अंधश्रद्धा से कैसे निपटें?

कभी-कभी कुछ चुनौतियां ऐसी आ जाती हैं जब  हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं...

अंधश्रद्धा से कैसे निपटें?

शहनाज़

मैं वर्तमान में बचपन बनाओ संस्था के साथ काम कर रही हूँ। यह संस्था छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था है। मैं इसके शाला परिवर्तन कार्यक्रम से जुड़ी हुई हूँ, जिसका उद्देश्य कुछ माध्यमिक और प्राथमिक शालाओं के शिक्षकों को ज़मीनी स्तर पर सहयोग प्रदान करके शाला में सकारात्मक बदलाव लाना है। मैं मुख्यतः दो माध्यमिक शालाओं के शिक्षकों और बच्चों के साथ काम करती हूँ। हालांकि दूसरों से बदलाव की अपेक्षा करना इतना आसान नहीं होता और इसमें समय भी बहुत लगता है। इस कार्य के दौरान हर रोज़ ही हम विभिन्न चुनौतियों से दो-चार होते हैं परन्तु कभी-कभी कुछ चुनौतियां ऐसी आ जाती हैं जब  हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। ऐसी ही कुछ घटना मेरे साथ लगभग दो महीने पहले घटित हुई, जब मैंने खुद को पराजित महसूस किया।               

              मेरे एक स्कूल में कक्षा सातवीं में एक बच्चा पढ़ता है, जिसका नाम चिंगड़ू है। चिंगड़ू अपने में मग्न रहने वाला बच्चा है और वह हमेशा खुश रहता है। जब उसका मन करता है तब वो स्कूल आता है अन्यथा कई-कई दिनों तक स्कूल से गायब रहता है। यही नहीं यदि उसे कक्षा में पढ़ायी जाने वाली किसी चीज़ में दिलचस्पी हो तो वह खूब दिल लगाकर सभी गतिविधियों में शामिल होता है। इसके अलावा उसके चेहरे के हाव-भाव से ही किसी को भी आसानी से ये समझ में आ जायेगा कि कब उसे सब कुछ समझ में आ रहा है और कब वह संशय की स्थिति में है। जब उसे सब कुछ समझ में आता है तो उसके चेहरे पर विशेष प्रकार की मुस्कान और चमक आ जाती है।

Muvep] बचपन बनाओ संस्था एक बार वह लगभग तीन चार दिनों से स्कूल नहीं आ रहा था। मैंने अन्य बच्चों और शिक्षकों से उसके न आने का कारण जानना चाहा तो अन्य बच्चे बोले कि वह तो पागल की तरह इधर-उधर घूमता रहता है। मुझे इन बातों पर विश्वास नहीं हुआ। कुछ दिन और इंतज़ार करने के बाद मैं एक दिन स्कूल पहुंची और मैंने देखा कि चिंगड़ू स्कूल आ गया था, लेकिन वह पहले की तरह खुश नहीं दिख रहा था, यही नहीं वह काफ़ी कमज़ोर भी दिख रहा था। जब मैंने शिक्षकों से इसके बारे में जानना चाहा तो पता चला कि वह स्कूल का मध्याहन भोजन नहीं खा रहा है क्योंकि बड्डे(गाँव के ओझा) ने उसे किसी महिला के हाथ का खाना खाने को मना किया है और शाला का मध्याहन भोजन एक महिला ही बनाती है। यह सब सुनकर मुझे पूरा माज़रा समझ में आया। असल में बस्तर में जब किसी पर कोई मुसीबत आती है या मुसीबत के आने की सम्भावना होती है तो गाँव का बड्डे लोगों को आई हुई विपदा को टालने के लिए इस प्रकार का आचार-विचार अपनाने की सलाह देता है। इसके पहले हमारे ऑफिस में खाना बनाने वाले भैया के पिताजी की तबियत खराब होने पर किसी बड्डे ने उन्हें यह कड़ाई से पालन करने को कहा था कि वे किसी भी महिला के हाथ का खाना या महिला के द्वारा छुआ हुआ खाना न खाएं खासकर उन दिनों में जब लाल पानी आता है। यहाँ लाल पानी से तात्पर्य मासिक धर्म से है। बड्डे के इस प्रकार के आदेश का परिणाम यह हुआ था कि भैया ने हमारी संस्था में काम करने वाली सभी महिलाओं के हाथ का बना हुआ खाना या उनके द्वारा छुआ गया भोजन खाना छोड़ दिया था। होता यह था कि वे खाना बनाकर सबसे पहले खुद खा लेते थे। हालांकि उन्हें हमारे साथियों ने नियमित बातचीत करके इस अंधविश्वास से बाहर निकाल लिया था। चिंगड़ू किन परिस्थियों में ऐसा व्यवहार कर रहा था यह जानना मेरे लिए बेहद ज़रूरी था। मैं इस बात को लेकर बेहद चिंतित थी कि यदि वह मध्याहन भोजन नहीं खायेगा तो दोपहर चार बजे तक भूखा रहेगा।

