्हास जाजू, डॉ. आर. नारंग, डॉ. प्रतिभा नारंग, डॉ. रमेश पांडे, डॉ. सुमन पांडे, महाकाली शिक्षण संस्थान के प्रमुख शंकर प्रसाद अग्निहोत्री, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वित्‍ताधिकारी कादर नवाज खान, प्रो. मनोज कुमार, प्रो. देवराज, प्रो. अखिलेश दुबे, डॉ. राजेश्‍वर सिंह, डॉ. अमित विश्‍वास, दत्ता मेघे आयुर्विज्ञान संस्‍थान के डॉ. एसएस पटेल, गीता गुप्ता, अनिल नरेडी, नरेंद्र ढंढारे, मुरलीधर बेलखोड़े, अशोक नौगरैया, आनंद शुक्ल, फादर थॉमस, आशा गुप्ता, उत्तम आरपी गुप्ता, लॉयड्स विद्या निकेतन की प्रधानाचार्या कीर्ति मिश्रा सहित बड़ी संख्‍या में साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।

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