मोदी का भाषण चुनावी था और प्रभावशाली भी था, परन्तु इसका डिजिटल कोर्ट और भारत की जनता से कोई भी सम्बंध नहीं

​​​​​​​भारत में डिजिटल कोर्ट की शुरूआत : वरिष्ठ अधिवक्ता भीम सिंह ने चिंता व्यक्त की. भाषण चुनाव भाषण तो जरूर था और प्रभावशाली भी था, परन्तु इसका डिजिटल कोर्ट और भारत की उस जनता से कोई भी सम्बंध नहीं ...

नई दिल्ली,10 मई। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता, स्टेट लीगल एड कमेटी के कार्यकारी चेयरमैन तथा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के वरिष्ठ कार्यकारी सदस्य प्रो. भीमसिंह ने आज भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री जे.एस खेहर द्वारा विज्ञान भवन, नई दिल्ली में डिजिटल कोर्ट के उद्घाटन समारोह के अवसर पर इस बात पर गहरी चिंता प्रकट की है कि भारत में पहले कानूनी और मानवाधिकार की जानकारी देशवासियों को होनी चाहिए जो लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या मानवाधिकार और अपने कानूनी अधिकार से अवगत ही नहीं हैं।

आज प्रो. भीमसिंह सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के वरिष्ठ कार्यकारी सदस्य होने के नाते इस उद्घाटन समारोह में शामिल हुए जिसमें सैंकड़ों वकील, छात्र शामिल थे।

प्रो. भीमसिंह ने प्रधानमंत्री के प्रभावशाली भाषण को सराहा, परन्तु जोर देकर कहा कि यह भाषण चुनाव भाषण तो जरूर था और प्रभावशाली भी था, परन्तु इसका डिजिटल कोर्ट और भारत की उस जनता से कोई भी सम्बंध नहीं है, जिस देश में आज भी 60 प्रतिशत लोग अभी तक क, ख या एबीसी या अल्फ, बे लिखने-पढ़ने से महरूम रहे हैं और फिर यह डिजिटल सिस्टम उस जनता के पास कैसे पहुंच सकेगा, जबकि एक कम्प्यूटर को खरीदने के लिए पूरे गांव के पास बजट नहीं है।

उन्होंने ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में और उच्च न्यायालयों में सबसे बड़ी भाषा अंग्रेजी है जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य भाषा नहीं है। उन्होंने कहा कि 60 प्रतिशत गांव के लोग के पास आज तक बिजली नहीं पहुंची है और ना ही 50 वर्षों तक पहुंचने की कोई उम्मीद है।

प्रो. भीमसिंह ने कहा कि भारत के प्रधान मंत्री और सरकार को सबसे पहले देश में हर व्यक्ति के लिए हर समय बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने चाहिए। वहां पर मोदी जी का यह कम्प्यूटर का सपना कैसे पूरा हो सकता है। प्रो. भीमसिंह ने कहा कि इसके बारे में सरकार को सोचना होगा, यदि कहीं सपने में बिजली आ जाय और मोदी जी घर-घर में कम्प्यूटर भी बांट दें तो देश में प्रचलित भाषा में हर घर में हर राज्य में उनकी अपनी भाषा में कम्प्यूटर और उसका प्रचार क्या अभी 50 वर्ष मुमकिन है।

प्रो.भीमसिंह ने कहा कि अगर सारी बातों का हल प्रधानमंत्री निकाल सकते हैं, तो मोदी जी के पास क्या साधन होगा उन करोड़ों मजदूरों को रोजी-रोटी देने का जो कागज फैक्टरी के साथ जुड़े हैं और उन पढ़े-लिखे युवकों का क्या होगा जो आज अदालतों या दफ्तरों में काम करते हैं।

प्रो. भीमसिंह ने कहा कि यह एक राजनीतिक समस्या नहीं हैं, यह एक राष्ट्र को उन्नति की तरफ लेजाने और पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है और सबसे पहले मोदी जी और उनकी सरकार को यह निश्चिय करना होगा कि हर घर में और हर गांव में बिजली पहुंची हो, दूसरा सरकार को चाहे वह किसी भी पार्टी की सरकार हो उसे यह तय करना होगा कि पूरे देश के लोगों को विशेषकर बेरोजगार नौजवानों को कैसे काम में लगाया जा सकता है, जिससे राष्ट्र को भी फायदा हो और देश की जनता भी सुरक्षित रहे।

प्रो. भीमसिंह ने सुझाव दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री जे.एस खेहर को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सभी बार एसोसिएशनों की प्रतिनिधियों की बैठक करनी चाहिए और उनके विचारों का आकलन करने और इस संबंध में उनके रचनात्मक सुझावों की तलाश करनी चाहिए कि वे डिजिटल कोर्ट के बारे में क्या सोचते हैं। इतना ही नहीं हर जिला की बार एसोसिएशन का एक प्रतिनिधि उस बैठक में बुलाना चाहिए, क्योंकि भारत गांव में रहता है और भारत की जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र से है, जो न्याय लोगों को लिखी हुई याचिकाओं और कानूनी किताबों से प्राप्त नहीं हो सकता, वह न्याय कम्प्यूटर की गुमनाम भाषा में प्राप्त होगा, जिसको समझने के लिए 50 हजार रुपये का कम्प्यूटर चाहिए।

प्रो.भीमसिंह ने कहा कि न्याय व अधिकार कम्प्यूटर प्रणाली या भाषण शैली से इस देश के लोगों को प्राप्त नहीं होगा, जब तक कि इस देश में शत प्रतिशत लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानेंगे और संविधान में दिये हुए मानवाधिकार से परिचित नहीं होंगे।

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