प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़ा है ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर

इस तरह के विकारों से ग्रस्त मरीजों को तनाव, चिड़चिड़ेपन या फिर ओसीडी का सामना करना पड़ता है। कुछ लोग अक्सर संशय, डर या फिर आशंकाओं से घिरे रहते हैं।...

प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़ा है ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर

Obsessive compulsive disorder associated with the immune system

उमाशंकर मिश्र

नई दिल्ली, 9 नवंबर (इंडिया साइंस वायर) : भारतीय वैज्ञानिकों ने मल्टीपल स्केलेरोसिस के मरीजों में होने वाले ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर के कारण का पता लगाया है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि बीमारियों और हानिकारक बैक्टीरिया से बचाव करने वाला कोशिकाओं का एक वर्ग मल्टीपल स्केलेरोसिस Multiple sclerosis के मरीजों में ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर का भी एक प्रमुख कारण है। बंगलूरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएसी) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।

ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर (ओसीडी) मल्टीपल स्केलेरोसिस ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर (स्व-प्रतिरक्षी विकार Auto-immune disorder) का एक रूप है।

What is Auto-immune disorder

ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर होने पर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपने ही ऊतकों या शरीर में उपस्थित अन्य पदार्थों को रोगजनक समझने की गलती कर बैठती है और उन्हें नष्ट करने के लिए आक्रमण कर देती है। मल्टीपल स्केलेरोसिस ऐसा ही एक विकार है, जिससे दुनियाभर में 20 लाख से अधिक लोग ग्रस्त हैं। लेकिन, इस बीमारी का कोई उपचार अभी तक ज्ञात नहीं है।

Symptoms of Auto-immune disorder

इस तरह के विकारों से ग्रस्त मरीजों को तनाव, चिड़चिड़ेपन या फिर ओसीडी का सामना करना पड़ता है। कुछ लोग अक्सर संशय, डर या फिर आशंकाओं से घिरे रहते हैं। उन्हें लगता है कि उनसे कोई निर्धारित काम छूट गया है या फिर वह गलत हुआ है। यही सोचकर वे बार-बार एक ही काम को दोहराते रहते हैं। ऐसे विचारों की पुनरावृत्ति मरीज को परेशान करती है और वे विचलित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति को ही ओसीडी कहते हैं, जो एक गंभीर मानसिक विकार है।

क्या कहता है शोध

चूहों में मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसे हालात पैदा करके और फिर उनके व्यवहार का बारीकी से अध्ययन करने के बाद आईआईएसी के वैज्ञानिकों ने ऐसे विकारों और शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़े संबंधों का खुलासा किया है। वैज्ञानिकों ने पाया कि टीएच17 लिम्फोसाइट्स TH 17 Lymphocytes नामक प्रतिरक्षी कोशिकाएं Antibody Cells जहां एक ओर रोगों और बैक्टीरिया से बचाव Diseases and prevention of bacteria करती हैं, वहीं ओसीडी जैसे विकारों को भी बढ़ावा देती हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि टीएच17 कोशिकाएं चूहे के मस्तिष्क में घुसपैठ करके ओसीडी से प्रेरित व्यवहार को नियंत्रित करने वाली मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को बाधित करती हैं।

इस अध्ययन से जुड़े आईआईएससी के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ अवधेश सुरोलिया  Professor Avadhesha Surolia के अनुसार,

“प्रतिरक्षा कोशिकाओं और ओसीडी से प्रेरित व्यवहार से जुड़े संभावित संबंधों के बारे में अपने आप में यह एक नया खुलासा है। अभी तक न्यूरो-साइकेट्रिक बीमारियों Neuro-Psycotic Diseases का संबंध पूरी तरह तंत्रिका संबंधी विकारों से जोड़कर देखा जाता रहा है और प्रतिरक्षा तंत्र की भूमिका को नजरंदाज कर दिया जाता था।”

अवधेश सुरोलिया भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर में एक ग्लाइकोबायोलॉजिस्ट है। वर्तमान में, वह आण्विक बायोफिजिक्स यूनिट, आईआईएससी में मानद प्रोफेसर हैं और भारत के वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद की भटनागर फैलोशिप रखते हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि स्वस्थ चूहों की अपेक्षा मल्टीपल स्केलेरोसिस से ग्रस्त चूहे 60-70 प्रतिशत अधिक समय अपनी साफ-सफाई में खर्च करते हैं। इसी तरह चूहों को कंचे दिए गए, जिन्हें वे बार-बार एक जगह पर ले जाकर एकत्रित करने लगते हैं। इसके अलावा इन चूहों को दी गई बेडिंग या बिस्तर को फाड़कर वे घोसले का रूप देने लगते हैं।

चूहों के इन तीन तरह के व्यवहारों का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ताओं का मानना है कि वे ओसीडी से ग्रस्त हो गए हैं, जिसमें एक ही तरह का व्यवहार बार-बार दोहराया जाता है। 

इस तरह के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले तंत्र की पहचान करने लिए वैज्ञानिकों ने टीएच17 कोशिकाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

पूर्व अध्ययनों में पाया गया है कि ये कोशिकाएं ब्लड ब्रेन बैरियर को भेदकर मस्तिष्क में प्रवेश कर सकती हैं और मल्टीपल स्केलेरोसिस को बढ़ावा देती हैं। चूहों के मस्तिष्क के ऊतकों का विश्लेषण करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि बड़ी संख्या टीएच17 कोशिकाएं ब्रेनस्टेम और कोर्टेक्स के बीच फंसी हुई थी। इसी कारण चूहों के व्यवहार में परिवर्तन हुआ था।

वैज्ञानिकों ने जब टीएच17 के विकास को बाधित करने वाला डाइजोक्सिन नामक मॉलिक्यूल चूहों को दिया तो पाया कि साफ-सफाई उनका व्यवहार लगभग लगभग आधा हो जाता है। इसी आधार पर शोधकर्ताओं का का कहना है कि दवाओं के उपयोग से टीएच17 कोशिकाओं के विकास को नियंत्रित करके ओसीडी जैसे ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर पर लगाम लगायी जा सकती है।

इस अध्ययन में डॉ सुरोलिया के अलावा रविकांत और श्वेता पासी शामिल हैं। यह अध्ययन शोध पत्रिका फ्रंटियर्स इन इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित किया गया है।

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