अपने सवालों का जवाब पाने के लिए एक दिन मैंने उसे मध्याहन भोजन के दौरान अपने पास बुलाया और इस सम्बन्ध में बातचीत शुरू की। थोड़ी बातचीत के बाद मैंने उससे पूछा-“मां के हाथ का भी नहीं खाओगे क्या?” तो वह तुरंत बोला-“मां के हाथ का खाने से नहीं होगा मैम।” अपनी सफ़ाई में उसने यह भी कहा कि “मैं तो खाता था मैम लेकिन मेरे सिर पर फिर से फोड़े होने लगे।” यह कहते हुए वह मुझे अपने फोड़े दिखाने लगा।

मैंने उसे समझाया कि यह सब कुछ उसके दिमाग की उपज है, यह उसकी गलत धारणा  है कि महिला के हाथ का खाने से यह सब हो रहा है।

उसने मुझे यह भी बताया कि बड्डे ने कहा है कि यदि वो महिला के हाथ का खायेगा तो उसके घर में कुछ भी विनाशकारी घटित हो सकता है। मैंने उससे जितनी देर भी बात की मैंने पाया कि वह मुझे नज़रंदाज़ करता रहा और पूरी चर्चा के दौरान उसने मेरी तरफ़ देखा तक नहीं, वजह साफ़ थी कि उसे बड्डे की बताई बातों पर पूरा विश्वास था और वह बड्डे के खिलाफ कुछ भी नहीं सुनना चाहता था।

बाद में इस विषय पर और मंथन करने तथा अपने साथियों से चर्चा करने पर मुझे मालूम चला कि बड्डे के प्रति गाँव के लोगों का यह विश्वास ऐसे ही नहीं विकसित होता बल्कि बड्डे वर्षों तक उनके बीच रहता है और उनके सुख-दुःख में शामिल होता है।

खैर थक-हार कर मैंने एक निर्णय तक पहुंची। अब वह निर्णय कितना तर्कसंगत था मैं खुद भी विश्वास से नहीं कह सकती। मैंने यह निर्णय लिया कि मैं बड्डे से जाकर मिलूंगी और उसे इस बात के लिए मनाऊँगी कि वह चिंगड़ू से यह कहे कि महिला के हाथ का खाने से कुछ नहीं होता चाहे भले ही मुझे इसके लिए बड्डे को पैसे देने पड़ें। लेकिन मैंने यह योजना अपने एक साथी से साझा की तो उन्होंने मुझे इस प्रकार के मसलों में हस्तक्षेप न करने की सलाह दी। अतः यह योजना भी जहाँ की तहां रह गयी।

कुछ दिनों बाद मैं स्कूल पहुंची तो मुझे पता चला कि शाला के शिक्षकों ने चिंगड़ू को घर से खाना लाने के लिए कह दिया है। अब वह स्कूल में बना हुआ मध्याहन भोजन तो नहीं खाता लेकिन वह पाने घर से खाने का डब्बा लेकर स्कूल आता है। चिंगड़ू भूखा नहीं रहेगा इस समस्या का समाधान तो हो गया लेकिन उसके मन में यह अंधविश्वास जाने कितने दिनों तक बसा रहेगा। पता नहीं ऐसे और जाने कितने चिंगड़ू होंगे जो ऐसे अंधविश्वासों में उलझकर खुद का नुकसान कर रहे होंगे। आखिर इससे निपटने के लिए क्या किया जा सकता है? जवाब मुझे अभी तक नहीं मिला है।

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